अमानवीय कृत्य
अमानवीय कृत्य

जे टी न्यूज़
नहीं,समझ पाये,
इंसानियत गुहार लगाये।
ले सोच- विचार,
करूणार्द्र पीड़ा करती आभार।
गिड़गिड़ाते मजबूर,
शर्म हुई जब चकनाचूर।
दानवता देख हंसती,
“मनुष्यता” जा, दूर कहीं रोती।
न्याय केलिए तरसे,
करे बयान “नयन” बरसे।
बगैर ही कांटे-छुरी,
झूठ करे सत्यता की किरकिरी।

द्रवित होता हृदय,
देख अमानवीय हो कृत्य।
कर सब दरकिनार,
नफ़रतें फैला कर रहीं व्यापार।
न , होगा ये गलत,
लगा अपने भीतर गश्त।
सोच ले पूर्णविराम,
“गिल” वर्ना ईर्षा मिटा दे, नाम।
नवनीत गिल

