*सुप्रीम कोर्ट में हो जाति संवेदीकरण समिति* *(आलेख : सागर)*
*सुप्रीम कोर्ट में हो जाति संवेदीकरण समिति*
*(आलेख : सागर)*

13 अप्रैल 2023 को, संविधान निर्माता डॉ. भीम राव आंबेडकर की जयंती के एक दिन पहले, सुप्रीम कोर्ट के आंबेडकरवादी वकीलों ने कोर्ट के पुस्तकालय में पुष्पांजलि अर्पण का एक छोटा-सा कार्यक्रम रखा था। साल 2018 में इन्हीं वकीलों ने करीब तीन साल के संघर्ष के बाद कोर्ट प्रशासन की अनुमति से पुस्तकालय में बाबा साहेब आंबेडकर की एक बड़ी तस्वीर लगवाई थी। तब से ही हर साल 13 अप्रैल और 6 दिसंबर को ऐसे ही कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। 6 दिसंबर को बहुजन समाज आंबेडकर पुण्य तिथि को महापरिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाता है।

इस मौके पर हर साल दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग और कुछ प्रगतिशील सवर्ण वकील भी पुस्तकालय में जमा होते है और डॉ. आंबेडकर की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। मगर इस बार आंबेडकर जयंती की पूर्व संध्या कुछ खास थी। मुख्य न्यायधीश जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने आंबेडकरवादी वकीलों के आमंत्रण को स्वीकार कर लिया था और कार्यक्रम में वह भी शामिल होने वाले थे।
मुख्य न्यायधीश का शामिल होना बड़ी मशक्कत के बाद हुआ था। दो सप्ताह पहले ही आंबेडकरवादी वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश को खत लिखना शुरू कर दिया था। खत अपने आप में एक मांग याचिका थी कि 14 अप्रैल को छुट्टी की घोषणा की जाए। सुप्रीम कोर्ट में आज भी 14 अप्रैल एक स्थाई छुट्टी नहीं है, बल्कि हर साल कुछ दिन पहले कोर्ट प्रशासन अधिसूचना के जरिए इस दिन को छुट्टी घोषित करती है। “हमारे लिए यह दिन दीवाली या ईद से कम नहीं है। हम इस दिन अपने परिवार के साथ खुशियां मनाते है, घूमने जाते है और हमारे घरों में इस दिन अच्छे पकवान बनते हैं। ऐसे में कई लोग जयंती उत्सव की अपनी निजी योजना नहीं बना पाते हैं, क्योंकि छुट्टी की घोषणा आखिरी वक्त में होती है।” सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रतीक आर. बॉमबार्डे ने मुझसे कहा। प्रतीक ही इन आंबेडकरवादी वकीलों के मुखिया है। उन्होंने अपने समूह को “डॉ बाबासाहेब आंबेडकर सामाजिक न्याय अधिवक्ता समूह” का नाम दिया है। समूह के अधिवक्ताओं की बेचैनी तब और बढ़ गई जब खबर आई कि एक बेंच ने ज्ञानवापी मस्जिद मामले की सुनवाई को 14 अप्रैल को तय की है।
प्रतीक ने मुझसे कहा कि उन्होंने जब अपने पत्र की स्थिति का पता करना चाहा, तो कोर्ट के रजिस्ट्रार ने उन्हें महासचिव से मिलने को कहा था। कोर्ट का रजिस्ट्रार एक मायने में कोर्ट के सारे प्रशासनिक विभागों के बीच की कड़ी होता है। रजिस्ट्रार के पास ही प्रत्येक फाइल आती है और वहां से आगे भेजी जाती है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट के महासचिव प्रशासनिक कार्यों के प्रमुख होते हैं। प्रतीक बताते हैं कि महासचिव ने उन्हें मुख्य न्यायधीश के निजी सचिव से मिलने को कहा, जिसके