भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन का सितारा और देश में सेकुलर सियासत की धुरी
भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन का सितारा और देश में सेकुलर सियासत की धुरी

जे टी न्यूज, दिल्ली: भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के अखिल भारतीय महासचिव, प्रख्यात मार्क्सवादी चिंतक और वामपक्ष व मेहनतकश अवाम के अन्यतम लोकप्रिय नेता का.सीताराम येचुरी के निधन पर आयोजित यह स्मृति सभा उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनके सपनों का भारत बनाए जाने के संघर्ष को आगे ले जाए जाने का संकल्प व्यक्त करता है. उनका निधन 12 सितंबर 2024 को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में हो गया. वे 72 वर्ष के थे तथा फेफड़े के गंभीर संक्रमण के ईलाज के लिए पिछले 19 अगस्त से एम्स में भर्ती थे. वहां के डाक्टरों की टीम के अथक प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका.
का. सीताराम येचुरी अपनी पढ़ाई के दौरान ही 1974 में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया(एसएफआई) के सदस्य बने और छात्र आंदोलन में शामिल हो गए. आपातकाल के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. जेल से रिहा होने के बाद वह तीन बार जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने
गए. वर्ष 1978 में वे एसएफआई के संयुक्त सचिव और बाद में अखिल भारतीय अध्यक्ष निर्वाचित हुए. उन्होंने सीबीएसइ बोर्ड की 12 वीं की परीक्षा में आल इंडिया टाप किया था. इसके बाद दिल्ली के सेंट स्टीफंस कालेज से अर्थशास्त्र में प्रथम श्रेणी में स्नातक और जेएनयू से स्नातकोत्तर की डिग्री भी प्रथम श्रेणी में हासिल की. जेएनयू से ही पीएचडी करने के दौरान वे जेल भेज दिए गए, और उनकी पीएचडी पुरी नहीं हो सकी. छात्र जीवन में ही वे वर्ष 1975 में पार्टी के सदस्य बन
गए थे. 1985 में सीपीआई (एम) की 12 वीं पार्टी कांग्रेस में वे केंद्रीय कमिटी के सदस्य चुने गए और 1989 में पार्टी के केंद्रीय सचिवालय तथा 1992 में पोलिट ब्यूरो सदस्य बनाए गए. वर्ष 2015 में विशाखापत्तनम में संपन्न पार्टी के 21वें महाधिवेशन में वे सीपीआई (एम) के महासचिव निर्वाचित हुए. वे दो कार्यकाल तक राज्यसभा के भी सदस्य रहे. एक सांसद के रुप में उन्होंने देश के वंचित, शोषित समुदायों और संघर्षशील मजदूर वर्ग की आवाज को मुखरता से उठाने का काम किया. संसद में जब वे बोलते थे तब सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों उनकी बातों को ध्यान से सुना करते थे.
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उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद भी घोषित किया गया. देश की राजनीति में उनकी आवाज केवल वामपक्ष की पार्टियों तक सीमित नहीं थी. सांप्रदायिक ताकतों की नफरत भरी मुहिम के खिलाफ अभियान संगठित करना हो या गठबंधन की राजनीति, उन्होंने एक शिल्पकार और रणनीतिकार के रूप में ऐसा किरदार निभाया कि वे देश की धर्मनिरपेक्ष शक्तियों की जरूरत बन गए. युपीए सरकार के समय साझा न्युनतम कार्यक्रम तैयार करना हो या आइएनडीआइए गठबन्धन को मज़बूत कर देश की सत्ता पर काबिज एकाधिकारवादी ताकतों को चुनौती देने का काम सभी में का. येचुरी ने प्रमुख भूमिका अदा की थी. उनकी असामयिक मौत के बाद दुनिया के कई देशों से आए शोक संवेदना संदेश तथा दिल्ली के पार्टी मुख्यालय ए. के. गोपालन भवन में उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे विभिन्न देशों के दुतावासों के राजनयिकों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जाने – माने राजनीतिज्ञ थे. उनकी मृत्यु के बाद विभिन्न देशों की कम्युनिस्ट और वर्कर्स पार्टियों द्वारा भी लगातार शोक संवेदना संदेश पार्टी की केन्द्रीय कमिटी को मिल रहा है.
