भाजपा का अन्तर्द्वन्द और किसान आन्दोलन का आक्रोश प्रियंका गांधी को सत्ता दिलाएगा?
भाजपा का अन्तर्द्वन्द और किसान आन्दोलन का आक्रोश प्रियंका गांधी को सत्ता दिलाएगा?

आज वोटिंग ट्रेंड्स बदले हैं।अब कोई मतदाता ऐसे उम्मीदवार को वोट कतई नहीं देना चाहता,जिसके जीतने की कोई संभावना न हो,या सरकार में शामिल होने की कोई संभावना न हो।इसीलिए,निर्दलीय या छोटी पार्टियों के उम्मीदवारों की चुनावी संभावना लगातार कम हुई है।
बसपाने 2007में 30.43%,2012में 25.91% और
2017में 22% प्राप्त किए थे।लेकिन नागरिकता संशोधन कानून और धारा 370पर जिस प्रकार बसपाने भाजपाका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग किया है,उससे मायावतीकी राजनीतिक साख धराशायी हुई है।दूसरी तरफ,मोदीराजमें सीबीआई और आईबी के संभावित कार्यवाहियों से मायावती आतंकित और आशंकित रहीं।लालू प्रसादवाली जीवटता उनमें है नहीं।सो,वह राजनीतिक रूपसे अ-सक्रिय हैं।अगर,थोड़ी बहुत सक्रियता दिखा भी रही हैं,तो वह भाजपा पर उस तेवर से आक्रमण नहीं कर रहीं हैं,जिसके लिए वह जानी जाती हैं।मायावती और बसपा सत्ता के रेस से बाहर हैं।2007,2012और 2017के वोटिंग ट्रेंड्सको आधार मानें तो मायावती(बसपा)के वोटोंका हिस्सा 22% यानि कि लगभग 2.25करोड़ वोटका बिखराव होगा।इसमें से कौन कितना पाएगा,यह भविष्य के गर्त में है।
किसी भी जीवंत,जाग्रत लोकतंत्र में सजग,सचेत,सचेष्ट विपक्ष की अपनी महत्ता और सार्थकता है।2017-22 के दौरमें प्रादेशिक राजनीति में उत्तरप्रदेश विधानसभा में मान्यताप्राप्त विपक्ष समाजवादी पार्टी ही रही।लेकिन,कभी भी,कहीं भी वह प्रासंगिक और सार्थक विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पाई और आज भी अखिलेश यादव भाजपा के नकारात्मक वोटों के भरोसे सत्ताप्राप्ति की उम्मीद पाले हुए हैं।सोनभद्र, उन्नाव,हाथरस,आगरा-जहां कहीं भी जनभावना के साथ खड़े होने की बात आई है,समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव गायब नजर आए हैं।अगर,अमित शाह समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव से सार्वजनिक तौर पर सवाल पूछ रहे हैं कि कोरोना काल हो या अन्य कोई चुनौतीपूर्ण अवसर ये लोग दिखे नहीं,तो यह एक हद सच से जनता को रू-ब-रू करवा रहे थे।
फिर भी,भाजपा-विरोधी मतों और सत्ता की पहली दावेदार समाजवादी पार्टी और उसके नेता अखिलेश यादव हैं।समाजवादी पार्टी को 2007में 25.43%,2012में जब वह सत्तामें आई थी,तो 29.15% वोट मिले।2007और 2012में उसे भाजपा से ज्यादा वोट मिले थे।2017में जब वह सत्ता गंवाकर 47सीटों पर सिमट गई,तो भी उसे 21.82% वोट मिले थे।2017के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन सत्ताधारी दल- समाजवादी पार्टी-पारिवारिक कलह की शिकार भी थी।
समाजवादी पार्टी का सबसे सकारात्मक पक्ष अखिलेश यादव का उच्च शिक्षा प्राप्त टेक्नोक्रेट होना और अत्यन्त सभ्य,सुसंस्कृत,शालीन होना है।वह कभी भी शब्दोंकी मर्यादा का परित्याग नहीं करते,ऐक्ट करते हैं- रिऐक्ट नहीं करते।लेकिन नकारात्मक यह है कि पिछड़ावाद के लिए उत्तरप्रदेशमें राममनोहर लोहिया और चौधरी चरण सिंहने जो कुछ जोता बोया,उसे 1990के दशक से मंडलवाद के नाम पर यह पार्टी फसल काटती रही है।मुलायम सिंह यादव पिछड़ों के मसीहा भले बनते हों,सेक्यूलरवाद के नाम पर मुसलमानों का उनको समर्थन भी मिलता हो,लेकिन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव रहे हों या अखिलेश यादव-सत्ता का लाभ यादव जाति को ही मिलता रहा है,गैर-यादव पिछड़ा सत्ता के लाभ से वंचित ही रहा है।

