*राजनैतिक व्यंग्य-समागम*
*राजनैतिक व्यंग्य-समागम*
*1. धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे : विष्णु नागर*जे टी न्यूज़

तो प्यारे देशवासियो, हमारा देश एक बहुत रोचक मुकाम पर पहुंचता हुआ दिख रहा है। भूल जाइए, अजट-बजट। बजट तो आते रहते हैं, जाते रहते हैं। लोग रोते हैं, सरकार हंसती रहती है। मंत्री और सत्तापक्ष के सांसद बजट के पक्ष में बेसुरा राग गाते रहते हैं और विपक्ष जोर-जोर से चीखता-चिल्लाता रहता है। इनमें से किसी को बजट से कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई गरजने-बरसने का आनंद उठाता है, तो कोई नाचने-गाने का! डेढ़-दो घंटे तक बजट पढ़ने से वित्त मंत्री के पैरों, जुबान और आंखों का मुफ्त परीक्षण हो जाता है। हैल्थ चेकअप हो जाता है।
बजट का यह स्थायी भाव है। जिसे सब पाज़िटिव दिखता है, समझो कि वह सत्ता में है और जिसे सब निगेटिव दिखता है, वह विपक्ष में है। सेठ दोनों तरफ़ होते हैं। उन्हें यह विशेष सुविधा है। उनका अपना फायदा-नुकसान ही देश का फायदा-नुकसान है। जब तक बजट रहेगा, यह सब रहेगा। इसमें कुछ भी नया नहीं है और नया हो भी नहीं सकता। विपक्ष बजट की तारीफ़ नहीं कर सकता, सत्ता पक्ष उसकी निंदा नहीं कर सकता। इसलिए बजट को भूले
अभी बजट से अधिक रोचक है, धर्मक्षेत्रे- कुरुक्षेत्रे में चल रहा युद्ध! दोस्तो, कल तक जो ‘बंटेंगे तो कटेंगे ‘ के नारे लगा रहे थे, वे खुद इन दिनों बंटे और कटे हुए से हैं। जो ‘एक हैं तो सेफ हैं’ का नारा बुलंद कर रहे थे, उनकी एकता इतनी अधिक ख़तरे में है कि उनकी हालत पर रोना आता है और मुश्किल यह है कि मेरे पास रूमाल नहीं है। बंटने-कटने की बातें जिनको केंद्र में रखकर कही जा रही थीं, वे फिलहाल केंद्र से बाहर हैं। लड़ वे रहे हैं, जो एक हो रहे थे।
एक मुख्यमंत्री, एक शंकराचार्य से भिड़ा हुआ है। उनसे शंकराचार्य होने का प्रमाण मांग रहा है, तो शंकराचार्य, मुख्यमंत्री से उनके हिंदू होने का प्रमाण मांग रहे हैं! मुख्यमंत्री ने कहा कि तुम शंकराचार्य नहीं, तो शंकराचार्य ने कहा तुम तो हिंदू भी नहीं! मुख्यमंत्री ने कहा, मैं तुम्हें
राजसी ठाठ-बाट के साथ माघ मेला में गंगा स्नान नहीं करने दूंगा। शंकराचार्य ने कहा कि अच्छा तो अब एक मुख्यमंत्री मुझसे शंकराचार्य होने का प्रमाणपत्र मांगेगा, उसकी ये हैसियत हो गई है? चालीस दिन देता हूं उसे, वह अपने को हिंदू साबित करे। नहीं किया, तो उसे हिंदू धर्म से बाहर करवा दूंगा! वह हिंदू रहना चाहता है, तो अपने राज्य में गो-हत्या बंद करवाए, वरना यह साबित हो जाएगा कि वह हिंदू नहीं, कालनेमि है, पाखंडी है, ढोंगी है। वह हिंदू है, तो गोमाता को राज्यमाता घोषित करे, वरना साधु-संत मिलकर उसे देख लेंगे! उधर कोई हिंदू रक्षा दल कह रहा है, ये शंकराचार्य नहीं है, ये रावणाचार्य है, कांग्रेसाचार्य है। लट्ठमलट्ठा हो रही है।

हम जैसे दर्शकों को मज़ा आ रहा है। अभी तो दोनों की नाक इतनी ज्यादा ऊंची है कि गर्दन नीची होने पर भी नाक ऊंची ही रहती है! एक चाहता है दूसरा अपनी नाक पहले नीची करे, दूसरा कह रहा है कि नहीं करूंगा, पहले वह नीची करे।
बाहरी शरीर में वैसे नाक थोड़ा-सा स्थान घेरती है, मगर पुरुष की सारी इज्ज़त इस टुन्नी सी नाक में समाई रहती है। बिना कटे यह नाक कट जाती है और बिना जुड़े यह जुड़ जाती है। तो अब दोनों एक-दूसरे की नाक काटने पर तुले हैं और संघ ने चाहा, तो दोनों की नाक कटकर फिर जुड़ जाएगी, मगर अभी तो दोनों ओर से छुर्रियां तनी हुई हैं। दोनों वार के लिए सही मौके का इंतजार कर रहे हैं। दोनों की हथेलियां एक-दूसरे की कटी हुई नाक रखकर दुनिया को दिखाना चाहती हैं। पिछले साढ़े ग्यारह साल का यह अपनी तरह का सबसे रोचक दृश्य है!
