बच्चों के पोषण से भ्रष्ट पदाधिकारी व एनजीओ बना रहे अपनी सेहत जबकि बच्चों को ठंडा, बासी और बदबूदार भोजन परोसा जा रहा
बच्चों के पोषण से भ्रष्ट पदाधिकारी व एनजीओ बना रहे अपनी सेहत जबकि बच्चों को ठंडा, बासी और बदबूदार भोजन परोसा जा रहा

जे टी न्यूज़, सुपौल : बच्चों के पोषण से भ्रष्ट पदाधिकारी व एनजीओ बना रहे अपनी सेहत, एमडीएम गुणवत्ता और नियम भगवान भरोसे कागजों में पोषण अभियान दौड़ रहा है, लेकिन जमीन पर बच्चों को ठंडा, बासी और बदबूदार भोजन परोसा जा रहा एनजीओ का एकरारनामा 31 मार्च को ही समाप्त, बिना थर्ड पार्टी की जांच रिपोर्ट के बिना 3 माह का हुआ अवधि विस्तार, करीब 50 लाख का भुगतान। भ्रष्ट पदाधिकारी और एनजीओ के गठजोड़ से योजना में जमकर नियमों का उल्लंघन, स्कूल चयन में भी अनदेखी। एचएम पर भोजन लेने का दवाब, वापस किया तो कार्रवाई, इसलिए शिकायत के बजाए खाना गड्ढे में दबा देते है या मवेशी व सूअर को खिलाते है खाना । एनजीओ और भ्रष्ट पदाधिकारी के निलंबन एवं कार्रवाई की कमी धमकी से दहशत में प्रधानाध्यापक। जन सुराज जिलाध्यक्ष अनिल कुमार सिंह ने किया मामले का खुलासा, जिला पदाधिकारी को आवेदन देकर जांच और कार्रवाई की मांग। एक केंद्रीयकृत किचेन लेकिन सप्लाई कई प्रखंड तक, सुपौल शहर ही नहीं, बल्कि पिपरा और किशनपुर जैसे दूर-दराज इलाकों तक भोजन सप्लाई

जिले के सरकारी स्कूलों में बच्चों को पौष्टिक भोजन देने की योजना अब सवालों के घेरे में है। बच्चों के पोषण से भ्रष्ट पदाधिकारी व एनजीओ अपनी सेहत बना रहे हैं, जबकि बच्चों की थाली में परोसा गया घटिया खाना क्षेत्र के सूअर और मवेशियों के पेट भरने के काम आ रहा है। कागजों में “पोषण अभियान” दौड़ रहा है, लेकिन जमीन पर बच्चों को ठंडा, बासी और बदबूदार भोजन परोसा जा रहा है। जनसुराज जिलाध्यक्ष अनिल कुमार सिंह ने मामले का खुलासा करते हुए जिला पदाधिकारी को आवेदन देकर जांच और कार्रवाई की मांग की है। इसको लेकर शहर के व्यापार संघ भवन में प्रेस वार्ता का आयोजन हुआ। उन्होंने कहा कि सुपौल जिले के 254 विद्यालयों के 56 हजार से अधिक बच्चों को केंद्रीकृत रसोई के माध्यम से भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बच्चों को निर्धारित मानक के अनुरूप भोजन नहीं मिल रहा। केंद्र सरकार के नियम के अनुसार भोजन पकने और बच्चों तक पहुंचने के बीच अधिकतम 4 घंटे का अंतर होना चाहिए और भोजन का तापमान 65 डिग्री से कम नहीं होना चाहिए। बावजूद इसके कई विद्यालयों में खाना 7 से 8 घंटे बाद पहुंचता है। आरोप है कि खाना ठंडा, बासी और दुर्गंधयुक्त हो जाता है, जिसके कारण बच्चे भोजन नहीं खाते और कई जगह भोजन फेंक दिया जाता है। इसके बच्चों को निर्धारित मेन्यू के अनुसार अंडा, फल और पर्याप्त प्रोटीन युक्त भोजन नहीं दिया जा रहा। शुक्रवार को अंडा देने का प्रावधान है और ऐसे बच्चे जो अंडा नहीं खाते है उनके लिए 100 ग्राम के समतुल्य केला या सेब देने का प्रावधान है, लेकिन कई विद्यालयों में कच्चा अंडा मिलता है या फिर एक केला देकर खानापूर्ति की जाती है। सेब तो आज तक किसी स्कूल में नहीं दिया गया है। वहीं कच्चा अंडा अक्सर बच्चों के घर में विवाद का मुख्य कारण बनता है।
एनजीओ का एकरारनामा समाप्त फिर भी ले रहे काम, करीब 50 लाख का भुगतान:

