किसान सभा के ऐतिहासिक 90 साल आलेख–प्रभुराज नारायण राव
किसान सभा के ऐतिहासिक 90 साल
आलेख–प्रभुराज नारायण राव

जे टी न्यूज
अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना 1936 में लखनऊ में हुई थी।स्वामी सहजानंद सरस्वती जिसके संस्थापक अध्यक्ष हुए थे। जिसके महासचिव प्रख्यात समाजवादी नेता और मुक्ति आंदोलन के योद्धा एम जी रंगा निर्वाचित हुए थे ।जिसके पदाधिकारियों में पी सुन्दरैया,यदुनंदन शर्मा, राहुल सांकृत्यायन,कार्जानंद शर्मा,आचार्य नरेंद्र देव ,जयप्रकाश नारायण ,ई एम एस नंबूदरीपाद ,मुजफ्फर अहमद, ए के गोपालन,हरकिशन सिंह सुरजीत,बंकिम मुखर्जी, यमना करजी, गोदावरी पारुलेकर जैसे सेनानी थे।जो ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी के खिलाफ लड़ते हुए किसानों पर हो रहे जुल्म एवं दमनात्मक कारवाइयों के खिलाफ जूझते रहे ।जिन्होंने जवानी का एक अच्छा हिस्सा जेल की सलाखों में गुजार दी ।
उनके संघर्ष की दास्तान डालमिया चीनी मिल बिहटा, पटना से शुरू होकर बकाश्त आंदोलन, तेभागा आंदोलन ,तेलंगाना आंदोलन , मोपला विद्रोह मालाबार,वर्ली आदिवासी विद्रोह जैसे आंदोलन को जन्म दिया।किसान सभा ने 1940 के दशक में किसानों को टैक्स नहीं देने तथा स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने का आह्वान किया।1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में स्वामी जी, ई एम एस नंबूदरीपाद,राहुल सांकृत्यायन जैसे अनेक किसान सभा के नेताओं की गिरफ्तारी हुई।
स्वामी सहजानंद सरस्वती ने 1927 में पटना पश्चिम में बिहटा चीनी मिल प्रबंधन द्वारा किये जा रहे लूट के खिलाफ पटना जिला किसान सभा की स्थापना कर आंदोलन खड़ा किया।उसके बाद बिहार के किसानों को एकजुट करने के लिए 1929 में सोनपुर में किसानों का सम्मेलन हुआ।जिसमें बिहार प्रांतीय किसान सभा बनाया गया।जिसके अध्यक्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती तथा महासचिव श्रीकृष्ण सिंह निर्वाचित हुए।जो बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री चुने गए।
स्वामी जी ने देश के विभिन्न राज्यों में अलग अलग संघर्ष कर रहे संगठनों को गोलबंद करने के लिए 1936 में राष्ट्रीय स्तर पर एक सम्मेलन बुलाई ।जिसमें अखिल भारतीय किसान सभा का गठन किया गया।अगस्त 1936 में किसान सभा का घोषणा पत्र जारी किया गया।जिसमें जमींदारी प्रथा को समाप्त करने तथा किसानों को कर्ज से मुक्त करने की मांग की गई। अक्टूबर 1937 में अखिल भारतीय किसान सभा का झंडा लाल रहने तथा उस पर हाशिया हथौड़ा रखने का फैसला लिया गया।
कांग्रेस पार्टी और किसान सभा के बीच मतभेद तीखा होते चल गया।नतीजा यह हुआ कि किसान सभा के नेताओं की दूरी कांग्रेस से बढ़ती चली गई।किसान सभा कांग्रेस शासित राज्यों में भी किसान आंदोलन को तेज कर दिया।1937 में कांग्रेस के फ़ैजपुर अखिल भारतीय सम्मेलन के समानांतर किसान सभा का विशाल किया गया ।जिसकी अध्यक्षता एन जी रंगा ने की।1937–38 में स्वामी जी ने बकाश्त आंदोलन शुरू किया।जिसका मुख्य उद्देश्य जमींदारों द्वारा बकाश्त भूमि से किरायदारों को हटाने के विरुद्ध था।इसलिए बिहार किरायदारी अधिनियम और बकाश्त भूमि नियम बनाया गया।
अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा सचिव का चुनाव प्रत्येक सम्मेलनों में होता रहा।1937 में किसान सभा के सचिव स्वामी सहजानंद सरस्वती बनाए गए थे।
1947 में आजादी मिलने के बाद का. ए के गोपालन किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव निर्वाचित हुए। 1964 में सैद्धांतिक आधार पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन के समय भी का. ए के गोपालन महासचिव थे।उसके बाद का. हरेकृष्ण कोनार महासचिव चुने गए।उसके बाद का. पी सुन्दरैया,,का. हरकिशन सिंह सुरजीत,का. एस रामचंद्रन पिल्लै,का. वरदराजन ,का. हन्नान मौला लम्बे समय तक महासचिव रहे।अभी अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का. अशोक ढवले तथा महासचिव कामरेड बीजू कृष्णन हैं।जिनके नेतृत्व में अनेकों लड़ाइयां लड़ी गई है।
अखिल भारतीय किसान सभा 2018 में नाशिक से मुंबई तक किसानों का लौंग मार्च निकाला।जो 6 मार्च को नासिक से चलकर 12 मार्च को मुंबई पहुंचा।उस लौंग मार्च में एक लाख से अधिक किसान थे।महाराष्ट्र सरकार सकते में आ गई थी। मुख्यमंत्री फडणवीस अपने एक दर्जन मंत्रियों सहित किसान सभा के प्रतिनिधियों के साथ वार्ता की ।किसानों की अधिकांश मांगों को सरकार मान गई।लेकिन बाद में धोखा किया।2019,2023 और 2025 को भी महाराष्ट्र में नाशिक से मुंबई तक किसानों का लौंग मार्च हुआ था।2025 का लौंग मार्च अभी मुंबई पहुंचा भी नहीं था कि महाराष्ट्र सरकार के मांगो से संबंधित मंत्रीगण लौंग मार्च को रोकवा कर प्रतिनिधियों से वार्ता शुरू कर दिया।किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक ढवले के कहने पर मुख्यमंत्री फडणवीस को वार्ता में आना पड़ा और मांगो को पूरा करने का भरोसा दिलाना पड़ा।महाराष्ट्र किसान सभा ने अहमद नगर किसान मार्च ,पालघर ,ठाणे किसान मार्च भी किसान आंदोलन के इतिहास में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया है।
2020 में संयुक्त किसान समन्वय समिति द्वारा मोदी सरकार के किसान विरोधी तीन काले कानूनों के खिलाफ दिल्ली पहुंचने से सरकार द्वारा रोक लगाने पर दिल्ली जाने वाली सभी बॉर्डर्स पर किसानों ने धरना देना शुरू कर दिया।पंजाब,हरियाणा,जम्मू कश्मीर,हिमाचल प्रदेश के किसान सिंधू बॉर्डर ,राजस्थान ,हरियाणा के किसान टिकरी बॉर्डर,मध्य प्रदेश,उत्तर प्रदेश के किसान पलवल बॉर्डर,बिहार,उत्तर प्रदेश,उत्तराखंड के किसान गाजीपुर बॉर्डर पर धरना पर बैठ गए। कोरोना के उस दौर में मौत की परवाह किए बगैर किसान अपने परिवार के साथ डटे रहे।13 महीने तक चले इस आंदोलन में 735 किसान शहीद हो गए।जब यह आंदोलन गांवों में फैल गया।तो मोदी सरकार ने आनन फानन में तीनों किसान विरोधी काले कानूनों को वापस लेने की घोषणा की।इस आंदोलन का मुख्य नायक का. हन्नान मौला थे।यह आंदोलन पूरे दुनिया में ऐतिहासिक स्थान बना लिया।
आज अखिल भारतीय किसान सभा निरंतर किसान आंदोलन को आगे बढ़ा रहा है।अब यह फसल आधारित संगठनों का निर्माण कर कृषि के हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रहा है।अब यह रुकने वाला नहीं।यह जाएगा हर खेतों तक,हर खलिहानों तक,पसीना रोपते हाथों तक।यह बो आएगा सुर्ख मिट्टी में अपना लहू और बना डालेगा हर गांव में किसान सभा।हर किसान किसान किसान सभा में।
