“वित्त रहित शिक्षकों का जीवन: असुरक्षित और दुखों से भरा, अब आर-पार की लड़ाई का वक्त”
“वित्त रहित शिक्षकों का जीवन: असुरक्षित और दुखों से भरा, अब आर-पार की लड़ाई का वक्त”

जे टी न्यूज, मधेपुरा :
वित्त रहित शिक्षक अपने जीवन को असुरक्षित और दुखों से भरा मानते हैं। एक ओर जहां वे कॉलेजों में बंधुआ मजदूर की तरह काम कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर समाज और परिवार में उनकी उपेक्षा हो रही है। आर्थिक रूप से बेहद कमजोर इन शिक्षकों को साथी और परिजनों की चिंता तो दूर, तन ढकने के लिए अच्छे कपड़े तक नसीब नहीं होते, जिसके कारण वे अक्सर मानसिक अवसाद का शिकार हो जाते हैं। ये विचार वित्त रहित शिक्षक कर्मचारी संघर्ष मोर्चा के यूनिवर्सिटी अध्यक्ष प्रोफेसर मनोज भटनागर ने एक जारी विज्ञप्ति में व्यक्त किए।
प्रोफेसर मनोज भटनागर ने बताया कि 40 वर्षों तक वेतन की लालच में अपनी खुशियां प्राचार्य और सचिव के कदमों पर कुर्बान करने वाले ये शिक्षक किस तरह से प्रबंधन और सरकार से लड़ाई लड़ने की हालत में हैं। वे पहले ही अपनी जिंदगी की जंग में पूरी तरह थक चुके हैं। उन्होंने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे शिक्षक क्या नई पीढ़ी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे पाएंगे?
प्रोफेसर भटनागर ने आगे कहा कि अब विद्यार्थियों और अभिभावकों से अपील की जाती है कि वे वित्त रहित शिक्षकों के अधिकारों के लिए उनके संघर्ष में सहयोग करें, क्योंकि यदि अब ये लड़ाई नहीं लड़ी गई, तो वित्त रहित शिक्षा का यह पिशाच आने वाली पीढ़ियों को भी नष्ट कर देगा। उन्होंने बताया कि जल्द ही एक आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाएगी, ताकि शिक्षकों के सम्मान और अधिकारों की सुरक्षा की जा सके।

*अनुदान से वंचित शिक्षक, कुलपति की उदासीनता*
संगठन के अन्य वरिष्ठ नेताओं, जैसे कि प्रोफेसर बिनायक प्रसाद यादव, प्रोफेसर सच्चिदानंद सचिव, डॉ. नीला कांत, प्रोफेसर गीता यादव, प्रोफेसर लक्ष्मण यादव, प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार, प्रोफेसर अशोक यादव ने भी अपनी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय में उपयोगिता प्रमाण पत्र न भेजे जाने के कारण सैकड़ों शिक्षक अनुदान से वंचित हो गए हैं, जबकि बिहार के अन्य विश्वविद्यालयों को यह अनुदान मिल चुका है। इसका कुलपति की ओर से कोई भी ध्यान नहीं दिया जा रहा, जो कि बेहद दुखद और चिन्ताजनक है।
वित्त रहित शिक्षकों की स्थिति को सुधारने की आवश्यकता अब अत्यंत आवश्यक हो गई है। अगर यह संघर्ष अब नहीं लड़ा गया, तो आने वाली पीढ़ी को भी इसके नुकसान का सामना करना पड़ेगा। इसलिए अब समय आ गया है कि अभिभावक और विद्यार्थी इस आंदोलन में शामिल होकर, शिक्षकों की जिंदगी और शिक्षा दोनों की रक्षा करें।