बाद वह निजी सचिव से मिले और मुख्य न्यायधीश से मिलने की इच्छा जाहिर की, लेकिन निजी सचिव ने उन्हें आश्वासन दे कर भेज दिया कि वह मौका मिलते ही उनका याचना पत्र मुख्य न्यायधीश के सामने रख देंगे। प्रतीक ने मुझे बताया कि वह आखिरी समय तक छुट्टी को लेकर आश्वस्त नहीं थे। हालांकि, 11 अप्रैल को महासचिव के विभाग ने अधिसूचना जारी कर दी, जिसमें लिखा था कि 14 अप्रैल को भारत की सर्वोच्च्य न्यायलय और इसका रजिस्ट्री विभाग बी. आर. आंबेडकर की जयंती के अवसर पर बंद रहेंगे। छुट्टी के बाद, मुख्य न्यायधीश को निमंत्रण देने के लिए भी आंबेडकरवादी वकीलों को उतने ही प्रशासकीय स्तरों से गुज़रना पड़ा।

ऐसे में जब मुख्य न्यायाधीश 13 अप्रैल को बाबासाहेब की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित करने आए, तो समूह के अध्यक्ष प्रतीक मौके को चूकना नहीं चाहते थे। उन्हें नहीं पता था कि मुख्य न्यायाधीश से रू-ब-रू मिलने का मौका दुबारा कब मिले। इसलिए मुख्य न्यायाधीश ने बाबासाहेब की तस्वीर पर जैसे ही फूल चढ़ाए और उन्हें नमन कर वापस जाने लगे कि प्रतीक ने उन्हें समूह की तरफ से एक याचना पत्र थमा दिया। पत्र में समूह ने मुख्य न्यायधीश के सामने तीन मांगें रखी थीं। उनकी प्रमुख मांग थी कि सुप्रीम कोर्ट में “जाति संवेदीकरण समिति” का गठन हो। वकीलों ने लिखा कि, “योर लॉर्डशिप, हम आपका ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहते हैं कि हम वंचित और शोषित वर्गों से आने वाले अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के वकील अक्सर सुप्रीम कोर्ट में जातीय भेदभाव का सामना करते हैं। सिर्फ हम ही नहीं, रजिस्ट्री विभाग के अनुसूचित जाति और जनजाति के कर्मचारियों ने भी हमें बताया कि उनके साथ भी जातीय भेदभाव किया जाता है। जातिगत भेदभाव हमारे समाज का एक सच है। अतः आपसे अनुरोध है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के वकीलों और कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए एक जाति संवेदीकरण समिति का गठन किया जाए।”
पत्र सौंपते हुए प्रतीक ने मुख्य न्यायाधीश से कहा कि वह एक “कास्ट सेंसटाइजेशन कमेटी” [जाति संवेदीकरण समिति] चाहते हैं। पत्र स्वीकार करते हुए मुख्य न्यायधीश ने सबके सामने उनसे कहा, “मैं आपको एक बात बताना चाहता हूं कि हमने कास्ट सेंसटाइजेशन (जाति संवेदीकरण) कार्यक्रम अपने ज्यूडिशियल अफसरों के लिए पहले ही शुरू कर दिया है।” प्रतीक ने बाद में मुझे बताया कि शायद मुख्य न्यायधीश ने उन्हें ठीक से सुना नहीं या गलत सुन गए, जिस वजह से उनकी जाति संवेदीकरण को ले कर दिया जवाब पर्याप्त नहीं था। प्रतीक ने बताया कि, “सिर्फ 20 फीसदी लोग ही ज्यूडिशियल अकादमी जा पाते हैं, जो प्रमोशनल कैडर से होते हैं। बाकियों का क्या? सीधे जज बन जाने वालों का जातिगत सेंसटाइजेशन कैसे होगा? फिर सुप्रीम कोर्ट के वकीलों की कास्ट सेंसटाइजेशन का क्या होगा? वे सब के सब तो ज्यूडिशियल अकादमी नहीं जाते और उन वकीलों का क्या होगा, जो अकादमी गए बिना सीधे जज बना दिए जाते हैं?” प्रतीक ने कहा कि अगर