एनजीओ को लाभ पहुंचाने में जिले के भ्रष्ट पदाधिकारी को कसर नहीं छोड़ रहे है। जिलाध्यक्ष ने बताया कि एनजीओ का एग्रीमेंट 31 मार्च 2026 को समाप्त हो चुका है, इसके बावजूद बिना वैध अवधि विस्तार के कार्य कराया जा रहा है। इतना ही नहीं अप्रैल 2026 में करीब 50 लाख रुपये का भुगतान भी कर दिया गया। यही नहीं विभागीय गाइडलाइन के अनुसार सीआरसी के निकट केंद्रीयकृत रसोईघर का प्रावधान है, ताकि समय से गर्म खाना बच्चों को मिल सके लेकिन विभाग द्वारा स्कूल चयन में भी जमकर अनियमितता बरती गई है। सीआरसी के निकट तो दूर विभाग द्वारा 15 से 20 किमी दूर स्कूलों को एनजीओ के लिए चयनित किया गया है। इतना ही नहीं एक ही गांव के कुछ विद्यालयों को एनजीओ से जोड़ा गया जबकि दूसरे विद्यालयों को बाहर रखा गया। इससे विद्यालय चयन प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि उदाहरण सुपौल प्रखंड अंतर्गत गोठ-बरुआरी पंचायत के बरैल गांव स्थित मुरली मनोहर मध्य विद्यालय को एनजीओ से टैग नहीं किया गया, जबकि सुखदेव कन्या मध्य विद्यालय बेल्हा को एनजीओ से जोड़ा गया। सुपौल प्रखंड अंतर्गत बसबिट्टी पंचायत के गंगापट्टी गांव में मध्य विद्यालय गंगापट्टी उर्दू को एनजीओ से टैग नहीं किया गया, जबकि मध्य विद्यालय गंगापट्टी हिंदी को एनजीओ से जोड़ा गया। मध्य विद्यालय लौकहा, मध्य विद्यालय बैरो, पिपरा प्रखंड के मदरसा उसमानिया, किशनपुर प्रखंड के प्राथमिक विद्यालय बैजनाथपुर समेत दर्जनों विद्यालयों तक खाना पहुंचने और खाने तक में 7 से 8 घंटे तक का समय लग जाता है।
एचएम पर भोजन लेने का दवाब, वापस किया तो कार्रवाई:
पीएम पोषण योजना में भ्रष्टाचार के साथ अधिक इसका भी विशेष ध्यान रखते है कि मामला बाहर ना आए। इसके लिए घटिया भोजन की शिकायत करने वाले प्रधानाध्यापकों पर दबाव बनाया जाता है। वहीं प्रभावशाली स्कूलों में बेहतर भोजन और ग्रामीण स्कूलों में निम्न गुणवत्ता वाला भोजन दिया जाता है। उन्होंने कहा कि विभागीय नियम के अनुसार खाना खराब होने पर एचएम उसे वापस कर सकते है लेकिन कार्रवाई के डर से एचएम खाना वापस व शिकायत करने से बेहतर गड्ढा खोद कर खराब खाना को ठिकाना लगाना ही बेहतर समझते हैं।

एकरारनामा के अलावा हर साल एनजीओ को मिलता है कई स्कूलों का उपहार:
पीएम पोषण योजना में बच्चों की थाली से ज्यादा एनजीओ को फायदा पहुंचाने पर जोर दिख रहा है। राज्य स्तर पर हुए एकरारनामा में जहां किचेन के आधार पर सिर्फ शहरी स्कूलों को टैग किया गया था, वहीं अब हर साल अधिकारियों द्वारा दर्जनों नए स्कूल जोड़े जा रहे हैं। हालत यह हो गई है कि एक ही किचेन से सुपौल शहर ही नहीं, बल्कि पिपरा और किशनपुर जैसे दूर-दराज इलाकों तक भोजन सप्लाई कराया जा रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतनी दूरी तय कर बच्चों तक पहुंचने वाला भोजन कितना ताजा और गुणवत्तापूर्ण होगा? योजना के नाम पर नियमों को दरकिनार कर एनजीओ को फायदा पहुंचाने का खेल लगातार गहराता जा रहा है।
ये सभी कार्यक्रम में हुए शामिल:
क्षेत्रीय प्रभारी इंद्रदेव साह, मुख्य प्रवक्ता रीति झा, युवा मोर्चा अध्यक्ष मो. मजहर आलम, जिला महामंत्री ब्रजेश यादव, जिला महिलाअध्यक्ष अनुराधा पासवान, जिला सलाहकार समिति सदस्य मो. दाऊद, पिंकी देवी, कोषाध्यक्ष मदनमोहन झा, सत्यम सहित अन्य मौजूद थे।