तो ये तो हिंदुत्व का एक मोर्चा है। एक और मोर्चा भी खुल चुका है और वह बंद होकर भी बंद नहीं होने वाला है! यूजीसी की नियमावली का झगड़ा तो सुप्रीम कोर्ट की कृपा से हिंदुत्ववादियों के पक्ष में अभी सुलझ गया है, मगर सुलझ कर भी गहरे घाव दे गया है और ये घाव ऐसे हैं कि मरहम कोई भी लगाओ, सूखने वाले नहीं हैं। यूपी में ‘आई लव योगी जी, गो बैक यूजीसी’, ‘योगी तुझसे बैर नहीं, मोदी तेरी खैर नहीं’, ‘तूने सवर्ण समाज की पीठ में छुरा भोंका है, हम तुझे छाती ठोंककर जवाब देंगे’, ‘मोदी तेरी क़ब्र खुदेगी, योगी जी की छाती में’ के नारे लगे हैं।मोदी के पुतले को पीटा गया है, जलाया गया है। उनकी जाति याद दिलाई गई है और किसी का बाल भी बांका नहीं हुआ है

मोदी जी की छाती में ये दर्द क्या अंदर तक घुसा नहीं है?मोदी जी की आदत किसी को माफ़ करने की नहीं है।इसके लिए वह योगी जी को कभी माफ कर सकते हैं?कभी नहीं! मोदी, योगी से बड़ा और पुराना घाघ है। ऊपर की चुप्पी अंदर की खलबली दिखा रही है। उधर योगी के बंदे कह रहे हैं कि मोदी तेरी खैर नहीं, उधर मोदी बिना कहे कह रहे हैं, योगी अब तेरी भी खैर नहीं।
तो योगी जी ने दोनों मोर्चे खोल रखे हैं। घर की लड़ाई पहली बार सड़क पर आ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस जंग पर ठंडा पानी डाला है, मगर चिनगारियां नीचे दबी हुई हैं। हिंदुत्व के सौ साला अभियान की यह गति होगी, महीने भर पहले तक यह कौन जानता था! इतनी जल्दी हिंदुत्व की सांस फूलने लगी है, इसका किसे पता था?इतनी जल्दी द्वंद्व युद्ध शुरू हो जाएगा, किसे मालूम था!
