श्रम संहिताओं का मतलब होगा: यूनियन बनाने और हड़ताल के अधिकार पर रोक फिक्स्ड टर्म रोजगार, 12 घंटे का कार्यदिवस
श्रम संहिताओं का मतलब होगा: यूनियन बनाने और हड़ताल के अधिकार पर रोक फिक्स्ड टर्म रोजगार, 12 घंटे का कार्यदिवस
श्रम संहिताओं का मतलब होगा: यूनियन बनाने और हड़ताल के अधिकार पर रोक
फिक्स्ड टर्म रोजगार, 12 घंटे का कार्यदिवस
मुनाफे के भूखे कॉर्पोरेट घरानों से पंजो तले मजदूर और युवाओं की स्थायी नौकरी का सपना चकनाचूर

जे टी न्यूज, दिल्ली: किसानों से गाँव-गाँव में चारों श्रम संहिताओं को जलाने का आह्वान*
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “श्रमिक-हितैषी सुधार” के दावों को झूठा बताते हुए, अखिल भारतीय किसान सभा ने इन श्रम संहिताओं को समाज को पीछें धकेलने वाला ऐसा कानून बताया है जो भारतीय मजदूरों को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अंधकारमय दौर में ले जाएगा।
श्रम संहिताएं कार्यदिवस को 12 घंटे तक बढ़ाने की अनुमति देती हैं। कठोर प्रावधान ट्रेड यूनियन बनाने, मजदूरी के लिए मोलभाव करने और हड़ताल के अधिकार को लगभग असंभव बना देते हैं। भारत की मेहनतकश जनता ने ब्रिटिश राज के खिलाफ भी किसान आंदोलन के सक्रिय समर्थन से ट्रेड यूनियन बनाने और हड़ताल का अधिकार हासिल किया था। श्रम संहिताओं ने मेहनतकश जनता के साथ विश्वासघात करके उन्हें मुनाफे के प्यासे कॉर्पोरेट घरानों की जंजीरों में बांध दिया है।
श्रम संहिताएं मजदूर-विरोधी हैं, जो मौजूदा श्रमिक सुरक्षा को खत्म करती हैं और नियोक्ताओं व कॉर्पोरेट घरानों के लिए “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” (व्यापार के लिए आसानी) को बढ़ावा देने पर केंद्रित हैं। ये संहिताएँ “ठेके पर रखो और निकालो” (हायर एंड फायर) की व्यवस्था को बढ़ावा देती हैं – औद्योगिक संबंध संहिता नौकरियों में कटौती, छंटनी और प्रतिष्ठानों के बंद होने के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता वाले प्रतिष्ठानों की सीमा को 100 से बढ़ाकर 300 श्रमिक कर देती है। इस प्रकार, यह बहुत सारे व्यवसायों को बिना मुआवजे और बिना पेंशन सहित किसी भी सेवानिवृत्ति लाभ दिए मजदूरों को आसानी से निकालने की अनुमति देती है। यह स्थायी रोजगार की व्यवस्था का अंत है। फिक्स्ड टर्म रोजगार (निश्चित अवधि का रोजगार) का प्रावधान कंपनियों को कम अवधि के लिए श्रमिकों को कंपनी की पैरोल पर रखने की अनुमति देता है, लेकिन बिना दीर्घकालिक लाभ और नौकरी की सुरक्षा के। इससे स्थायी नौकरियों में तेजी से गिरावट आएगी और कार्यालय का ठेकाकरण बढ़ेगा। यह युवाओं के स्थायी रोजगार के सपने के साथ छल करना है, जिससे किसान परिवारों की युवा पीढ़ियों का भविष्य भी बर्बाद होगा।
किसान सभा, गहराते कृषि संकट और उसके परिणामस्वरूप पूरे भारत में बेरोजगारी के संदर्भ में विशेष रूप से श्रम संहिताओं का कड़ा विरोध करती है। यह शर्मनाक है कि आरएसएस से जुड़े भारतीय मजदूर संघ ने श्रम संहिताओं का समर्थन किया है और श्रमिकों के साथ विश्वासघात किया है। किसान सभा की मांग है कि मोदी सरकार तुरंत इन प्रतिगामी श्रम संहिताओं को वापस ले और मजदूरों व युवाओं से माफी मांगे।
किसान सभा, ट्रेड यूनियन द्वारा चारों श्रम संहिताओं की अधिसूचना के व्यापक विरोध का स्वागत करती है और इन संहिताओं को खत्म करने के संघर्ष को अपना पूर्ण समर्थन देती है। किसान सभा देश भर के किसानों एवं खेत मजदूरों से आह्वान करती है कि वे श्रम संहिताओं की प्रतियां जलाएं और ग्रामीण जनता के बीच प्रधानमंत्री की बेईमानी व दोगली बयानबाजी को उजागर करने के लिए व्यापक अभियान चलाएं।
अखिल भारतीय किसान सभा लोगों से आग्रह करती है कि वे संयुक्त किसान मोर्चा और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर 26 नवंबर 2025 को राज्य व जिला स्तर पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों का समर्थन करें तथा उनमें शामिल हों और मोदी सरकार को सख्त चेतावनी दें कि, जनता उन्हें मजदूरों को गुलाम बनने की अनुमति नहीं देंगे।
