बिहार में बाल विवाह : कानून, योजनाएँ और जमीनी सच्चाई के बीच बढ़ती खाई; साहनी
बिहार में बाल विवाह : कानून, योजनाएँ और जमीनी सच्चाई के बीच बढ़ती खाई; साहनी

जे टी न्यूज, /विजय कुमार साहनी
भारत द्वारा 2030 तक बाल विवाह समाप्त करने का संकल्प काग़ज़ी नहीं, बल्कि आँकड़ों में दिखती प्रगति से समर्थित है। एनएफएचएस के अनुसार 2005-06 से 2019-21 के बीच बाल विवाह की दर लगभग आधी होना एक बड़ी उपलब्धि है, किंतु यह औसत आँकड़ा जमीनी असमानताओं को ढँक देता है। पश्चिम बंगाल, बिहार, त्रिपुरा, झारखंड और मध्य भारत के कई राज्यों में ऊँची दरें यह संकेत देती हैं कि समस्या अब केवल कानून या जागरूकता की नहीं, बल्कि गरीबी, शिक्षा की कमी, लैंगिक असमानता, सामाजिक परंपराओं और कमजोर प्रशासनिक निगरानी से गहराई से जुड़ी है।
बिहार के संदर्भ में बाल विवाह की समस्या केवल सामाजिक परंपरा का प्रश्न नहीं, बल्कि गहरी संरचनात्मक असमानताओं का परिणाम है। एनएफएचएस और यूएनएफपीए के विश्लेषण स्पष्ट करते हैं कि गरीबी और शिक्षा की कमी बाल विवाह के सबसे बड़े कारक हैं—और बिहार इन दोनों मोर्चों पर लंबे समय से संघर्ष करता रहा है। राज्य में सबसे निचले संपत्ति वर्ग और कम शिक्षित परिवारों में बाल विवाह की ऊँची दर इस बात का संकेत है कि कानून और योजनाएँ जमीनी हकीकत को बदलने में अब भी असफल हैं।
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 का मूल उद्देश्य 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों और 21 वर्ष से कम उम्र के लड़कों के विवाह को अपराध घोषित कर इस कुप्रथा पर प्रभावी रोक लगाना था, लेकिन बिहार में इसका क्रियान्वयन इस उद्देश्य से काफी पीछे दिखाई देता है। व्यवहार में यह कानून निवारक के बजाय प्रतिक्रियात्मक बनकर रह गया है, क्योंकि अधिकांश मामलों में प्रशासन तब सक्रिय होता है जब विवाह संपन्न हो चुका होता है और सामाजिक स्वीकार्यता की मुहर लग चुकी होती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों में दोषसिद्धि दर का अत्यंत कम होना इस बात का प्रमाण है कि सामाजिक दबाव, पंचायतों की अनौपचारिक भूमिका और पुलिस-प्रशासन की उदासीनता कानून की धार को कुंद कर देती है।विडंबना यह है कि कई मामलों में पीड़ित लड़की ही परिवार और समुदाय के दबाव में शिकायत वापस लेने को मजबूर हो जाती है, जिससे कानून का उद्देश्य ही उलट जाता है। परिणामस्वरूप, पीसीएमए एक ऐसा कानूनी ढांचा बनकर रह गया है जो काग़ज़ों में तो मजबूत दिखता है, लेकिन जमीनी स्तर पर बाल विवाह को सामाजिक स्वीकृति मिलने के कारण प्रभावी हस्तक्षेप करने में असफल रहता है।
मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना का उद्देश्य लड़कियों के जन्म से लेकर स्नातक स्तर तक उनकी शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करना है, लेकिन व्यवहार में यह योजना संरक्षण की बजाय केवल प्रोत्साहन तक सीमित रह जाती है। इसका मुख्य जोर नकद हस्तांतरण पर है, जबकि बाल विवाह जैसी गहरी सामाजिक समस्या से निपटने के लिए आवश्यक व्यवहार परिवर्तन और सामाजिक संवाद पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है। जमीनी स्तर पर यह भी