पिछड़ो और गरीबों को पढ़ाई -लिखाई से वंचित करना चाहती है केंद्र की भाजपा सरकार

पिछड़ो और गरीबों को पढ़ाई -लिखाई से वंचित करना चाहती है केंद्र की भाजपा सरकार

प्रो अरुण कुमार/जेटी न्यूज


मधुबनी।केंद्र की भाजपा नीत मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों का असर अब होने लगा है।समाज में अब इस बात को लेकर सुगबुगाहट भी तेज होने लगी है।आम लोग आक्रोश भी व्यक्त करने लगे हैं।हम बात कर रहे हैं केंद्र सरकार की शिक्षा नीति की। केंद्र की भाजपा सरकार की शिक्षा नीति में आरएसएस का दखल है।आरएसएस की मंशा जगजाहिर है। उसकी पोलिसी शुरू से मनुस्मृति के आधार पर शासन करने की रही है। यही कारण है कि भाजपानीत केंद्र की सरकार शिक्षा को धीरे धीरे आम लागो की पहुंच से दूर करने लगी है। ताकि मनुस्मृति के हिसाब से पिछड़े व कमजोर लोगों को शिक्षा से वंचित किया जा सके।शिक्षा से वंचित करने के बाद स्वाभाविक रुप से पिछड़े व कमजोर वर्ग के लोग सत्ता से भी वंचित हो जाएंगे। इसी मकसद से एक सोची समझी रणनीति के तहत शिक्षा को दुरुह बनाया जा रहा है। ताकि समाज की एक बड़ी आबादी को अनपढ़ श्रेणी में रखा जा सके।
आप ट्रेन से बार बार सफर किया होगा। पहले सभी रेलवे स्टेशनों पर कम्पनी की किताब की दुकानें हुआ करती थी।इन दुकानों में उपन्यास, विभिन्न तरह की किताबें,पत्र, पत्रिकाएं पाठकों के लिए उपलब्ध रहती थी। स्टेशन के बुक स्टॉल से किताबें खरीद कर यात्रा के दौरान खाली समय में लोग पढ़कर अपने ज्ञानमे वृद्धि करते थे।साथ ही यात्रा भी आराम से तय हो जाता था।अब केंद्र की भाजपा सरकार ने सुनियोजित ढंग से रेलवे स्टेशनों के बुक स्टॉल को बंद कर दिया है।अब किताबों की जगह इन दुकानों में चाय , वास्ता, समोसा बेचबाया जा रहा है।यह आम लोगों को पढ़ाई लिखाई से दूर करने की चाल है ।लोग इस बात को समझने भी लगे हैं और आक्रोश भी ब्यक्त कर रहे हैं।


जानकारी के अनुसार मधुबनी जिले में डेढ़ दर्जन के करीब प्राइवेट कालेज है।इन कालेजों का अभी तक सरकारकरन केंद्र सरकार की उदासीनता के कारण नहीं हुआ है। इसमें अधिकांश कालेज ग्रामीण क्षेत्रों में अवस्थित है। यहां संसाधनों का आभाव है। शिक्षकों को वेतन नहीं मिलता है।
यहां गांव घर के पिछड़ा, दलित और कमजोर वर्ग के छात्र अध्ययन करते हैं।अगर केंद्र की सरकार मंशा साफ होती तो इन प्राइवेट कालेजों के अच्छे दिन आ गये होते। लेकिन केंद्र की मंशा शिक्षा को कम लोगों की पहुंच से दूर करने की है। इसलिए इन प्राइवेट कालेजों को केंद्र की सरकार विगत नौ वर्षों में अपने हाल पर छोड़ रखा है।लोग कहते हैं कि भला हो राज्य की नीतीश सरकार की इस सरकार ने कम-से-कम अनुदान देकर ही सही इन कालेजों को आम लोगों तक शिक्षा का अलख जगाने के जिंदा रखा है।
अभी हाल में केंद्र सरकार द्वारा चालू शैक्षणिक सत्र से नई शिक्षा नीति लागू की गई है। शैक्षणिक सत्र 2023-2027 में स्नातक प्रथम सेमेस्टर में कालेजों में छात्रों का नामांकन हुआ है। सीबीएसई पैटर्न आधारित सिलेबस लागू किया गया है।यह बात अच्छी है। लेकिन नई शिक्षा नीति के नाम पर छात्रों के कालेज फीस में 10 से 12 गुणा की बढ़ोत्तरी कर दी गई है ।अब स्नातक उत्तीर्ण होने में छात्र छात्राओं को 5000की जगह 45-50हजार रुपए फीस के रूप में अदा करना होगा।फीस में इतनी बढ़ोतरी आम व गरीब लोगों को शिक्षा से वंचित करने की केंद्र की भाजपा सरकार की एक सोची समझी बताया जा रहा है।इस बार भी पैसे के अभाव में कई छात्र स्नातक में नामांकन नहीं करा पाए हैं। यही कारण है कि आम लोगों और गरीब गुरबो का ग़ुस्सा और आक्रोश केंद्र की भाजपा सरकार के प्रति बढ़ता जा रहा है।
कुल मिलाकर केंद्र की भाजपा सरकार की कथित गरीब विरोधी शिक्षा नीति का परिणाम स्पष्ट होने लगा है। तथा इसको लेकर केंद्र सरकार के प्रति आम लोगों का आक्रोश भी बढ़ने लगा है।

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