छत्रपति शिवाजी, तिलक और गांधी की यादों से जुड़ा सिंह गढ़ किला – हेमलता म्हस्के
छत्रपति शिवाजी, तिलक और गांधी की यादों से जुड़ा सिंह गढ़ किला – हेमलता म्हस्के

जे टी न्यूज़, मुंबई : कई ऐतिहासिक युद्धों का गवाह बना सिंहगढ़ का किला मराठा साम्राज्य की वीरता , साहस, संस्कृति और बलिदान का भी प्रतीक है । यह किला तानाजी मालूसरे के बलिदान के साथ मराठा साम्राज्य के संघर्ष के लिए भी जाना जाता है । इस किला के पास कभी तिलक और गांधी भी मिले थे। अनेक राजाओं के उत्थान और पतन से संबंधित पुणे के पास स्थित सिंहगढ़ का किला पहले आदिलशाही के अधीन था। दादाजी कोंडदेव वीजापुरकर ( आदिलशाही ) सूबेदार थे । 1647 में दादाजी कोंडदेव की मौत के बाद शिवाजी महाराज ने कोंडाना (सिंहगढ़) किले को अपने राज्य के अधीन कर लिया और इसे अपना सैन्य छावनी बनाया । 1649 में अपने पिता शाहजी राज की रिहाई के लिए शिवाजी महाराज द्वारा पुरंदर की संधि के तहत मुगलों को दिया गया सिंहगढ़ किला आदिलशाह को वापस कर दिया । मुगलों के अधीन उदेभान राठौड़ कोंडाना का अधिकारी था। वह मूलरूप से राजपूत था लेकिन वह मुसलमान बन गया था । आगरा से लौटकर आए छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुगलों से किला वापस लेने के लिए अभियान शुरू किया । तब शिवाजी महाराज के बाल मित्र वीर योद्धा तनाजी मालूसरे ने कोंडाना किला जीतने की कसम खाई । सभासद बखरी के अनुसार तानाजी मालूसरे के नेतृत्व में 500 मावलों को रात में किले की चट्टानों पर चढ़ाई करने भेजा गया। किले पर मौजूद राजपूत सेना को मावलों के आगमन की खबर मिली तो वे सतर्क हो गए और खूब युद्ध हुआ। इस युद्ध में 500 राजपूत सैनिक मारे गए। तानाजी मालुरासरे और किलेदार उदेभान के बीच धमासान युद्ध हुआ । दोनों योद्धा वीर गति को प्राप्त हुए । अपने भाई तानाजी की मौत को देखते हुए भी सूर्याजी पीछे नहीं हटे ।युद्ध चलता ही रहा आखिरकार राजपूत सेना को पराजित कर कोंडाना किले पर कब्जा कर लिया ।

शिवाजी महाराज को किले पर कब्जा करने की खबर मिली साथ ही तनाजी के याद में वीरगति प्राप्त होने की खबर सुनकर महाराज दुःखी हुए तो उनके मुंह से ये शब्द निकले , “गढ़ आला पन सिंह गेला। ” (‘ गढ़ जीता लेकिन सिंह गया ।’) तानाजी के बलिदान के बाद महराज ने इस किले का नाम “सिंहगढ़ ” रखा लेकिन ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार यह किला सिंहगढ़ नाम से पहले से ही विख्यात था । महाराज के 3/4/1663 को स्वयं से लिखे गए पत्र में सिंहगढ़ नाम का उल्लेख है । 1669 में मुगलों ने इस किले को जीत लिया लेकिन 1693 में मराठों ने इसे फिर से अपने कब्जे में ले लिया । 1700 में छत्रपति शिवाजी महाराज के बेटे छत्रपति राजाराम महाराज का सिंहगढ़ पर निधन हो गया । इसके बाद यह किला फिर से मुगलों के पास चला गया और औरंगजेब ने इसका नाम “बक्षीदाबक्ष ” रखा । 1705 में मराठी ने इस किले को आखिरी बार फिर से जीत लिया। हगढ़ किला को देखने के लिए कई स्थान हैं, जहां पर्यटकों का आना जाना हमेशा जारी रहता है। उनमें एक पुणे दरवाजा है -यह दरवाजा सिंह गढ़ किला के उत्तर में स्थित है । शिवाजी महाराज के काल से पहले भी यह मुख्य रूप से इस्तेमाल किया जाता था । पुणे के और तीन दरवाजे हैं, जिनमें से यह तीसरा दरवाजा यादव कालीन है । 2 खांद कडा – गाढ मी प्रवेश करते ही 30 से 35 फिट उंची खांद कडा हमारी आंखों के सामने खड़ी हो जाती है। यहां से पुणे पुरंदर का परिसर दिखता है । 3 दारू का कोठार :- किला के प्रवेश द्वार के दाई और एक भव्य पत्थर की इमारत है । 11 सितंबर 1751 को बिजली गिरने से इस कोठार का भारी नुकसान हुआ।

इस हादसे में गढ़ पर फडणवीसो का घर भी तबाह हो गया । और घर के सभी वासी मारे गए। 4 तिलक की भेंट के लिए प्रसिद्ध बंगला – 1915 में महात्मा गांधी और लोकमान्य तिलक की मुलाकात इसी बंगले में हुई थी । रामलाल नाईक से खरीदी गई जगह पर यह बंगला है। 5 कोंढानेश्वर :- यादवों का कुलदेवता शंकर का यह मंदिर यादवकालीन है । इसके अलावा श्री अमृतेश्वर भैरव मंदिर भी है जो यादवों के पहले इस गढ़ पर कोळी की बस्ती होने का प्रमाण है । 6 देवटाके :- तानाजी स्मारक के पीछे स्थित छोटे से तालाब के बाई और मुडने पर प्रसिद्ध देव टाके दिखाई देता है । जब महात्मा गांधी पुणे आते थे तो इस टंकी का ही पानी मंगवाते थे ।आज भी लोग इस टंकी का पानी इस्तेमाल करते हैं । 
7 उदेभान स्मारक :- दरवाजे के पीछे की तरफ स्थित टेकडी पर चौकोनी पत्थर उदेभान राठोड का स्मारक है ।