स्पष्ट है कि जानकारी की कमी, जटिल दस्तावेज़ी प्रक्रियाएँ और डिजिटल बाधाएँ कई गरीब, महादलित और पिछड़े परिवारों को योजना के लाभ से वंचित कर देती हैं। इसके अलावा, अनेक मामलों में सहायता राशि प्राप्त होने के बावजूद परिवार लड़कियों की पढ़ाई जारी रखने के बजाय उनकी शादी तय कर देते हैं, जिससे योजना का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है। इस प्रकार, मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना आर्थिक रूप से कुछ राहत तो देती है, लेकिन सामाजिक सोच और पितृसत्तात्मक मानसिकता को चुनौती देने में अभी तक प्रभावी साबित नहीं हो पाई है।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का घोषित उद्देश्य लैंगिक समानता को बढ़ावा देना, लड़कियों की शिक्षा सुनिश्चित करना और उनकी सुरक्षा को मजबूत करना है, लेकिन बिहार में इसका प्रभाव बड़े पैमाने पर प्रतीकात्मक ही दिखाई देता है। व्यवहार में यह अभियान मुख्यतः पोस्टर, रैलियों और जन-जागरूकता कार्यक्रमों तक सीमित रह गया है, जबकि बाल विवाह, स्कूल ड्रॉपआउट और लैंगिक असुरक्षा जैसी जमीनी समस्याओं से निपटने के लिए आवश्यक ठोस और सतत हस्तक्षेप अपेक्षाकृत कमजोर रहे हैं। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि महादलित, अल्पसंख्यक और प्रवासी मजदूर परिवार जैसे सबसे कमजोर सामाजिक समूहों तक इसकी पहुँच सीमित है, जबकि बाल विवाह और शिक्षा से वंचना का बोझ इन्हीं तबकों पर सबसे ज्यादा है। पर्याप्त वित्तीय निवेश, स्थानीय स्तर पर जवाबदेही और बहु-विभागीय समन्वय के अभाव में BBBP बिहार में सामाजिक संरचनाओं को बदलने की बजाय एक नारे-प्रधान पहल बनकर रह गया है, जिसका वास्तविक असर सीमित और असमान है।
मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना का उद्देश्य गरीब परिवारों की बेटियों की शादी में आर्थिक सहायता प्रदान करना है, लेकिन इसकी प्रकृति ही बाल विवाह उन्मूलन के व्यापक लक्ष्य के साथ एक विरोधाभासी संदेश देती है। व्यवहार में यह योजना अप्रत्यक्ष रूप से विवाह को “राज्य-प्रायोजित” सामाजिक घटना के रूप में स्थापित करती है, जिससे विवाह की उम्र और समय को लेकर सामाजिक प्रश्न कमजोर पड़ जाते हैं। जमीनी स्तर पर उम्र सत्यापन की प्रक्रिया अक्सर औपचारिकता भर रह जाती है, जिसके कारण कई मामलों में नाबालिग लड़कियों के विवाह को भी मौन स्वीकृति मिल जाती है। इससे एक ओर राज्य बाल विवाह रोकने के लिए कानून और जागरूकता अभियानों की बात करता है, तो दूसरी ओर विवाह को आर्थिक सहायता देकर उसी प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करता हुआ दिखाई देता है। परिणामस्वरूप, मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना वैचारिक रूप से बाल विवाह विरोधी प्रयासों से टकराती है और अनजाने में उन्हें कमजोर करने का काम करती है।