लोहे पर चांदी और सोने की पालिश अब धीरे-धीरे उतरने लगी है। जो दूसरों को संकट में डाल रहे थे, बुलडोजर चला रहे थे, शस्त्र पूजन कर रहे थे, मस्जिद के आगे हनुमान चालीसा का पाठ करवा रहे थे, खुद संकट में आए हुए से लग रहे हैं। कम-से-कम इसका श्रीगणेश तो हो चुका है।

ये सब सत्ता के नशे में चूर हैं। विश्वगुरु जी और जगद्गुरु जी भिड़ रहे हैं। ऐसे में असम के मुख्यमंत्री सरमा जी का बंगाली मुसलमानों वाला राग बेसुरा लग रहा है। जो ‘दुश्मन’ को नष्ट करने चले थे, जो इतिहास मिटाने चले थे, आज खुद नष्ट होने-मिटने के कगार पर हैं। इनके ‘अच्छे दिन’ जाने को बेताब से हैं। अच्छा है कि इनमें दंगल मचा हुआ है। इनका सनातन में तनातनी का आलम है। अगर मैं ईश्वर को मानने वाला हुआ होता, तो कहता कि हे भगवान देश को हर रोज भटकाने वालों को इतना भटका कि ये घर का रास्ता ही भूल जाएं।
मगर सावधान, अभी विश्राम का समय आया नहीं है।
*(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)*
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*2. शुक्र है बापू, तुम ना हुए! : राजेंद्र शर्मा*
एक तो 30 जनवरी की तारीख के बावजूद, तीस जनवरी वाली कोई बात नहीं थी। न मुकर्रर वक्त पर साइरन के जरिए पुकार और न जगह-जगह लाउडस्पीकरों से ‘‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’’ की गुहारें।
उस पर सुबह-सुबह शांति वन पहुंच कर जो देखा, हैरान करने वाला था। बापू अपने चर्चित लंबे डग भरते हुए तेजी से वृक्षों के झुरमुट की ओर भागे से जा रहे थे। दूर से ही उनकी ओर बढ़ते हुए पूछा, इतनी सुबह उधर कहां अंधेरे की तरफ भागे जा रहे हैं और वह भी अपने पुजाने के दिन पर। साल में दो ही दिन तो आप को याद किए जाने के बचे हैं। दो अक्टूबर और तीस जनवरी। आज तो आपका नाम लेने वालों से लेकर, गोडसे का काम करने वालों तक, तमाम गद्दीधारी आपके ठिकाने पर आने वाले हैं और आज ही आप…।
बापू बिना रुके कदम बढ़ाते हुए बोले — इसीलिए तो…! इससे पहले कि यह सालाना नाटक शुरू हो, मैं कहीं निकल जाना चाहता हूं। मुझे कम-से-कम इस पाखंड का हिस्सा नहीं बनना है।
पत्रकारीय उत्सुकता अब और जोर मारने लगी। मैंने भी पीछा नहीं छोड़ा। यह कहते हुए पीछे-पीछे चलता रहा कि आप को अपनी पूजा कराने का शौक कभी नहीं था, यह तो सभी जानते हैं। दिखावे की पूजा कराने का तो हर्गिज नहीं। फिर भी आप का यह मानना क्या अन्याय ही नहीं है कि राज करने वालों का आपकी मूर्ति पर/ तस्वीर पर फूल चढ़ाना, आपके आगे सिर झुकाना कोरा दिखावा ही है। संदेह का लाभ तो सभी को मिलना चाहिए। राज करने वाली पार्टी में सभी गोडसे भक्त थोड़े ही हैं। उनके यहां भी तो थोड़ी-बहुत वैराइटी तो होगी ही। हमें तो लगता है कि सच्चे गोडसे भक्त तो पहचान छुपाकर, जुबान चलाने वाले सोशल मीडिया हिंदू योद्धा ही ज्यादा हैं। वर्ना मोदी जी तो दुनिया में जहां भी जाते हैं, खोजकर आपकी प्रतिमा पर शीष नवाते हैं। और आप हैं कि दुनिया के ज्यादातर देशों में उन्हें मिल भी जाते हैं। फिर यह बहिष्कार…?
बापू समझ गए कि आसानी से उनका पीछा नहीं छूटने वाला है। रुक कर एक पेड़ के नीचे बने टूटे-फूटे चबूतरे पर बैठ गए। इशारा कर के मुझे भी बैठने का कहा। फिर कहने लगे कि तुझे क्या लगता है कि मुझे इसकी परवाह है कि कौन वाकई मेरी पूजा करता है और कौन गोडसे की? और वह भी इसलिए कि गोडसे ने मेरे सीने पर तीन गोलियां दाग कर मेरी हत्या की थी? या मुझे इसकी परवाह है कि पिछले अठहत्तर साल में तीस जनवरी का दिन, शहादत या बलिदान दिवस से शुरू होकर, पहले पुण्यतिथि हुआ और अब सिर्फ जयंती या सालगिरह रह गया है? यहां तक कि अहिंसा दिवस, स्वच्छता दिवस, शराबबंदी दिवस, आदि में से कुछ भी। मुझे गलत मत समझना। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि मुझे इस सबसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता है। बेशक, मुझे भी फर्क पड़ता है, लेकिन मोहनदास करमचंद गांधी के तौर पर मुझे फर्क नहीं पड़ता है। मुझे फर्क पड़ता है, देश के बापू के रूप में। मुझे फर्क पड़ता है, तो इसलिए कि इससे देश को फर्क पड़ता है।
