अजीत कुमार मेहता एक स्वतंत्रता सेनानी, एक शिक्षाविद के प्रोफेसर और समस्तीपुर की जनता की बुलंद आवाज़

जे टी न्यूज
वे उन गिने-चुने नेताओं में से थे एक थे राजनीति में आने से पहले एक स्थापित करियर (प्रोफेसर) रखते थे। उन्होंने साबित किया कि एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी धूल-भरी राजनीति में अपनी जगह बना सकता है।
वे समस्तीपुर लोकसभा सीट से 4 बार सांसद रहे।
यहाँ उस गांधीवादी समाजवादी और कोइरी समाज के बड़े नेता के बारे में एक पोस्ट है।
प्रोफेसर अजीत कुमार मेहता: क्लासरूम से संसद तक और ‘आजाद दस्ता’ का सिपाही!! लोग रिटायर होने के बाद आराम करते हैं, लेकिन मेहता जी ने अपनी जवानी आजादी की लड़ाई में दी और बाद की जिंदगी समाज सेवा में।
मेहता जी की वो बातें जो उन्हें ‘खास’ बनाती हैं:
प्रोफेसर से सांसद
वे बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में प्रोफेसर थे।
गणित और मशीनों के बीच रहते हुए भी उनका दिल समाज के लिए धड़कता था।
जब वे संसद में बोलते थे, तो उनकी बातों में एक शिक्षक की गंभीरता और एक समाजवादी का तर्क होता था। वे शोर-शराबे वाले नेता नहीं, बल्कि ‘विद्वान नेता’ थे।


आजाद दस्ता और बचपन:
उनका जन्म 1932 में हुआ था।
बहुत छोटी उम्र में वे जयप्रकाश नारायण के ‘आजाद दस्ता’ से जुड़ गए थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने एक बाल क्रांतिकारी के रूप में अंग्रेजों के खिलाफ काम किया।
समस्तीपुर का किला:
समस्तीपुर, जिसे समाजवादियों का गढ़ कहा जाता है, वहां से वे 4 बार (1978, 1980, 1996, 1998) सांसद चुने गए।
चाहे जनता पार्टी हो या राष्ट्रीय जनता दल उनकी व्यक्तिगत छवि इतनी साफ थी कि लोग पार्टी से ज्यादा ‘मास्टर साहब’ को वोट देते थे।
पिछड़ों की आवाज़:
वे कर्पूरी ठाकुर के विचारों के बहुत करीब थे। उन्होंने संसद में हमेशा किसानों और पिछड़े वर्गों के हक के लिए आवाज उठाई, लेकिन कभी भी उग्रता का सहारा नहीं लिया।
वे राजनीति के ‘जेंटलमैन थे।

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