दर्द कुहासा
दर्द कुहासा

जे टी न्यूज़
बग़ैर सरगोशी,
बढ़ती रही ख़ामोशी।
भटक के दरबदर,
ओढ़ बैठी, सन्नाटे की चादर।
दर्द का कुहासा,
देता हरपल दिलासा।
उदासीनता भूला,
मुस्कुराहट का, पकड़ झूला।
कसके ले, थाम,
छोड़ चुप्पी, कर नाम।
मधुरिम सी, सांझ,
गुबार-ए-गर्द की चौखट लांघ।
सुकून भरे पल,
बिना किये, हुए छल।
देते हंसकर सहारा,
दिखा देते, डूबते को किनारा।
लेकर आलाप,
त्याग के व्यर्थ विलाप।
मंद मंद सा बहना,
“गिल” रग-रग में जोश भरना।
नवनीत गिल
एम.ए (इतिहास,राजनीति शास्त्र), बी.एड, एम.एड, एल.एल.बी।
पूर्व प्राचार्य
सीबीएसई विद्यालय (उत्तर प्रदेश)।