अभी तक,जो भी ओपिनियन पोल सामने आए हैं, उसमें भाजपाकी सीटें तो घटती दिख रही हैं,सपा की बढ़ती भी दिख रही हैं,लेकिन इतनी नहीं कि वह अकेले सरकार बना सके।वैसे में,सपा-कांग्रेस की गठबंधन सरकार की ही संभावना ज्यादा है।सपा और कांग्रेस इस भविष्यको अगर चुनाव पूर्व समझ सके, भाजपा का सीधा मुकाबला सपा-कांग्रेस गठबंधन से होगा।सीधे मुकाबलेमें भाजपाकी बड़ी हार सुनिश्चित है।
लेकिन,विपक्ष की राजनीति की त्रासदी यह है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में गठबंधन को लेकर उत्सुकता नहीं दिख रही।यही नहीं,सत्ताधारी भाजपा भी यही चाहती है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में चुनाव पूर्व गठबंधन न हो।
2014के बाद मोदीयुग में भी भाजपा को जब-जब सीधी टक्कर मिली है-भाजपा हारी है।छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश,राजस्थान,दिल्ली,पंजाब और प.बंगाल इसके उदाहरण हैं।इसीलिए,भाजपा अपना राजनैतिक हित इसीमें देख रही है कि उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावमें उसे सीधी टक्कर न मिले।इसीलिए वह चुनावको कम-से-कम त्रिकोणीय रखना चाहती है।भाजपाका आकलन है कि कांग्रेस की सीटें एक हद तक बढ़ भी जाए,तो भी सत्ता हासिल करने तक वह नहीं पहुंच पाएगी।इसलिए,भाजपा अखिलेश यादव और सपा के तथाकथित विजय अभियान को हरसंभव तरीके से कुंद करने और एक हद तक कांग्रेस को अपना अभियान चलाने की छूट दे रही है।ताकि चुनावी परिदृश्य त्रिकोणीय हो,और विपक्षी वोटों के बंटवारे का लाभ भाजपा उठा सके।हर राजनैतिक विश्लेषक मान रहा है कि लखीमपुर-खीरी कांड उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के दृष्टिकोण से टर्निंग प्वाइंट साबित होनेवाला है।प्रशासनिक कदमों से अखिलेश यादव को उनके आवास से निकलने नहीं दिया गया,जबकि थोड़े अवरोधों के बाद राहुल-सोनिया लखीमपुर-खीरी तक गए।मीडियामें प्रियंका और कांग्रेस पार्टी को मिल रही तवज्जो भाजपा की इसी रणनीति का परिणाम दिखता है।
भाजपा का अन्दुरूनी-आन्तरिक द्वन्द्व भी कांग्रेस के आगे बढ़ने की पृष्ठभूमि तैयार कर रहा है।अगर, मोदी-शाह की मंशा योगी को निपटाने की है,तो योगी भी मोदी-शाहको धराशाई करने में जुटे हैं।श्रीराम मंदिर निर्माण भूमिक्रय घोटाले से संबंधित दस्तावेज का सार्वजनिक होना,बहुत कुछ कहता है। योगीजी किसान आन्दोलन को अघोषित तौर पर हवा दे रहे हैं,क्योंकि किसान आन्दोलन के निशाने पर मोदी-शाह हैं,न कि योगी।किसान आन्दोलन का राजनैतिक लाभ प्रियंका को मिलनेके पीछे भी योगी आदित्यनाथ का हाथ बताया जा रहा है।क्योंकि, उप्र में कांग्रेस जितनी मजबूत होगी,केन्द्रमें मोदी-शाह उतने ही कमजोर होंगे।
उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव,2007,2012और 2017में कांग्रेसको मिले वोटोंका अध्ययन,आकलन और विश्लेषण करें,तो 2007में उसे 8.61%वोट मिले और उसने 22सीटें जीतीं,2012में उसे 11.63%वोट मिले और उसने 28सीटें जीती,2017में उसे महज 6.25% वोट मिले और उसके सीटोंकी संख्या घटकर महज 7 रह गईं,वह भी तब जबकि अखिलेशके नेतृत्ववाली समाजवादी पार्टीसे उसका गठबंधन था।2-3महीने पहले तक कोई नहीं मान रहा था कि कांग्रेस अपना राजनैतिक वजूद स्थापित कर पाएगी।अखिलेश यादवने तो साफ-साफ कह दिया था कि इस बार वह कांग्रेस के साथ गठबंधन करने से रहे।गठबंधन नहीं रहने की दशा में कांग्रेसके सामने चुनौती पिछला परफार्मेंस दुहराने की थी।