का. सीताराम येचुरी का झारखंड से भी गहरा संबंध था झारखंड के गठन से 4 दिन पूर्व 10 नवंबर 2000 को उनके देख-रेख में ही पार्टी की झारखंड राज्य कमिटी का गठन किया गया था. झारखंड बनने के बाद पार्टी के राज्य कार्यालय का उद्घाटन भी उन्हीं के द्वारा किया गया
झारखंड बनने के कुछ ही दिन पहले तत्कालीन रातू प्रखंड के दलादिली गांव में जमींदारों ने तीन आदिवासी किसानों की गोली मारकर हत्या कर दी थी. जिसका जबर्दस्त प्रतिरोध हुआ और हमलावर भी मारा गया. जिसमें कई आदिवासी रैयतों को आजीवन कारावास की सजा भी हुई. इस संघर्ष के बाद सीताराम येचुरी दलादिली गांव आए और वहां आयोजित विरोध सभा को संबोधित किया. उस समय उन्होंने कहा था कि नए राज्य में वामपक्ष को रैयतों और आदिवासियों के जमीन की लूट को रोकने के लिए तीखा संघर्ष करना होगा. 15 नवंबर 2000 को जब झारखंड का गठन हुआ उस समय केंद्र में एनडीए की सरकार थी. यहां जोड़ – तोड़ कर और पुरी रांची को पुलिस छावनी में तब्दील कर बिहार विधानसभा के लिए निर्वाचित विधायकों को लेकर ही भाजपा ने बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में सरकार का गठन करा दिया.
उस समय का. सीताराम येचुरी ने नया प्रदेश नया जनादेश का नारा देकर यहां अविलंब चुनाव कराए जाने की मांग की थी.
वे झारखंड बनने के बाद पोलिट ब्यूरो की ओर से 2 वषों तक झारखंड के प्रभारी भी रहे. वे झारखंड में वाम राजनीतिक आंदोलन को प्रखर किए जाने के लिए यहां के आदिवासियों के अधिकारों और यहां के औधोगिक विकास के लिए महत्वपूर्ण खनिज कोयला उधोग को मुख्य आधार बनाने पर जोर देते थे. उनका मानना था कि कोयला खनन से उत्पन्न विस्थापन और प्रदूषण के मुद्दे को केंद्र में लाने के साथ – साथ आदिवासियों को संविधान द्वारा दिए गए विशेष अधिकारों की रक्षा के संघर्ष को धारदार बनाने की जरूरत है. उन्हीं की पहल पर झारखंड में पहली बार आदिवासियों का एक अखिल भारतीय सम्मेलन कर आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच की स्थापना की गई.
का. सीताराम येचुरी मार्क्सवाद की
व्याख्या करते हुए इस बात पर जोर देकर कहते थे कि मार्क्सवादी हमेशा ठोस परिस्थितियों का ठोस विश्लेषण करके ही सामाजिक -आर्थिक परिवर्तन की लड़ाई को आगे ले जा सकते हैं. वे पार्टी के वैचारिक श्रोत भी थे. उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी, वे एक प्रखर पत्रकार भी थे एक समय अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स के नियमित स्तम्भकार भी रहे थे. ‘लेफ्ट हैंड ड्राइव’ कालम के नाम से उन्होंने कई वषों तक सामयिक मुद्दों पर लिखा. जो बाद में किताब के रुप में भी प्रकाशित हुआ. उन्होंने कई वर्षों तक पार्टी के मुखपत्र पीपुल्स डेमोक्रेसी का संपादन भी किया.
उनकी बौद्धिकता का सभी लोहा मानते थे. संपूर्णता में उन्हें सिद्धांत को व्यवहार में तब्दील करने की
कला में महारथ हासिल थी.
उनके असामयिक निधन से भारत में सीपीआई (एम) एवं वाम आंदोलन के साथ – साथ आज की चुनौतीपूर्ण सांप्रदायिक – कार्पोरेट गठबंधन के खिलाफ जारी संघर्ष को भी नुकसान हुआ है.
आज का. सीताराम येचुरी को श्रद्धांजलि दिए जाने के लिए आयोजित इस स्मृति सभा से हमे यह संकल्प लेना है कि शासक वर्ग द्वारा देश के किसानों – मजदूरों के जीवन और आजीविका पर क्रमबद्ध तरीके से किए जा रहे हमलों और मेहनतकशों की एकता को कमजोर किए जाने के लिए उन्हें सांप्रदायिक आधार पर विभाजित किए जाने की साजिशों का डटकर मुकाबला करेंगें ताकि एक जनपक्षीय नीतियों के आधार पर एक बेहतर भारत का निर्माण किया जा सके.
का. सीताराम येचुरी को लाल सलाम