मेरे चेहरे पर मेरा प्रश्न साफ लिखा था — कैसे? बापू अपने लोकख्यात धीरज से हाथ पकड़ कर समझाने लगे। तू तो पत्रकार है, उत्तराखंड वाले ताजा किस्से का तो तुझे पता ही होगा। कहने को देवभूमि है और बड़ी तेजी से राक्षस-भूमि बनने की राह पर फिसल रही है। कोटद्वार में एक दुकान के नाम पट्ट पर लिखा है बाबा। पर उसका मालिक मुसलमान है। बस इसी का बहाना लेकर भगवाधारी झुंड बनाकर उसकी दुकान बंद कराने के लिए पहुंच गए। बाबा शब्द तो हमारा है। मुसलमान की दुकान का नाम बाबा नहीं रहने देंगे! लगे उपद्रव करने। पुलिस थी, पर हस्ब ए मामूल, तमाशा देखने की ड्यूटी पर। पर उनके तोड़-फोड़ कर पाने से पहले, दीपक नाम का एक पहलवान उनके और बाबा की दुकान के बीच दीवार बनकर खड़ा हो गया। एलान कर दिया कि मेरा नाम मोहम्मद दीपक है और न दुकान को हाथ लगाने दूंगा और न दुकानदार को। भगवाधारी झुंड ऐसी धर्मनिरपेक्षतावादी रुकावट के लिए तैयार नहीं था, पीछे लौट गया। तमाशा खत्म, तो पुलिस भी घर चली गयी। पर धामी जी के राम राज्य में कहानी इतने पर खत्म कैसे हो जाती? अगले दिन भगवाई और बड़े झुंड में और पूरी तैयारी के साथ अपने धार्मिक यज्ञ में बाधा डालने वाले राक्षस, दीपक को निपटाने पहुंच गए। जी भरकर उन्हें और उनके परिवार को गालियां दीं और हंगामा किया। पुलिए एक बार फिर तमाशा देखती रही! अब जिन धामी जी की पुलिस के अशीर्वाद से आए दिन ऐसा ही कुछ न कुछ हो रहा है, वह तीस जनवरी को मुझे पूजने का स्वांग करें और मैं उनसे फूल चढ़वाऊं, अब बर्दाश्त नहीं होगा।

मैंने कहा, पर एक के लिए सब को…? बापू ने झिडक़ते हुए कहा, यह तो एक उदाहरण है। यहां तो पूरा का पूरा अवा ही बिगड़ा हुआ है। सुना नहीं, असम का हिमंता बिस्व सरमा किस के नाम पर चुनाव जीतना चाहता है। इसके नाम पर कि वह मियां लोग को इतना परेशान करेगा कि देश छोडक़र भाग जाएंगे! क्या मैं उससे श्रद्धा-सुमन चढ़वाऊं? या उत्तर प्रदेश वाले योगी से, जिसका चोला साधु का, गद्दी मुख्यमंत्री की और काम…। अब तो अदालत ने भी कह दिया है कि आपरेशन लंगड़ा चलवाकर अगले ने आठ साल में 11 हजार लोगों को पांव में गोली मार कर लंगड़ा कराया है। उससे अपनी अहिंसा का सम्मान कराऊं? या ओडिशा के मांझी से, जिसके राज में बंगालियों को बाकायदा मॉब लिंचिंग में मारा जा रहा है या पुलिस द्वारा जबरन बांग्लादेश में धकेला जा रहा है।
मैंने आखिरी दलील दी — पर मोदी जी? अब बापू ने थोड़ा नाराजी से घूरा! इस ब्रह्मांड को चलाने वाला कौन है? यह तो पूरे आस्तिकों का ब्रह्मांड है, जिसका सृष्टा, कर्ता, संचालक, सब एक है!
इसके बाद मैं क्या कहता? फिर भी उठते-उठते मैंने अपने हिसाब से चतुराई की सलाह दी। आपके गायब हो जाने से इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उल्टे आप के गायबाने में ये आप की जगह पर किसी और को बापू बनाकर बैठा देंगे, पर अपने कर्म-कांड और आचार-व्यवहार, दोनों में जरा-सा खलल नहीं पड़ने देंगे। बापू उठकर लंबे डग भरकर पेड़ों के झुरमुट में अदृश्य होने की ओर बढ़ते चले गए — पीछे आवाज सुनाई दी, इसीलिए तो मेरा इनसे दूर रहना और भी जरूरी है, अच्छा है!
*(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक है।)*