जाति संवेदीकरण समिति होगी, तो अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए भेदभाव के मामलों को सुनने का एक प्लेटफार्म होगा। “कई अनुसूचित जाति और जनजाति के वकील और कर्मचारी मेरे पास आते हैं और अपने साथ हुए अलग-अलग तरह के भेदभाव के बारे में बताते हैं। ये भेदभाव उनके साथ उनके अफसर या सहयोगी, काम के दौरान करते हैं। मगर चूंकि इन मामलों की सुनवाई के लिए कोई फोरम नहीं है, इसलिए इन समस्याओं का कभी निपटारा नहीं हो पाता।” प्रतीक ने बताया।

जाति से परे, अगर हम जैंडर-आधारित भेदभाव के प्रति सुप्रीम कोर्ट की जागरूकता को समझने की कोशिश करें, तो यह संस्था बहुत प्रगतिशील नजर आती है। सुप्रीम कोर्ट में जैंडर जागरूकता और जैंडर-आधारित भेदभाव, यौन उत्पीडन के मामलों के निपटारे के लिए जैंडर संवेदीकरण और आंतरिक शिकायत समिति की व्यवस्था है। यह समिति किसी भी जैंडर आधारित भेदभाव के मामले को सुनती है और दोषियों को सजा भी देती है. इसके अलावा लगातार जैंडर जागरूकता के लिए कार्यक्रमों का आयोजन भी करती है. अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ने वाली बहुचर्चित वकील मेनका गुरुस्वामी को भी जैंडर संवेदीकरण समिति का सदस्य बना दिया है। इस तरह जैंडर से जुड़ी समिति को व्यापक और समावेशी बनाया गया है। इतना ही नहीं, मार्च 2023 में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ ने समिति के एक कार्यक्रम में बताया कि उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट के जज की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है, जो जजों की न्यायिक भाषा और उनके फैसलों में स्त्रियों के लिए पूर्व में इस्तेमाल किए गलत शब्दों को संग्रह करेंगी और उनके भविष्य में इस्तेमाल पर रोक लगा देगी। जैसे कई न्यायिक फैसलों में वैवाहिक संबंधों से बाहर रिश्ता रखने वाली स्त्रियों के लिए “वैश्या” शब्द का प्रयोग किया जाता है। उसी सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को मान्यता देने के लिए पांच जजों की संवैधानिक बेंच का भी गठन कर दिया। ये सारे कदम सुप्रीम कोर्ट के जैंडर के मुद्दे पर एक संवेदनशील दृष्टिकोण को दिखाते हैं। ऐसे में सवाल लाजिमी है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट की ओर से जाति संवेदीकरण और जातिगत भेदभाव के लिए कदम उठते क्यों नहीं दिखाई देते?
जबकि न्याय व्यवस्था में विद्यमान जाति-आधारित भेदभाव के कई प्रमाण उपलब्ध हैं। 2001 में एक 30 सदस्यीय संसदीय समिति और 2014 में अनुसूचित जाति आयोग ने अपनी-अपनी रिपोर्टों में भारतीय न्यायधीशों, हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के, में जातिगत पूर्वाग्रह होने की पुष्टि की है। ये पूर्वाग्रह सिर्फ उनके अंदर नहीं होती, बल्कि ये उनके न्यायिक फैसले को भी प्रभावित करते हैं, ये भी दोनों रिपोर्टों में पाया गया है। समिति और आयोग ने न्यायिक व्यवस्था में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अलग-अलग प्रकार के जातिगत भेदभाव को दर्ज किया था। रिपोर्टों के अनुसार, ये भेदभाव