भ्रस्टाचार उन्मूलन के लिए भी जातीय जनगणना और जनसँख्या के अनुपात में भागीदारी जरुरी है – धर्मेन्द्र कुमार यादव
भ्रस्टाचार उन्मूलन के लिए भी जातीय जनगणना और जनसँख्या के अनुपात में भागीदारी जरुरी है – धर्मेन्द्र कुमार यादव
जे टी न्यूज़

भ्रस्टाचार शब्द बहुत भयानक शब्द है जो आम आदमी को दहशत में डाल देता है और व्यवस्था में कुर्सी पर बैठा इन्सान, कुर्सी की रक्षा कर रहे कर्मचारी आदि के लिए अतिरिक्त आय का श्रोत पैदा कर देता है. अर्थशास्त्र की भाषा में ‘किसी व्यक्ति द्वारा (सौंपे गए) प्राप्त शक्ति का निजी लाभ के लिए उपयोग करना हीं भ्रस्टाचार है’. कई अर्थशास्त्री और मनोवैज्ञानिक इसे नैतिक चरित्र का पतन मानते हैं और यह सच भी है क्योंकि नैतिकता का दमन किये बिना कोई भ्रस्टाचार कर हीं नहीं सकता है. चाणक्य अपने किताब अर्थशास्त्र में भी भ्रस्टाचार का वर्णन करते हैं मतलब अर्थशास्त्र लिखते समय भी भ्रस्टाचार था. अतः यह बीमारी नई नहीं है. एक लोकप्रिय कहानी है. कभी किसी राज्य में एक चोर था जो आने जाने वाले राही को लुटता था. उसकी शिकायत राजा तक पहुंची. राजा ने उसे अपना दरबारी बना लिया और राजमहल के मुख्य द्वार पर ड्यूटी लगा दिया. कुछ दिन में उसकी शिकायत आई कि वो हर आने जाने वाले से बिना कुछ घुस लिए राजा से मिलने हीं नहीं देता है. तब राजा ने उसकी ड्यूटी रानियों के महल के सामने लगा दिया. कुछ दिन बाद वो रानियों से मुद्राएँ ऐठने लगा कि अगर मुद्रा नहीं दिया तो राजा को बता दूंगा कौन कौन व्यक्ति किस किस रानी से कब कब मिलने आता है. अब राजा ने उसकी ड्यूटी नदी किनारे लगा दिया कि जाओ नदी में बहने वाली लहरों की गिनती करते रहो अर्थात राजा का कहने का मतलब था वहीँ जाकर सड़ते रहो. चोर वहां भी आने जाने वाले नाविकों से पैसा लेना शुरू कर दिया यह कह कर कि तुमने नदी की लहर को तोड़ा है और राजा के आदेश का पालन नहीं किया है. राजा तक फिर शिकायत गयी कि वो वहां भी पैसे लेने लगा. राजा थक हार कर उसे आजाद कर दिया कि जाओ तुम्हें जैसे जीना हो जिओ क्योंकि वह चोर अपनी नैतिकता को मार चूका था और चोरी करना हीं उसका कर्म और धर्म बन चूका था. परेशान जनता ने जानना चाहा कि आखिर राजा उसे दण्डित क्यों नहीं कर रहा है तो मालूम हुआ वह चोर राजा की बिरादरी का एक रिश्तेदार है. कुछ ऐसी हीं कहानी है भ्रस्टाचार और उसके खिलाफ कार्यवाई की. लोकतंत्र में हमेशा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संघर्ष शासक और शोषित वर्गों के बीच चलता रहता है. शासक वर्ग किसी भी क्षेत्र में शोषितों को बढ़ने देना नहीं चाहता है और हर जगह उसका शोषण करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ता है. भ्रस्टाचार सिर्फ इसीलिए नहीं होता है कि अमुक व्यक्ति को पैसा कमाना होता है बल्कि इसीलिए भी होता है कि अमुक इन्सान को आर्थिक दृष्टि से कमजोर भी करना होता है और इसके लिए कुर्सी पर बैठा हुआ बाबु, उसका मददगार किरानी और उसके दफ्तर के आगे खड़ा चपरासी इंसानों के काम में कमी निकालता है उसके फाइल में कागज की कमी निकालता है और अगर सब कुछ ठीक है तो साहब का धौंस दिखाता है कि साहब बहुत कड़क इन्सान हैं. बचा खुचा पेंच किरानी पूरा कर देता है. नतीजा आम इन्सान समय और लेट लतीफी के कारण भ्रस्टाचार का सहारा लेता है और काम उसका आगे बढ़ जाता है.