विधानसभा चुनावके पैटर्न लोकसभा चुनावसे सर्वथा अलग होते हैं।ऐन चुनावके पहलेके 24घंटों में भी व्यापक उलटफेर की संभावना बनी रहती है।चुनाव की घोषणा होने में अभी भी दो महीने की देरी है और चुनाव होने में तकरीबन 4महीने की देरी है।और,अभी भी राजनैतिक परिदृश्य में व्यापक उलटफेर की संभावना बनी हुई है। प्रियंका गांधी पूरे मनोयोग से अपने अभियान में जुटी हैं। कांग्रेस का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि पूरे उत्तरप्रदेश में ढीला- ढाला ही सही उसका सांगठनिक ढांचा है।अभी भी लोकसभा चुनावके दृष्टिकोण से 206सीटें ऐसी हैं,जहां वह अकेले ही भाजपाको टक्कर देती है।राष्ट्रीय स्तर पर,कांग्रेसके नेतृत्व में ही प्रभावशाली गैर-भाजपा मोर्चा किसान आन्दोलनकी मांगें पूरी कर सकता है।
इसीलिए किसान चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन बनाकर लड़े।लेकिन,अगर कहीं गठबंधन नहीं बना और उन्हें दोनों में से किसी एक का चुनाव करना पड़ा तो कांग्रेस का समर्थन करना ज्यादा व्यवहारिक होगा।
किसान आन्दोलन के प्रभाव क्षेत्र पश्चिमी उत्तरप्रदेश की स्थानीय राजनीति में किसानों पर सबसे ज्यादा पकड़ पुराने जमाने के किसान नेता चौधरी चरण सिंह के पोते जयंत चौधरी की है।महज एक दो महीने पहले तक भाजपाको सबसे प्रभावशाली चुनौती देती और विकल्प प्रस्तुत करती सिर्फ समाजवादी पार्टी दिख रही थी।इसीलिए,राष्ट्रीय लोक दल के नेता जयंत चौधरी ने समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव के साथ समझौता करने और गठबंधन करने का फैसला किया था।समाजवादी पार्टी से गठबंधन करने पर मुख्यमंत्री पद तो अखिलेश के लिए सुरक्षित रहेगा,वह अपने लिए ज्यादा से ज्यादा राज्य मंत्रिमंडल में बेहतर स्थिति और अपनी पार्टी के लिए कुछ ज्यादा सीटें पाने की उम्मीद पाल सकते हैं।लेकिन,अगर कांग्रेस से समझौता हुआ,और आम चुनाव के बाद कांग्रेसके नेतृत्ववाला गठबंधन सत्तारूढ़ हुआ,तो केंद्रीय मंत्रिमंडलमें ज्यादा सम्मानजनक स्थिति में आ सकते हैं।इसीलिए,बदलते राजनीतिक परिदृश्य में उनके लिए व्यवहारिक दिखता है कि वह कांग्रेसके साथ गठबंधन करें और इस दिशामें वह बढ़ते हुए भी दिखते हैं।
1990के बाद उप्र की राजनीति जाति और सम्प्रदायके
समीकरणोंको साधनेकी राजनीति रही है।प्रियंकाने 40% टिकट महिलाओंको देनेकी घोषणा कर जाति और सम्प्रदायकी राजनीति पर गहरी चोट की है।उत्तरप्रदेशमें एक तबका वैकल्पिक राजनीति की मशाल थामे अमिताभ ठाकुर जैसे एक्टिविस्टों और वामपंथियों का भी है,जो कई खेमोंमें बंटे हैं।बुद्धिजीवियों का यह वर्ग मानता है कि देश को इस या उस नेता का नहीं,इस या उस पार्टी का नहीं पूरी सड़ी-गली राजनैतिक संस्कृति के विकल्प की तलाश है।प्रियंका गांधी ने अनौपचारिक रूप से इस वर्ग से संवाद स्थापित किया है।
वोटोंमें भाजपाके वोटोंके हिस्सा का अनुमान करें।भाजपाको 2007में16.97%,2012में 15%,2017में भाजपाके वोटोंमें जबरदस्त उछाल आया और वह 39.67% पर पहुंच गया।जाहिर सी बात है,भाजपा के कोर वोटर 15-17% ही हैं।पिछले 5साल में योगी की विफलता और भाजपा का अन्दुरूनी-आन्तरिक द्वन्द्व उसे 25%से ज्यादा वोट पाने के लिए आश्वस्त नहीं करता।2017में जब समाजवादी पार्टी सत्ता गंवाकर 47सीटों पर सिमट गई,तो भी उसे 21.82% वोट मिले थे,अगर वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में उसे 30%वोट मिलने का अनुमान किया जाए,तो भी बचे 45% वोट पर प्रियंका गांधी की निगाह है। किसान आन्दोलन के दबाव में राष्ट्रीय लोकदल के साथ उनके संभावित गठबंधन और भाजपा के अन्तर्द्वन्द का लाभ उठाते हुए वह कितना वोट कांग्रेस के पक्ष में ध्रुवीकृत कर पाती हैं,यह देखना खासा दिलचस्प होगा।