ज्यादातर कॉलेजियम सिस्टम द्वारा जजों की नियुक्तिओं में दिखता है। संसदीय समिति ने 2001 में संसद में अपनी रिपोर्ट रखते हुए सिफारिश की थी कि इन समस्याओं को जजों की नियुक्ति में आरक्षण की व्यवस्था ला कर दूर किया जा सकता है। अनुसूचित आयोग ने 2014 में भी अपनी रिपोर्ट में यही सिफारिश की थी। इन संवैधानिक संस्थानों की रिपोर्ट के प्रमाण के अलावा अनुसूचित जाति और जनजाति के वकीलों के खिलाफ ऊंचे जाति के जजों और वकीलों में कितनी दुर्भावना है, इसके कई प्रत्यक्ष और ताजे प्रमाण भी हैं।
चार महीने पहले दिसंबर में पटना हाई कोर्ट के जज संदीप कुमार ने अपनी कोर्ट में एक वकील का मजाक उड़ाते हुए कहा कि “आरक्षण से नौकरी मिली है क्या!” उनके इस भद्दे मजाक पर कोर्ट में सभी हंसने लगे। सुप्रीम कोर्ट के एक वकील ने, अपनी पहचान न बताने की शर्त पर, एक ऐसा ही वाकया बताया। उन्होंने कहा कि वह एक दलित महिला का केस लड़ रहे थे और जज को पता था कि वह भी अनुसूचित जाति के हैं। जज ने उनकी पहचान का मजाक उड़ाते हुए भरी कोर्ट में कहा कि, “अगर मैं आपको इस केस की सुनवाई नहीं दूंगा, तो क्या मैं एट्रोसिटी (अत्याचार) कर रहा होऊंगा।” ऐसा कह कर जज हंसने लगे। वकील ने मुझसे कहा कि इस तरह की भाषा जज और वकील अक्सर अनुसूचित जाति और जनजाति के वकीलों के साथ इस्तेमाल करते हैं। जातीय संवेदीकरण की न्याय व्यवस्था में कितनी कमी है, इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि जिस संवैधानिक बेंच ने सवर्णों के लिए आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण को संविधान सम्मत बताया, उसी बेंच के एक जज जेबी पारदीवाला ने नवंबर 2022 में अपने फैसले में लिखा कि आरक्षण की व्यवस्था सिर्फ दस साल के लिए थी, जबकि यह बात शोधपत्रों में भी साबित की जा चुकी है कि दस साल की व्यवस्था सिर्फ राजनितिक आरक्षण के लिए थी, जबकि शिक्षा और नौकरी में आरक्षण की व्यवस्था की कोई समय-सीमा नहीं निर्धारित की गई थी। पारदीवाला के अपने उस बयान के लिए सात साल पहले गुजरात हाई कोर्ट के जज रहते हुए उन्हें एक बार महाभियोग का भी सामना करना पड़ा था। 58 सांसद उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाए थे। उस वक्त पारदीवाला ने महाभियोग प्रस्ताव आते ही अपने फैसले से वह टिप्पणी तुरंत मिटा दी थी। मगर वही बात सुप्रीम कोर्ट के जज रहते हुए उन्होंने नवंबर 2022 में सवर्ण गरीबों के आरक्षण के फैसले में फिर लिखा। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट की तरफ से आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया जिससे संस्थागत तरीके से जाति-आधारित भेदभाव से निपटा जाए।