मेरे मरहूम दादा जी स्व. प्रभु यादव कहा करते थे कि कभी शासक वर्गों ने एक मीटिंग किया था और उसका प्रश्न था कि ‘कैसे इस देश पर स्थायी शासन किया जाये जिसमें प्रतिरोध का सामना कम करना पड़े’? उसी में फैसला आया था कि अगर इंसानों से चार चीजे छीन ली जाय तो उस पर चिरस्थायी शासन किया जा सकता है: पहला संपत्ति से मुक्त करना, दूसरा शिक्षा से मुक्त करना, तीसरा समय से मुक्त करना और चौथा स्वाभिमान से मुक्त करना. कहने का अर्थ है कि अगर किसी समाज से संपत्ति, शिक्षा, समय और स्वाभिमान छीन लिया जाय तो वो कौम सदियों तक बिना प्रतिरोध के गुलाम बना रह सकता है. दादा जी के अनुसार शायद वामनावतार की भी यही कहानी थी. शासक वर्ग पहले शोषित वर्ग को पढ़ने से रोकता है. अगर फिर भी वो पढ़ना चाहे तो उसे उचित शिक्षा से दूर रखा जाता है वो वर्ग में न आये इसकी पूरी कोशिश की जाती है और एन केन प्रकारेण उससे पैसे ऐठा जाता है उपस्थिति के नाम पर, नामांकन के समय, परीक्षा के समय, परिणाम के समय, मार्क्स बढ़ाने के नाम पर, प्रायोगिक परीक्षा के नाम पर आदि आदि. हर जगज हर दफ्तर में लगभग यही कार्यशैली होता है. तो क्या कार्यालय में सुधार संभव नहीं है? उत्तर है हाँ लेकिन वर्तमान परिस्थिति में तो बिलकुल संभव नहीं है. भारतीय लोकतंत्र अभी शिशु की अवस्था में हीं है और शासक वर्ग इसे युवा करना हीं नहीं चाहता है. इस देश का इतिहास एक अबूझ पहेली से कम नहीं है. लोगों का कहना है कि पहले यह देश पूरी तरह से बौद्ध धर्म द्वारा शाषित था और यहाँ छल, कपट, नफ़रत नाम की चीज नहीं थी. इसकी लोकप्रियता एशिया से बाहर जा चूका था जिसका प्रमाण है एशिया में फैला बौद्ध धर्म और बुद्ध धर्म के उपदेश. जब आर्यों का आक्रमण हुआ तो बौद्ध धर्म का पतन शुरू हुआ और इसी के सामानांतर कुछ नए धर्मों का जन्म भी हुआ. वर्तमान में यहाँ धर्म के नाम पर वर्चस्व की लड़ाई चल रही है और बौद्ध, जैन, इस्लाम, इसाई, सिख धर्मो के खिलाफ मानों एक युद्ध चल रहा हो और यह हिन्दू एवं सनातन धर्म के नाम पर हो रहा है.
हिन्दू धर्म ग्रंथों में चार लेकिन मूल रूप से पांच वर्णों में विभाजित है जिसे दो मुख्य भाग फॉरवर्ड और बैकवर्ड में बांटा जा सकता है. बैकवर्ड में दलित, पिछड़े और आदिवासी समाज को गिना जाता है. मुसलमान कौम में भी लोगों को व्यवस्था अनुसार इन्हीं वर्गों में बांटा गया है और उन्हें भी कहीं कहीं दलित, पिछड़े वर्गो में रखा गया है. इस तरह अनुमानतः फॉरवर्ड की संख्या लगभग दस फीसदी और बैकवर्ड की संख्या नब्बे फीसदी मानी जाती है और शायद इसी के कारण पर फॉरवर्ड को दस फीसदी गरीबी के आधार पर आरक्षण दिया गया है. इस तरह फॉरवर्ड शासक वर्ग और दलित, पिछड़े, आदिवासी के लोग शोषित वर्ग की श्रेणी में गिने जाते हैं. ब्रिटिश साम्राज्य से 1947 में आजादी के बाद देश की सरकारी और निजी संस्थानों एवं अन्य व्यवस्थाओं में शासक वर्गों की धड़ल्ले से भर्तियाँ हुयी और शोषित वर्गों को एन केन प्रकारेण किनारे रखा गया. लोकतान्त्रिक देश होने के बावजूद नब्बे फीसदी आबादी को व्यवस्था में भागीदारी लगभग नगण्य देकर उन्हें मात्र ग्राहक, उत्पादक और करदाता बना कर रखा गया. देश के छोटे से बड़े संस्थानों में शासक वर्गों की उनके जनसँख्या से अधिक भागीदारी ने उनके तानाशाही प्रवृति को बढ़ावा दिया. व्यवस्था में यह बात बड़े आराम से महसूस किया जा सकता है कि किस तरह से कोई काम शासक वर्गों का बड़े आराम से हो जाता है जबकि शोषित वर्गों को महीनों दौड़ाया जाता है और फिर उनके काम करने के एवज में वसूली की जाती है. हालाँकि इस वसूली का शिकार शासक वर्ग के आम लोग भी होते हैं लेकिन फिर भी उन्हें उतना परेशान नहीं होना पड़ता है जितना शोषित वर्ग के लोग होते हैं.
