जेएनयू और उसके छात्र सत्ता के निशाने पर क्यों? – उर्मिलेश
जेएनयू और उसके छात्र सत्ता के निशाने पर क्यों? – उर्मिलेश

जे टी न्यूज़, दिल्ली : जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय छात्र संघ के निर्वाचित पदाधिकारियों सहित अनेक छात्रों को दिल्ली पुलिस ने 26 फरवरी को हिरासत में लिया। है। सिर्फ शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए उन्हें हिरासत में लिया गया। पुलिस उनके साथ बहुत बेरहमी से पेश आई। कइयों को चोट आई। हिरासत में लिये छात्रों में कुल 14 पर कुछ घंटे बाद आपराधिक मामले दर्ज किये गये। विश्वविद्यालय के छात्र 26 फरवरी को शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढंग से अपनी मांगों के पक्ष में शिक्षा मंत्रालय तक मार्च करने निकले थे। लेकिन जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय गेट पर ही उन्हें रोक दिया गया। अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक वहां बहुत बड़े पैमाने पर पुलिस और अन्य सुरक्षा बल तैनात थे। खाकी और नीली वर्दीधारी सुरक्षा कर्मियों के बल पर छात्रों को जबरन रोका गया। अनेक छात्र घायल हुए। घटनास्थल के प्रकाशित चित्रों से साफ है कि पुलिसिया कार्रवाई अनियंत्रित और अवांछित थी। ऐसा लगता है कि योजना के तहत जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय छात्र संघ के निर्वाचित पदाधिकारियों सहित कई छात्रों को हिरासत में लिया गया है। आश्चर्य कि इन छात्रों को उस शाम छोडा नहीं गया जैसा आमतौर प्रदर्शनकारियों के मामले में होता रहा है।

इनमें 14 पर आपराधिक मामले दर्ज हो गये। फिर उन्हें तिहाड जेल भेज दिया गया। ऐसे छात्रों में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष अदिति मिश्रा, पूर्व अध्यक्ष नीतीश कुमार, गोपिका बाबू, दानिश अली, नेहा, मणिकांत पटेल, विष्णु, श्याम साई, राहुल राज, रणविजय सिंह, अंश पिल्लई, गौरी कोलाल, वी पराक्कल और विक्की कुमार शामिल हैं। इन्हें धारा 212, 121(1), 132, 3(5) आदि का आरोपी बनाया गया है। अदालत से कल जमानत मिल जाने के बाद भी ये 14 छात्र इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जेल में ही हैं। बताया गया है कि इन सभी छात्रों के स्थायी निवास के पते का प्रमाणीकरण किया जायेगा और तब इनकी रिहाई संभव होगी। शासकीय स्तर पर इन छात्रों के खिलाफ जो व्यूह रचना की गई है, उसके दो पहलू बिल्कुल साफ नजर आते हैं:1: पूरी कार्रवाई प्रतिशोधात्मक है और 2: शांतिपूर्ण प्रदर्शन को भी प्रशासन ने आपराधिक कार्रवाई बनाने की कोशिश की है। सैकड़ों कैमरों के सामने इन छात्रों ने 26फरवरी को जुलूस निकाला, जो निस्संदेह कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं है। फिर उन्हें जबरन रोका गया और विश्वविद्यालय गेट पर पुलिस दमन का नंगा प्रदर्शन हुआ। यह सब प्रसारित और प्रकाशित तथ्य हैं! फिर सैकडों छात्रों के बीच 14 का चयन क्यों और किस आधार पर किया गया? संभवत: इस आधार पर कि इन 14 में 5 तो छात्र संघ के निर्वाचित पदाधिकारी हैं। शेष में कुछ सक्रिय छात्र हैं जो यूजीसी समता-संवर्धन रेगुलेशन को लेकर जारी गतिविधियों में भी मुखर रहे हैं। नेहा तो एक छात्र संगठन की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी है।
ऐसे कुछ छात्रों पर आपराधिक मामले दर्ज करने के क्या कारण हो सकते हैं? क्या सिर्फ इसलिए कि ये छात्र भारतीय विश्वविद्यालयों में सुसंगत किस्म का UGC Equity Regulation लागू करने की मांग क्यों उठा रहे हैं? गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की मांग क्यों कर रहे हैं? JNU की विवादास्पद कुलपति शांतिश्री धुलिपुडि पंडित को हटाने की मांग क्यों कर रहे हैं? पिछले दिनों JNU की कुलपति ने UGC रेगुलेशन के मामले में एक बहुत ही ओछा बयान दिया था, जिसकी देशव्यापी निंदा हुई!

