बिहार में सामाजिक न्याय पहली बयार

बिहार में सामाजिक न्याय पहली बयार


जे टी न्यूज़
20वीं शदी का तीसरा दशक – गुलाम भारत! सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर जाती व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था एवं पोषण व्यवस्था से रुग्ण भारत! ऐसी ही परिस्थिति में बिहार प्रांत के समस्तीपुर जिलांतर्गत पितौंझिया ग्राम (अब कर्पूरी ग्राम) में एक अत्यंत पिछड़ी जाति परिवार में एक बालक जन्म लेता है। असहज सामाजिक झंझावात एवं विषम आर्थिक परिस्थिति में भी यह बालक शिक्षा के प्रति काफी जागरूक रहकर शिक्षा ग्रहण करता है। सामाजिक असमानता से आहत एवं गुलामी व्यवस्था से मर्माहत उक्त बालक आगे की पढ़ाई छोड़ क्वीट इंडिया मुवमेंट में बिहार से अग्रणी भूमिका निभाते हुए सलाखों में भी कैद हो जाता है।

1952 के बिहार एसेंबली चुनाव में ताजपुर विधान सभा क्षेत्र से विधानसभा सदस्य बनने के बाद कभी भी कोई चुनाव नहीं हारने वाला एवं मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित होने वाला उक्त शख्सियत और कोई नहीं वल्कि जननायक कर्पूरी ठाकुर जी थे। इनका जन्म दिवस हरेक साल 24 जनवरी को बड़े धूमधाम से राजनीतिक समारोह के साथ मनाया जाता है। एक बार उप मुख्यमंत्री एवं दो-दो बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने सामाजिक समानता के लिए अनेकों कार्य किया। समाज के वंचित लोगों को सामाजिक धारा में लाने के उद्देश्य से उन्होंने आरक्षण की स्तरीय व्यवस्था की जो इस प्रकार थी – बी.सी. 12%, एमबीसी 8%, महिला 3% एवं इबीडव्लूएस 3%. शिक्षा मंत्री के रूप में दबे, कुचले एवं आर्थिक रूप से विपन्न तबकों तक शिक्षा की पहुंच के लिए उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा में अंग्रेजी में पास होने की अनिवार्यता को हटा दिया। मिशनरी स्कूलों में हिंदी में पढ़ाई शुरू करवायी एवं आर्थिक तौर पर गरीब बच्चों का फी माफ करवाया। उर्दू को दूसरी भाषा का दर्जा दिया। किसानों को राहत देने के उद्देश्य से उन्होंने गैर-लाभकारी जमीन पर मालगुजारी टैक्स बंद करवाया। सी.एम. सेक्रेटेरिएट में चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों के लिए लिफ्ट की सुविधा उपलब्ध कराई। अन्तर्जातीय शादी को बढ़ावा दिया। सरकारी कार्यालयों में हिंदी में कार्य संपादन पर जोर दिया एवं समान वेतन आयोग लागू किया। इस प्रकार वे बिहार की राजनीति में गरीब – गुरबों एवं सामाजिक रूप से विपन्न लोगों की सबसे बड़ी आवाज बनकर उभरे। फलत: लोगों ने उन्हें जननायक की संज्ञा से भी नवाजा। कुल मिलाकर उन्होंने ने बिहार के समाज पर जिस तरह की छाप छोड़ी, वैसा उदाहरण अन्यत्र नहीं दिखता।
लेखक: प्रोफेसर (डा.) कुशेश्वर यादव‌, प्रधानाचार्य, जीएमआरडी कालेज मोहनपुर, समस्तीपुर

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