प्रतीक सुप्रीम कोर्ट में बहुत कम वकीलों में से हैं, जो अपनी अनुसूचित जाति पहचान के साथ सार्वजानिक जीवन में सहज हैं। अनुसूचित जाति के ज्यादातर वकील सुप्रीम कोर्ट में अपनी पहचान कभी नहीं बताते, ताकि उन्हें भेदभाव का सामना न करना पड़े। मगर जो बताते हैं, उनके लिए हर रोज एक चुनौती होती है। प्रतीक ने कहा कि बाबासाहेब की जयंती का आयोजन करना, लोगों को बुलाना, अपने आप में ही उन्हें कोर्ट परिसर में अनुसूचित जाति के वकील के तौर पर स्थापित करता है। उसके बाद ही “बहुत से ब्राह्मण, मुसलमान वकील मुझे ‘बाबासाहेब वाले’ कह कर बुलाने लगे”, प्रतीक ने कहा। उन्होंने मुझसे कहा कि, “चार लोगों के सामने यह कहना कि ‘बाबासाहब वाले’ हैं और ऐसा कहते हुए उनका व्यवहार बदल जाना, इसका मतलब है वह भेदभावपूर्ण नजरिया है।” प्रतीक ने बताया कि एक बार उन्हें एक अनुसूचित जाति के एक वकील ने बताया कि किस तरह उनके सवर्ण सहयोगी कोर्ट कैंटीन में कभी एक साथ खाते हुए, उनके द्वारा पिये गिलास में पानी पीने से मना कर देते हैं। वह अपनी खुद की अलग गिलास लाते हैं। अनुसूचित जाति के वकीलों के साथ इस तरह के सूक्ष्म, लेकिन चतुराई से किए गए भेदभाव कई बार पकड़ में नहीं आते।
अक्टूबर 2021 में अमेरिकन बार एसोसिएशन के सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स ने अपनी एक रिपोर्ट में दलित वकीलों के साथ हो रहे अप्रत्यक्ष भेदभाव को संकलित किया। “अप्रत्यक्ष भेदभाव जो दलित वकील और लॉ ग्रेजुएट्स के साथ किया जाता है, उनमें हैं : उनको अच्छा ऑफिस न दिया जाना, सीनियर काउंसिल द्वारा उन्हें कम वेतन देना, ऑफिस में उनके साथ बुलिंग होना या उनसे निम्न स्तर के काम करवाना।” रिपोर्ट महाराष्ट्र के शोषित वर्ग से आए एक वकील, जो काफी वर्षों से कानून की प्रैक्टिस कर रहे हैं, उनके अनुभव का भी उल्लेख करती है कि, “मुझे ऑफिस के रिसेप्शनिस्ट के बगल में बिठाया जाता था। मुझे ऐसा लगता जैसे मैं बाकी इंटर्न्स से कम मायने रखता हूं।” रिपोर्ट दलित वकीलों का भारतीय न्याय व्यवस्था में सवर्णो द्वारा “फोर्स्ड घेटोआइजेशन” का भी मुद्दा उठाती है। यह प्रक्रिया वैसी ही है, जैसे प्रतीक के प्रति गैर-दलित वकीलों का नजरिया बदल जाना था, जब वह अपनी पहचान के साथ सार्वजानिक हुए। रिपोर्ट उल्लेख करती है कि, “दलित और शोषित समाज वर्ग से आनेवाले वकीलों के प्रति ऐसी धारणा बना दी जाती है कि जैसे वे सिर्फ दलित संबंधित मुकदमों में रूचि रखते हैं। इसके अलावा, वे अक्सर जाति या अफरमेटिव एक्शन [अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए संवैधानिक व्यवस्था, जैसे आरक्षण] के विषयों पर चर्चा करने के लिए बस बुलाए जाते हैं।”
रिपोर्ट एक और शोषित वर्ग से आने वाले वकील के फोर्स्ड घेटोआइजेशन के अनुभव को संकलित करती है। “ऊंची जातियों के वकील और सीनियर्स अक्सर दलित-बहुजन वकीलों के प्रति एक खास सोच रखते हैं, वे उन्हें ‘सोशल जस्टिस वकील’ [सामाजिक न्याय वकील] समझते हैं”, रिपोर्ट उल्लेख करती है। उस वकील के अनुभव के अनुसार यह उन्हें बहुत ही अकेला कर देने वाला अनुभव था। एक फर्स्ट जनरेशन बहुजन वकील होने के नाते उन्हें बिना किसी जाति तंत्र और आर्थिक सहायता के अकेले ही अपना रास्ता बनाना पड़ा था। रिपोर्ट उनके अनुभव का जिक्र करते हुए आगे उल्लेख करती है कि सीनियर काउंसिल उन्हें अक्सर एक ‘डाइवर्सिटी कैंडिडेट’ (विविधता उम्मीदवार) की तरह अपनी टीम में जगह देते हैं। वे उन्हें एहसास दिलाते हैं कि उनको काम दे कर उन्होंने एक एहसान किया है और वे इसके हकदार नहीं थे।