प्रदर्शनकारी छात्रों को शांत करने और देश के चंद बेहतरीन विश्वविद्यालयों में शुमार JNU कैंपस में पढ़ाई-लिखाई शुरू कराने का बेहतर लोकतांत्रिक तरीका होता कि शिक्षा मंत्री या विभागीय सचिव छात्रों के प्रतिनिधिमंडल से मिलकर संवाद करते। दोनों पक्षों की आपसी बातचीत में छात्रों की वाजिब मांगों का कोई समाधान खोजा जाता। बहुत संभव है कि कुछ मांगों पर छात्र पीछे हटते और कुछ मांगों पर सरकार अपनी सहमति देती; जैसा आमतौर पर लोकतांत्रिक तौर-तरीकों वाले हर संवाद में होता है। पर दुखद कि शासन की तरफ से ऐसा लोकतांत्रिक रास्ता नहीं अख्तियार किया गया। इसकी जगह छात्रों के निर्वाचित प्रतिनिधियों और अन्य कई पर आपराधिक मामले दर्ज किये गये और इनमें 14 को जेल भेज दिया गया। शासन का यह रास्ता अलोकतांत्रिक तो है ही, यह देश के कुछ बेहतरीन और प्रतिभावान छात्रों के भावी शैक्षिक करियॅर पर एक तरह का हमला है। इसलिए यह शासन का एक प्रतिशोधात्मक कदम नजर आता है।
पिछले काफी समय से मौजूदा शासन के अंदर इस तरह का ट्रेंड देखा जा रहा है कि वह सामान्य विरोध या असहमति के किसी शांतिपूर्ण और अहिंसक प्रदर्शन को लोकतांत्रिक भावना से देखने की बजाय उसके अपराधीकरण में जुट जाता है। पिछले दिनों दिल्ली में आर्टिफिसियल एंटेलिजेंस पर केंद्रित सम्मेलन के दौरान युवा कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं ने अपनी शर्ट उतारकर पूरी तरह शांतिपूर्ण और अहिंसक प्रदर्शन किया था। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। यही नहीं, उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष को भी गिरफ्तार किया गया, जो स्वयं इन प्रदर्शनकारियों में शामिल नहीं थे। सब पर आपराधिक मामले दर्ज किये गये हैं। इन सबको देश-विरोधी बताने की कोशिश की जा रही है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तो वैसे भी मौजूदा सत्ताधीशों के निशाने पर है। ऐसा लगता है मानो वे इस महान् शिक्षण संस्थान और उसकी शैक्षणिक संस्कृति को जल्दी से जल्दी नष्ट करने में जुटे हैं। पर वहां के छात्र एकजुट होकर अपने संस्थान को बचाने की हरचंद कोशिश कर रहे हैं। यही नहीं, वे समूचे देश में बेहतर शिक्षा व्यवस्था, शैक्षणिक स्वायत्तता और कैंपस में सामाजिक न्याय के बड़े सवालों को भी बुलंदी के साथ उठा रहे हैं। ऐसा लगता है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों के इन विचारों और सरोकारों से ही शासन को ज्यादा परेशानी है । इसीलिए उन्हें बार-बार निशाना बनाया जा रहा है। पर शासन के ऐसे संकीर्ण नजरिये और दोषपूर्ण नीति से सत्ताधारी पार्टी और उसके संचालकों का भले तुष्टीकरण हो पर देश का भला नहीं होगा। वैसे भी भारत में आज तक एक भी ऐसा विश्वविद्यालय नहीं विकसित किया जा सका, जिसकी गणना दुनिया के शीर्ष 10, 20 या 50 विश्वविद्यालयों में हो सके! जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय कम से कम अपने देश के शीर्ष 5 विश्वविद्यालयों में कभी नंबर वन तो कभी नंबर टू पर रहता आया है! क्या हमारे सत्ताधीश देश के इस बेहतरीन विश्वविद्यालय को शीर्ष से हटाकर रसातल में फेंकना चाहते हैं, सिर्फ इसलिए कि इसके नाम में जवाहरलाल नेहरू का नाम शामिल है और यहां के छात्रों का बड़ा हिस्सा आज भी वाम-सामाजिक न्यायवादी विचारों से प्रभावित है