यौन अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) का मूल उद्देश्य नाबालिगों को यौन शोषण से सुरक्षा प्रदान करना है, लेकिन व्यवहार में इसका कुछ प्रभाव संरक्षण से अधिक भय पैदा करने वाला बन गया है। कानून की कठोरता और सहमति की किसी भी अवधारणा को न मानने के कारण सहमति आधारित किशोर संबंध भी आपराधिक श्रेणी में आ जाते हैं, जिससे सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर जटिल परिस्थितियाँ पैदा होती हैं। कई मामलों में परिवार “इज्जत” और सामाजिक बदनामी के डर से कानूनी प्रक्रिया में जाने के बजाय लड़की की जल्दी शादी कर देना ही बेहतर समाधान मान लेते हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से बाल विवाह को बढ़ावा देता है। इसके अलावा, आपराधिक न्याय प्रणाली से कड़ी सजा के भय के कारण नाबालिग लड़कियाँ सुरक्षित और कानूनी स्वास्थ्य सेवाओं से दूर होकर असुरक्षित गर्भपात और गैर-पेशेवर सहायता की ओर धकेली जाती हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर गंभीर जोखिम बढ़ जाते हैं। इस प्रकार, POCSO Act अपनी सख्ती के बावजूद सामाजिक यथार्थ और किशोरों की जटिल परिस्थितियों से कटे होने के कारण कई बार अपने ही संरक्षणात्मक उद्देश्य के विपरीत परिणाम उत्पन्न करता है।
बिहार में जीविका और स्वयं सहायता समूहों (SHG) की भूमिका महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए एक सशक्त मंच के रूप में उभरी है, लेकिन बाल विवाह रोकने के संदर्भ में यह संभावना अधिकार और नीति समर्थन के अभाव में सीमित रह जाती है। आजीविका, बचत और ऋण के माध्यम से महिलाओं की आय और आत्मनिर्भरता बढ़ी है, परंतु बाल विवाह की रोकथाम को SHG का औपचारिक दायित्व नहीं बनाया गया है, जिससे यह मुद्दा उनकी नियमित कार्यसूची से बाहर रह जाता है। इसके अलावा, आर्थिक सशक्तिकरण के बावजूद पारिवारिक और सामाजिक निर्णय—विशेषकर विवाह जैसे अहम फैसले—अब भी पुरुष प्रधान संरचनाओं द्वारा नियंत्रित होते हैं, जहाँ महिलाओं की आवाज़ सीमित रह जाती है। परिणामस्वरूप, जीविका जैसे व्यापक नेटवर्क के पास सामाजिक परिवर्तन की अपार क्षमता होने के बावजूद, स्पष्ट नीति दिशा, कानूनी अधिकार और संस्थागत समर्थन के बिना यह मंच बाल विवाह उन्मूलन में निर्णायक भूमिका निभाने से वंचित रह जाता है।
“बाल विवाह मुक्त भारत” जैसे अभियानों का प्रभाव तभी टिकाऊ होगा जब वे केवल प्रतीकात्मक 100-दिवसीय गतिविधियों तक सीमित न रहकर दीर्घकालिक सामाजिक बदलाव पर केंद्रित हों। इसके लिए सुझावतः (1) उच्च जोखिम वाले जिलों और समुदायों के लिए राज्य-विशेष रणनीति बनाई जाए, (2) किशोरियों की माध्यमिक व उच्च शिक्षा को सशर्त नकद सहायता और सुरक्षित छात्रावासों से जोड़ा जाए, (3) स्वयं सहायता समूहों, पंचायतों और धार्मिक-सामुदायिक नेताओं को जवाबदेही के साथ भागीदार बनाया जाए, (4) बाल विवाह निषेध कानून के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु स्थानीय स्तर पर निगरानी तंत्र मजबूत हो, और (5) लड़कों व परिवारों के साथ व्यवहार परिवर्तन संवाद (behavior change communication) को प्राथमिकता दी जाए। जब तक बाल विवाह को केवल “कानूनी अपराध” नहीं बल्कि “विकास की बाधा” मानकर बहु-क्षेत्रीय हस्तक्षेप नहीं होंगे, तब तक 2030 का लक्ष्य एक महत्वाकांक्षा भर बनकर रह जाने का जोखिम बना रहेगा।
विजय कुमार साहनी
परिचय – लेखक समाजवादी चिन्तक एवं बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति , जीविका में प्रबंधक है |