अमेरिकन बार एसोसिएशन की रिपोर्ट जाति-आधारित भेदभाव के एक और स्वरूप को पेश करती है : जजों के बेंच में एक खास तरह का पूर्वाग्रह। रिपोर्ट के अनुसार, किरुबा मुनुसामी, जो उन थोड़े दलित वकीलों में हैं, जिन्होंने मद्रास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों जगह प्रैक्टिस की है, अपना अनुभव बताती हैं, “मैंने एक फर्स्ट जनरेशन दलित वकील होने के नाते, अपनी दस साल की लॉ प्रैक्टिस में, जातिगत भेदभाव का सामना किया है। मैं कभी भी किसी सीनियर अधिवक्ता के ऑफिस को ज्वाइन नहीं कर पाई। एक युवा स्वतंत्र वकील की तरह जब भी मैंने अपना केस खुद प्रस्तुत किया, तो विरोधी पक्ष के सीनियर वकील मुझे बार-बार चुप हो जाने को बोलते। मेरी कई महिला सहयोगियों ने भी यह झेला है। दूसरी तरफ, जजों और वकीलों के जूनियर्स, जो ऊंची जातियों के होते थे, उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जाता था। उनके साथ वे हंसी मजाक सब करते। मैंने देखा है कि जज भी इस वर्ग से आने वाले वकीलों का बहुत उत्साहवर्धन करते हैं।” रिपोर्ट के अनुसार, मुनुसामी ने कहा कि ऊंची जातियों के वकीलों को अक्सर जजों से मनचाहा आर्डर मिल जाता है।
न्यायिक व्यवस्था में जाति आधारित भेदभाव का एक और भी पहलू है कि दलित-बहुजन वकीलों को सरकार अपने पैनल में नहीं रखती। सरकारी पैनल वकीलों का वह समूह होता है, जो सरकार के लिए मुकदमा लड़ता है। वह सरकारी खर्चे पर नियुक्त किए जाते हैं और उनकी नियुक्ति सरकार का कानून विभाग करता है। प्रतीक मानते हैं कि इन पैनलों के गठन में आरक्षण होना चाहिए और दलित-बहुजनों के लिए सिर्फ “सी” ग्रेड के पैनल नहीं, बल्कि “ए” ग्रेड के पैनल, जिसमें अधिक वेतन होती है, में भी सीटें आरक्षित की जाएं। सरकारी पैनलों के अलावा कई बार सुप्रीम कोर्ट के जज भी एमिकस क्यूरी [न्याय मित्र] और आर्बिट्रेटर [पंच, मामले को दोनों पार्टी के सहमति से सुलझाने वाला] की नियुक्ति करते हैं। अमेरिकन बार एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार, एमिकस और आर्बिट्रेटर की नियुक्ति में भी दलित-बहुजनों को प्राथमिकता नहीं दी जाती है। रिपोर्ट दो ऐसे मामलों का जिक्र करती है, जहां दलित-बहुजन वकील एमिकस क्यूरी के तौर पर कोर्ट को एक अलग दृष्टिकोण दे सकते थे, मगर तब भी उनकी जगह ऊंची जाति के वकीलों को तवज्जो दी गई। एक बार सुप्रीम कोर्ट के दो जज की न्यायपीठ जातीय भेदभाव कानून के लिए बने प्रोसीजरल सेफगार्ड [प्रक्रियात्मक रक्षा] की समीक्षा कर रही थी। उस केस में कोर्ट ने ऊंची जाति के एक ऐसे व्यक्ति को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया, जिसने जातीय भेदभाव कानून के खिलाफ सार्वजानिक बयान दिया था। नतीजा यह हुआ था कि उनके द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी की वजह से कोर्ट ने जातीय भेदभाव के कानून को और कमजोर कर दिया। इसी तरह, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाथरस में दलित महिला के साथ हुए बलात्कार का संज्ञान लेते हुए जब मुकदमा चलाया था, तो उसमें भी कोर्ट ने दो एमिकस क्यूरी नियुक्त किये थे और दोनों ही दलित नहीं

