नितीश – भाजपा के शासन-प्रशासन में छिनाझपटी, भ्रष्टाचार अधिक बढ़ गई-
नितीश – भाजपा के शासन-प्रशासन में छिनाझपटी, भ्रष्टाचार अधिक बढ़ गई-राम सुदिष्ट यादव
जे टी न्यूज़, मधुबनी : ज्ञातव्य है कि 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव हुई थी। इस चुनाव में बीजेपी ने चिराग पासवान को इस्तेमाल कर के एनडीए के सहयोगी बिहार में सबसे बड़े पार्टी जदयू को एक षडयंत्र के तहत तीन नंबर 43 विधायक की पार्टी बना दी। वहीं भाजपा 74 विधायक लाकर दूसरे नंबर की पार्टी बन गयी। वहीं राजद सबसे अधिक 75 सीटें जीतकर बड़े दल बनकर सामने आया था। फिर भी भाजपा ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री तो बनाया, लेकिन शासन-प्रशासन में भाजपा का हस्तक्षेप अधिक बढ़ गई। परिणाम स्वरुप अधिकांश बढ़िया विभाग बीजेपी ने हथिया लिया। अतिपिछड़ा वर्ग को कोई महत्वपूर्ण विभाग नहीं मिल सका। शासन-प्रशासन में छिनाझपटी, भ्रष्टाचार अधिक बढ़ गई।9 अगस्त 2022 को नीतीश कुमार ने बिहार में एनडीए भाजपा का साथ छोड़कर राजद महागठबंधन की सरकार बना ली। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मंत्रीमंडल में तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बनाए गए।जदयू-राजद-कांग्रेस-सीपीआई माले आदि महागठबंधन की सरकार आने के बाद बिहार में सरकारी नौकरी रोजगार की बहार आ गई। तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री से अपने शर्तों को पुरा करने केलिए विभिन्न विभागों में बीपीएससी के माध्यम से नौकरी देने लगा। तेजस्वी यादव ने 2020 विधानसभा चुनाव में राज्य के शिक्षित छात्र-छात्राओं, बेरोजगार नौजवानों से वादा कर भरोसा दिलाया था कि जब हमारी सरकार सत्ता में आयेगी तो 10 लाख लोगों को नौकरी रोजगार देने का काम करेंगे। नौजवान के हितों को हमारी सरकार गम्भीरता से लेंगी।बिहार में महागठबंधन की सरकार कुल 17 महिना रही। इस 17 महिनों के सरकार में सरकारी नौकरी रोजगार लगभग 5 लाख नौजवानों को दी गई।लालू एवं तेजस्वी यादव की पार्टी आरजेडी एवं कांग्रेस के साथ जाने के बाद नीतीश कुमार ने बहुत कुछ पाया भी था। नीतीश के कई करीबी उनका साथ छोड़कर चले भी गए, तो वहीं उन्होंने देशभर के विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने का काम भी किया
9 अगस्त 2022 को नीतीश कुमार ने बिहार में एनडीए का साथ छोड़कर महागठबंधन की सरकार बनाई थी। सीएम नीतीश ने 10 अगस्त को आठवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जबकि आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के छोटे पुत्र तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम बने। बीजेपी जो सरकार में थी वो विपक्ष में आ गई और प्रतिपक्ष में बैठे आरजेडी-कांग्रेस जैसे दल सत्ता में आ गएमहागठबंधन सरकार का एक साल : नीतीश ने क्या खोया?
पिछले एक साल में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए चुनौती भरा माना जा सकता है। आरजेडी के साथ सत्ता में आने के बाद उन पर बिहार में जंगलराज (यानि विशुद्ध पिछड़ा राज्य) की वापसी कराने के आरोप लगे। यानि अगरा विरोधी सरकार की संज्ञा देने लगे। उनके कई करीबी सवर्ण साथी उनका साथ छोड़कर चले गए।
इधर जेडीयू संसदीय बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे उपेंद्र कुशवाहा ने पार्टी छोड़कर रालोजद नाम से नया दल बना लिया और एनडीए के साथ गठबंधन में साथ हो लिए। पूर्व सीएम जीतनराम मांझी की पार्टी भी उनसे अलग हो गए। उनकी पार्टी ने महागठबंधन सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और एनडीए के साथ नाता जोड़ लिया। इसके अलावा जेडीयू के कई छोटे-बड़े नेता भी बीजेपी में चले गए।लालू और तेजस्वी यादव, से उन्होंने अपने संबंध भले ही मधुर रखे, लेकिन जेडीयू और आरजेडी के नेता कई मुद्दों पर आपस में एक-दूसरे के खिलाफ मुखर नजर आए। नीतीश सरकार में आरजेडी कोटे से कानून मंत्री रहे कार्तिक सिंह के अपहरण केस में नाम आने के बाद विवाद उठा और कुछ दिनों बाद ही मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। वहीं, कृषि मंत्री रहे सुधाकर सिंह ने सरकार में रहते हुए ही नीतीश पर कई बार सवाल उठाए, उन्हें भी बाद में कैबिनेट छोड़नी पड़ी। शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर की रामचरितमानस श्लोक पढ़ने और अर्थ समझाने पर जेडीयू और आरजेडी में तनातनी देखी गई। हालांकि, बाद में यह मुद्दे ठंडे बस्ते में चला गया।
