सरकार के लिए देश की अर्थ व्यवस्था को पटरी पर लाना हो रहा मुश्किल – पूर्व सांसद

सरकार के लिए देश की अर्थ व्यवस्था को पटरी पर लाना हो रहा मुश्किल – पूर्व सांसद
कहा संघीय ढ़ाचा पर प्रहार है केन्द्र की मनमानी
कार्यालय, जेटी न्यूज
समस्तीपुर। करोना की मार सबसे अधिक अर्थव्यवस्था पर पड़ी है.सरकार पिछले सालो में उत्पादन ईकाई लगाने एवम संचालित करने में असफल रही। प्राकृतिक संसाधनो एवम सरकारी उपक्रमों को दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से घाटे के नाम पर निजी हाथो को सौंपते रही। उक्त बातें समस्तीपुर के पूर्व सांसद अजित कुमार मेहता ने केंद्र सरकार की अर्थ नीति पर क्षोभ जताते हुए कही। उन्होंने कहा कि हालिया संपन्न 27 अगस्त 2020 को GST कांउसिल की 41 वी बैठक में केन्द्र सरकार ने माना की राजस्व वसूली में बेतहासा गिरावट दर्ज हूई है। श्री मेहता ने कहा कि टैक्स में लगभग 30% यानि कि रूपयो में ये आकड़ा लगभग 20 लाख करोड़ का है। वही GST में 41% मतलब 30 लाख करोड़ की एक भारी भरकम गिरावट दर्ज की गयी है अर्थव्यवस्था में। इस खाई को पाटना मौजूदा सरकार के कार्यकलापों में तो लगभग नामुमकिन सा दीख रहा है। लिहाजा हम कह सकते हैं पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था ध्वस्त गयी। पिछले दिनों RBI ने अपने वक्तव्य में ये स्वीकार कर लिया कि 1.75 करोड़ का बैंक स्कैम हुआ है जिस कारण बैंको की हालत वेटींलेटर पर है। उन्होंने 3 लाख करोड़ देके बैंको की हालत सुधारने का उपाय भी करने पर जोर दीया। हंलाकि सरकार का दावा था कि कई बैंको को मिला कर कुछ बैंक कर देने से इनकी हालत सुधर जायेगी परन्तु नतीजा कुछ और ही रहा। सरकार ने राज्य सरकारो से कहा कि इतने कम संग्रह में वे राज्य को हिस्सा दे पाने में असमर्थ हैं.राज्यों को डायरेक्ट लोन लेना चाहिए, पर सवाल उठता है क्यों? GST में ये प्रावधान किये गये हैं कि राज्योॆ को उनका हिस्सा देने पर केन्द्र बाध्य है, फिर क्यों नहीं देगें? जो संग्रह हुआ है उन्ही में से 42% प्रतिशत राज्यों को दीया जाता है.संग्रह कम हुआ,जो हुआ उसी में उनका हिस्सा दें। अपना अधिकार छोड़ के कोई दूसरे से कर्ज मांगे ये बात कहां तक न्यायसंगत है? राज्य छोटे हैं और कई तो संसाधनविहीन भी वे खुद को कैसे सम्भाल पायेंगे? कैसे खर्च चलायेगें? और तो और इस संकट में रोजगार सबसे बड़ी चुनौती है। नये सृजन तो दूर वे कर्मचारियों को तनख्वाह और पेंशन तक नहीं दे पायेगें। केन्द्र सरकार के पास क्षमता के साथ अकूत संसाधन हैं। फिर वो आये दिन कुछ न कुछ बेच रहे हैं। अभी तक महारत्ना से मीनिरत्ना तक सब को बेच डाला वो पैसा कहां है? लोगों ने गैस की सब्सिडी छोड़ी उस रकम का क्या हुआ? कोरॉना फंड के 20 लाख करोड़ से अधिक की राशि आई उसका क्या हुआ? इसका हिसाब सरकार क्यूं नहीं देती कि किस मद में कितना खर्च किया और उसकी जमीनी सच्चाई क्या है? रेल, सेल, भेल, हवाई अड्डा, बस अड्डा, माइनिंग, एचएएल, बैंक,सब तो बिक रहे फिर केन्द्र के पास किस बात का अभाव? कहां खर्च हो रहा है ये पैसा…
श्री मेहता ने कहा कि आज से लगभग पांच छह साल पहले मध्यप्रदेश का हबीबगंज रेलवे स्टेशन बंसल को बेचा गया था उसको माडल स्टेशन बनाने के बहाने, किन्तु प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि वो स्टेशन आज भी रेल स्टेशन की तरह ही है सिर्फ पार्किग की रेट बढ़ गयी है लेकिन पैसा तो प्राइवेट वेंडर ने दीया होगा। वैसे ही सारे वेंडरो ने पैसा दीया है। वो कहां गया? विदित हो कि प्रों अजित कुमार मेहता पूर्व सांसद समस्तीपूर एक लंबे समय लेखा अनुदान समिती के सदस्य भी रहे हैं। उन्होंने इस बाबत कहा कि राज्यों को GST का भुगतान न करना संघीय ढाचे पर सीधा प्रहार होगा। इससे केन्द्र और राज्य में टकराहट होगी जो कि स्वस्थय लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए सही संकेत नहीं है।

उन्होंने कहा कि मैं एक लंबे समय संसद में रहा हूं और नब्बे के दशक से ही राज्य अपने अधिकार में बढोत्तरी की मांग करते रहे हैं. केन्द्र का काम एक अभिभावक का होता है वो हर राज्य को उसके जरूरत के मुताबिक सहयोग करता है.यही संसदीय प्रणाली की परम्परा रही है अगर इस परम्परा को खर्व करने की कोशिश की गयी तो परिणाम भयंकर हो सकते हैं। अपना खर्च न चला पा सकने की स्थिति में राज्य निजीकरण का रूख करेगें और पूरा देश बिक जायेगा। केन्द्र का अंकुश राज्यों पर कमजोर होगा प्राइवेट वेंडरस लोगो का शोषण करेगें और सरकार तमाशबीन होने के अलावा कुछ नहीं कर पायेगी। अत: केन्द्र को अपने फैसले पर विचार करना चाहिए. वैसे राज्यो के पास कोर्ट का विकल्प है लेकिन बेहतर को ये होगा कि ये जम्हूरियत की लड़ाई संसद से सड़क तक लड़ी जाए।

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