हाशिए पर धकेल दी गई महिला मजदूरों को – हेमलता म्हस्के
हाशिए पर धकेल दी गई महिला मजदूरों को – हेमलता म्हस्के

जे टी न्यूज़, मुंबई मजदूर दिवस पर औपचारिक तरह से मजदूरों को याद कर लिया जाता है , रस्म अदा कर दी जाती हैr लेकिन उनके अधिकारों और कल्याण के लिए केंद्र और राज्यों की अनेक योजनाओं और कार्यक्रमों के बावजूद उनकी हालत में पर्याप्त सुधार नहीं हो पाता है और इन मजदूरों में खासकर महिला मजदूरों की हालत तो और भी और आज भी बहुत दयनीय है। उनके साथ तो ऐसे निर्मम आपराधिक व्यवहार किया जाता है मानों वह इंसान ही नही हो। भारत के संविधान में समानता के अधिकार दिए गए हैं बावजूद महिला मजदूरों को समानता के हक को हासिल करने के लिए भी अंतहीन संघर्ष करना पड़ रहा है। जब हम महिलाओं को इंसान समझते हैं तो महिला मजदूरों की दशा सुधारने के लिए कारगर पहल करने की जरूरत है। यह तब होगा जब उनकी समस्याओं को पहले चर्चा के केंद्र में लाना होगा। दुर्भाग्य तो यह है कि तथाकथित संपन्नता की अनावश्यक खबरें तैरती रहती हैं लेकिन महिला मजदूरों की समस्याओं पर अलग से पूरी गंभीरता से सोचने की जरूरत नहीं समझी जाती है। उनकी समस्याओं को खबरों की दुनिया में हाशिए पर भी जगह नहीं मिलती। मजदूर दिवस पर भी नहीं। महिला मजदूरों के साथ कार्यस्थल पर अनेक अमानवीय और अशोभनीय बर्ताव किया जाता है । माहवारी में भी उन्हें काम में झोंका जाता है और उनके गर्भाशय तक षडयंत्र पूर्वक निकाल दिए जाते हैं। उनकी तकलीफों की सूची छोटी नही हैं। अनंत हैं। ज्यादातर जगहों पर समान श्रम के बाद भी उनको मजदूरी पुरुष मजदूरों से कम दी जाती है अक्सर मजदूर महिलाओं को कार्यस्थल (कारखानों, निर्माण कार्य, रेहड़ी-पटरी आदि क्षेत्र) पर शौचालय की कमी से दो-चार होना पड़ता है। -बच्चों को सुलाने या दूध पिलाने की जगह उपलब्ध नहीं होती। – असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को मातृत्व अवकाश की सुविधा नहीं होती। – इनकी मजदूरी दर, काम के घंटे नियम आदि की भी बड़ी समस्या है। महिला मजदूरों के हित में कानून बनाए गए हैं हैं लेकिन उनको अमल में नहीं लाया जाता है। पीड़ित महिला मजदूर इतनी ताकतवर भी नही होती की वे उन पर अमल करवा ले। समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 एवं प्रसूति हितलाभ अधिनियम, 1961 में महिला श्रमिकों के हित संरक्षण के लिये विशेष प्रावधान रखे गए है। समान पारिश्रमिक हित संरक्षण हेतु समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 के अंतर्गत महिला श्रमिकों को समान कार्य के लिए पुरूषों के समान वेतन पाने का अधिकार है और इसमें भेद-भाव करना दंडनीय अपराध
श्रम के क्षेत्र में उनकी भागीदारी भी देश की परिस्थियों के हिसाब से काम नही हैं। महिला मजदूरों की संख्या 146.89 मिलियन थी या कुल श्रमिकों का केवल 32.2 प्रतिशत थी। इन महिला श्रमिकों में लगभग 106.89 मिलियन या 72.8 प्रतिशत कृषि कार्य करती थी यहां तक कि पुरुष श्रमिकों में उद्योग की भागीदारी केवल 48.8 प्रतिशत था। ग्रामीण श्रम-शक्ति में उद्योग की कुल भागीदारी लगभग 56.6 प्रतिशत थी।
असंगठित क्षेत्र में कामकाजी महिलाओं को अधिक समय तक कार्य करना पड़ता है। प्रायः महिलाएँ लगभग 8-9 घण्टे घरों से बाहर कार्य करती है। जिससे महिलाओं को घर और बाहर दोहरी भूमिका का निर्वाह करना पड़ता है। इस कारण कामकाजी महिलाऐं घर के सदस्यों की देख-रेख अच्छी तरह से नहीं कर पाती है।

,महिला मजदूरों के बारे ने एक आयोग ने जो पहल की है जिसकी सराहना की जानी चाहिए लेकिन इसी के साथ यह भी पता चलता है कि महिला मजदूरों की वास्तविक हकीकत क्या है। महाराष्ट्र के अहमद नगर जिले की श्रीगोंडा तहसील में कई चीनी मिलों के लिए गन्ना काटने में लगी महिला मजदूरों की दुर्दशा के बारे में एक मीडिया रिपोर्ट पर स्वत: संज्ञान लिया है। उनमें से दस प्रतिशत गर्भवती हैं लेकिन अपने कानूनी अधिकारों और विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत सुनिश्चित लाभों से अनजान हैं। उन्हें कोई मातृत्व अवकाश और शिशु देखभाल सुविधाएं नहीं दी जाती हैं और संबंधित विभागों द्वारा उन्हें कोई स्वस्थ आहार भी प्रदान नहीं किया जाता है।
आयोग ने पाया है कि समाचार रिपोर्ट की सामग्री, यदि सच है, तो असहाय गरीब महिला मजदूरों के मानवाधिकारों के उल्लंघन के गंभीर मुद्दे उठाती है। गरीब मजदूरों और महिला श्रमिकों सहित समाज के कमजोर वर्गों के कानूनी अधिकारों की रक्षा करना राज्य का प्रमुख कर्तव्य है, जो बिना किसी विशेष देखभाल के काम के दौरान बच्चे को जन्म दे रहे हैं, हालांकि कानून के तहत इसकी गारंटी है। तदनुसार, इसने महाराष्ट्र सरकार के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर 4 सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।

11 जनवरी, 2023 को जारी मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, श्रीगोंडा के तालुका चिकित्सा अधिकारी ने कहा है कि उनके पास लगभग 35 महिला मजदूरों का रिकॉर्ड है, जिन्होंने चालू फसल सीजन में बच्चों को जन्म दिया है। उन्होंने श्रीगोंडा तहसील के अंतर्गत आने वाले सात प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) से संबंधित डेटा दिया है और यह भी कहा है कि कारखानों और बागवानों के प्रबंधन के लिए इन महिला मजदूरों के बीच स्वस्थ आहार के अधिकार के बारे में जागरूकता पैदा करना आवश्यक है, कुछ दिन ‘गर्भावस्था की अवधि के दौरान और प्रसव के बाद छुट्टी और आवश्यक स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधाएं।