लालू एवं तेजस्वी यादव से हाथ मिलाने के बाद नीतीश कुमार ने बीजेपी से अलग होने के बाद 2024 लोकसभा चुनाव के मद्देनजर देशभर के विपक्षी दलों को एकजुट करने का ऐलान किया। सितंबर 2022 में वे सोनिया गांधी, अरविंद केजरीवाल, शरद पवार समेत कई विपक्षी नेताओं से मिले। हालांकि, कुछ महीनों के लिए उनकी यह मुहिम अधर में लटक गई। साल 2023 में उन्होंने फिर से जोर लगाया और देशभर के विपक्षी नेताओं से दोबारा मुलाकात की। सभी को एकजुट कर पटना में एक बैठक कराई।नीतीश कुमार की मेहनत रंग लाई और देशभर की 20 से ज्यादा पार्टियां एक छत के नीचे आ गई। पटना के बाद मुंबई में हुई बैठक में इस गठबंधन का नाम इंडिया पड़ गया। पिछले एक साल में नीतीश कुमार राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि को चमकाने में कुछ हद तक सफल रहे थे। उन्हें इंडिया गठबंधन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने की भी चर्चा थी। इस विषय पर सभी घटक दलों से विमर्श भी चल रहा था। 2025 लोकसभा चुनाव में उन्हें गठबंधन की ओर समाज महत्वपूर्ण भूमिका में लाने की संभावना थी।समाधान यात्रा के तहत विपक्षी भाजपा ने बिहार का दौरा कर कानून व्यवस्था, शराबबंदी और अन्य मुद्दों पर महागठबंधन सरकार को घेरने का प्रयास करती थी। राज्य में जंगलराज की वापसी की ढ़िंढ़ोरा पिट रही थी।
वहीं नीतीश कुमार ने अपनी छवि को सुधारने और जनता के बीच पैठ बढ़ाने के लिए बिहार का दौरा भी किया। सीएम नीतीश ने जनवरी और फरवरी में 28 दिन के अंदर कई जिलों का दौरा किया था और विकास कार्यों का जायजा लिया। इस यात्रा से नीतीश का कॉन्फिडेंस हाई हुआ और जेडीयू कार्यकर्ताओं में भी उत्साह बढ़ा था ।महागठबंधन सरकार में आने के बाद नीतीश कुमार ने डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव को अपना उत्तराधिकारी बनाने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा कि 2025 का विधानसभा चुनाव तेजस्वी यादव के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। उन्होंने संकेत दे दिए कि अगली बार वे सीएम नहीं बनेंगे, बल्कि तेजस्वी को कुर्सी पर बैठाएंगे।
हालांकि, बिहार विधानसभा चुनाव में अभी कुछ बाकी था। आगे चलकर बिहार की राजनीतिक समीकरण अचानक बदलने लगी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी महागठबंधन छोड़ कर एनडीए भाजपा के साथ चले गए और बिहार में एनडीए की सरकार कायम कर दी। इस समय भाजपा के खिलाफ देश भर में आंधी चल रही थी । देश की संविधान, भारतीय लोकतंत्र, लोगों के संवैधानिक मौलिक अधिकार, केन्द्रीय स्तर पर आरक्षित पदों आदि पर खतरा मंडराता देख देश में बीजेपी सरकार के खिलाफ आंधी चल रही थी। केन्द्र में मोदी भाजपा की सरकार जाने की शत-प्रतिशत उम्मीदें बन गई थीं।
लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव से पहले जदयू नीतीश कुमार जी के भाजपा के साथ होने से संजीवनी मिल गई और लंगड़ी सरकार ही सही बीजेपी तीसरी बार सरकार बनाने में सफल हो गयी। केवल बिहार में बीजेपी गठबंधन को 10-12 सीटें और कम आती तो देश में इंडिया गठबंधन की सरकार होती और लोग अमन-चैन सुख-शांति से अपने अपने कामों में लगे रहते।
बिहार के तमाम समाजवादी एवं साम्यवादी विचारधारा की राजनीति करने वाली पार्टियों और उनके समर्थकों से अपील है कि गांधी , डॉ लोहिया, जय प्रकाश, डॉ भीमराव अम्बेडकर के विचारधारा समतामूलक समाज निर्माण केलिए, संविधान व पारदर्शी लोकतंत्र की हिफाजत के लिए, देश में सरकारी शिक्षा, नौकरी रोजगार, लोगों की संवैधानिक अधिकारों के हित में वैचारिक रूप से एकजुट होने की दिशा में मजबूती से बढ़ें। भागीदारी से वंचित वर्ग पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक (पीडीए) को एकताबद्ध करने पर विशेष जोर दें। पीडीए वर्ग जितना मजबूत होगा, उतना ही साम्प्रदायिक और फासिस्टवादी नफ़रत फैलाने वाली शक्ति बीजेपी एनडीए कमजोर होगा।भारत की आजादी में लाखों शहीद हुए हमारे भारतीय लोगों की बलिदान को बचायें।