प्रतीक बताते हैं कि उनके कानूनी अनुभव में सभी जज ऐसा मानते हैं कि अगर जाति-आधारित हिंसा में कोई दलित पीड़ित है, तो उसके समर्थन में किसी भी दलित की गवाही को स्वतंत्र नहीं माना जा सकता, फिर भले उस गवाह का दलित पीड़ित से कोई पारिवारिक संबंध हो या न हो। ऐसे मुकदमों में सिर्फ ऊंची जाति के गवाह को ही स्वतंत्र माना जाता है। लेकिन ऐसा अन्य जातियों के पीड़ितों के साथ नहीं किया जाता। मिसाल के तौर पर, अगर कोई ब्राह्मण किसी अपराध का पीड़ित है, तो उसके समर्थन में किसी ब्राह्मण की गवाही को स्वतंत्र माना जाएगा, अगर उसका पीड़ित के साथ कोई पारिवारिक संबंघ नहीं है। इसी प्रकार कई बार हिंदू मंदिरों में वहां के प्रशासन को लेकर या उनके धन संपदा के अधिकार को लेकर झगड़े हुए और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो कोर्ट ने अक्सर ब्राह्मण वकीलों को एमिकस क्यूरी बनाया है : जैसे गोपाल सुब्रमणियम को पदमनाभा मंदिर का एमिकस बनाया जाना। ऐसे मुकदमों में यह शंका नहीं जताई जाती कि क्या एक ब्राह्मण वकील, ब्राह्मण पुजारियों और सरकार के बीच चल रहे झगड़े में निष्पक्ष रह पाएगा?
प्रतीक बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में भेदभाव सिर्फ वकीलों के साथ ही नहीं, बल्कि कोर्ट प्रशासन में काम कर रहे अनुसूचित जाति और जनजाति के कर्मचारियों के साथ भी होता है। सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों के लिए पदोन्नति में आरक्षण नहीं है। प्रतीक बताते हैं कि पदोन्नति में आरक्षण नहीं होने की वजह से कर्मचारी कभी ये सवाल नहीं उठा पाते कि आखिर उनकी पदोन्नति क्यों नहीं हुई। अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए पदोन्नति में आरक्षण एक संवैधानिक अधिकार है, हालांकि यह अधिकार उन्हें भारत सरकार के बाकी अंगो में मिलता है, जबकि सुप्रीम कोर्ट में नहीं। वर्तमान पदोन्नति की प्रक्रिया में कर्मचारियों की एनुवल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट (एसीआर) के आधार पर निर्णय लिया जाता है, मगर न्यायपालिका में एसीआर बनाने वाले और उस पर निर्णय लेने वाले अक्सर ऊंची जातियों के होते हैं। प्रतीक बताते हैं कि अगर कोर्ट प्रशासन में जातिगत पूर्वाग्रह नहीं होता, तो कैसे सभी उच्च पदों पर सिर्फ सवर्ण पदाधिकारी ही कार्यरत होते हैं। दलित-बहुजन कर्मचारियों को वर्षों से पदोन्नति नहीं दी गई है।
अमेरिकन बार एसोसिएशन सुझाव देती है कि न्याय व्यवस्था में जाति-आधारित भेदभाव को खत्म करने की पहली सीढ़ी है कानूनी समुदाय द्वारा इस भेदभाव को स्वीकार करना। कानून से जुड़े सभी लोग पहले इस बात को माने कि दलित-बहुजन-आदिवासी वकीलों और कर्मचारियों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। दूसरा सुझाव है कि शोषित वर्गों के लिए अफरमेटिव एक्शन की नीति को कठोरता से लागू करें। इसके लिए भारत सरकार ब्रिटेन सरकार की तर्ज पर एक जुडिशल डाइवरसिटी टास्कफोर्स [न्यायिक विविधता टास्कफोर्स] बना