यह देखा गया है कि चपरासी से लेकर बड़े पदों तक शासक जातियों का दबदबा रहता है और अगर एकाध शोषित वर्ग के लोग मिल भी जाएँ तो उनकी हिम्मत नहीं होती है कि वो शासक वर्ग के खिलाफ जाकर अपने लोगों की मदद कर सके और अगर करते भी हैं तो बहुत जल्द उनकी गर्दन शासक वर्ग के हाथों में आ हीं जाती है. यही कारण है कि अधिकांश दफ्तरों में शोषित वर्ग के लोग पैसे देकर हीं अपना काम निकालने में बुद्धिमानी समझते हैं लेकिन पिस्ता इसमें शासक वर्ग के लोग भी हैं. जब शोषित वर्ग के अधिकारीयों से पूछा जाता है कि आप अपने लोगों के खिलाफ हो रहे शोषण का विरोध क्यों नहीं करते हैं तो उनका यही जवाब मिलता है कि उनको सहयोग करने वाला कोई नहीं है उनके लोगों की भागीदारी उतना नहीं है जितना होना चाहिए.
स्वाभाविक है तालाब में रहकर मगरमच्छ से कोई बैर नहीं करना चाहेगा लेकिन ऐसा निरंतर होते रहना भी तो देश के लिए घातक है. अक्सर पाकिस्तान को लेकर मुसलमानों को निशाना बनाया जाता है कि उन्होंने धर्म के नाम पर अलग देश बनाया लेकिन इस बात की चर्चा नहीं होती है की नए देश की जरुरत हीं क्यों पड़ी, क्यों उन्हें इस देश में अपना भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा था? सारे सवाल का जवाब यहीं मिल जाता है. जब देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं के बहुसंख्यक आबादी को न्याय और अधिकार नहीं मिल पा रहा है तो मुसलमानों का क्या होता? कई कारणों में यह एक प्रमुख कारण था देश विभाजन का क्योंकि अगर विभाजन के लिए सिर्फ धर्म आधार होता तो बांग्लादेश नया देश नहीं बनता.

खैर मुख्य बिंदु पर आते हैं. आज निजी हो या सरकारी संस्थानें, हर जगह शासक वर्गों की भागीदारी उनकी आबादी से कहीं ज्यादा है जबकि शोषित वर्गों को ढूँढना पड़ता है. अगर हर विभाग में हर वर्ग की उचित भागीदारी हो जाय तो भ्रस्टाचार पर लगाम लगाया जा सकता है क्योंकि जो जो कमियां निकाली जाती है वसूली के लिए उनमें अधिकांश का कोई आधार हीं नहीं होता है लेकिन किरानी और चपरासी उसी को सब कुछ घोषित कर देते हैं और भ्रस्टाचार निरंतर फलता फूलता रहता है. जब इसके खिलाफ बगावत की शुरुआत होती भी है तो राजा की हीं तरह अनेक राजा व्यवस्था में मौजूद होते हैं जो अपने अपने रिश्तेदारों और बिरादरियों को बचा ले जाते हैं और जिनका कोई नहीं होता है वो फंस जाते हैं. भ्रस्टाचार का प्रकार विभागों के अनुसार भी बदलते हैं. जब भ्रस्टाचार करने वाले शासक वर्गों के रहनुमा और उनके करीबी चंदा देने वाले लोग होते हैं तो वहां की व्यवस्था कुछ अलग होती है. कहने का तात्पर्य है कि देश के महत्वपूर्ण अंग विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, संसद और मीडिया में अलग अलग तरह के भ्रस्टाचार होते हैं लेकिन हर जगह एक हीं कमी है सभी वर्गों की उचित भागीदारी नहीं होना. जिस दिन सभी वर्गों की उचित भागीदारी हो जाएगी, भ्रस्टाचार पर लगाम लगाना बहुत आसान हो जायेगा और इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. अतः भ्रस्टाचार को नियंत्रित और कम करने के लिए जातीय जनसँख्या करवाना और सभी वर्गों को उसके जनसँख्या के बराबर आरक्षण देकर हर विभाग में उनकी उचित और आनुपातिक भागीदारी तय करना अनिवार्य है क्योंकि जब सभी वर्ग अपने अधिकार को प्राप्त कर लेंगे तो लोग अपने कर्तव्यों से मुंह कम मोड़ेंगे और नैतिकता का विकास भी तभी होगा जब उनमें किसी भय की चिंता नहीं रहेगी.
(प्रस्तुत आलेख लेखक के अपने विचार हैं)