सकती है। ऐसे टास्कफोर्स का काम होता है : वैसे लोग, जिनका प्रतिनिधित्व न्याय व्यवस्था में नहीं है, उनका डेटा तैयार करना और उनकी नियुक्ति हर विभाग में सुनिश्चित करना। इसके सदस्य जज, वकील, कानून मंत्रालय के लोग हो सकते हैं। एसोसिएशन ने अपनी रिपोर्ट में जाति आधारित भेदभाव खत्म करने के लिए न्यायलयों को यह सुझाव दिया है कि वह दलित-बहुजनों का प्रतिनिधित्व हर कानूनी क्षेत्र में सुनिश्चित करे, मगर इसके विपरीत हालत यह है कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए दलित-बहुजनों के लिए कोई आरक्षण नहीं है और जो वकील सरकारी पैनल के लिए चुने जाते हैं, उसमें भी आरक्षण नहीं है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट, जो लॉ क्लर्क बहाल करती है, वे भी ठेके पर किए जाते हैं। लॉ क्लर्क की भर्ती कानून के विश्वविद्यालओं से निकले युवाओं में से की जाती है। सुप्रीम कोर्ट के हर जज को लगभग चार लॉ क्लर्क दिए जाते हैं, जो उनकी प्रशासकीय मदद करते हैं। हर एक लॉ क्लर्क को 80 हजार रुपए तक की तनख्वाह दी जाती है, जो भारत सरकार का पैसा होता है। ऐसे में इसमें आरक्षण नहीं दिया जाना संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। हाल ही में ऐसे लॉ क्लर्क की नियुक्ति प्रक्रिया की प्रशंसा करते हुए मुख्य न्यायधीश ने कहा है कि उनके खुद के लॉ क्लर्क भारत के अलग-अलग हिस्सों से आते हैं और वे ऐसे लोग हैं, जिनका कोई रिश्तेदार सुप्रीम कोर्ट में नहीं है। लेकिन दलित-बहुजनों के लिए इस तरह की प्रक्रिया किसी खास जज के विवेक पर निर्भर करती है, जबकि उन्हें उनका प्रतिनिधित्व संवैधानिक व्यवस्था के जरिए दिया जाना चाहिए, ताकि उनकी नियुक्ति किसी खास व्यक्ति पर निर्भर न हो।

प्रतीक ने कहा कि जाति संवेदीकरण समिति का गठन सुप्रीम कोर्ट में जाति आधारित भेदभाव को खत्म करने की पहली शुरुआत हो सकती है। मगर अभी तक उनकी याचना पर कोई जवाब नहीं मिला है। मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ की पहल, जिसमें वह जुडिशल ऑफिसर्स के लिए जाति संवेदीकरण की ट्रेनिंग चला रहे हैं, नाकाफी है। ऐसी ट्रेनिंग की जरूरत पूरे सुप्रीम कोर्ट के जजों और वकीलों को हैं। इसके अलावा, जाति संवेदीकरण जागरूकता के साथ-साथ इस समिति का कार्यक्षेत्र अनुसूचित जाति और जनजाति के साथ हो रहे जातिगत भेदभाव की सुनवाई का भी होना चाहिए। प्रतीक की मुख्य न्यायाधीश से तीन मांगों में दो अन्य थीं: 1) बी. आर. आंबेडकर की कोर्ट परिसर में एक मूर्ति हो और 2) 14 अप्रैल को स्थाई छुट्टी घोषित हो। मूर्ति को लेकर समारोह में उस दिन मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि, “आप लोग तो जानते ही हो कि यहां (परिसर में) बहुत सीमित जगह है।” प्रतीक की तीनों मांगें मुख्य न्यायाधीश के समक्ष विचाराधीन हैं और अभी तक कोई जवाब नहीं आया है।
*(साभार : हिंदी कारवां। सागर कारवां के स्टाफ राइटर हैं। यह आलेख उन्होंने दो वर्ष पूर्व लिखा था और यूजीसी के दिशा निर्देशों पर सुप्रीम कोर्ट के स्थगन के मद्देनजर आज भी प्रासंगिक हैं।)*


