कृषि और लघु उत्पादन को बर्बाद कर देने वाले राष्ट्र विरोधी समझौते रद्द करो
कृषि और लघु उत्पादन को बर्बाद कर देने वाले राष्ट्र विरोधी समझौते रद्द करो

जे टी न्यूज
आलेख–प्रभुराज नारायण राव
संयुक्त किसान मोर्चा ने भारत के राष्ट्रपति से भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के गंभीर खतरे को ध्यान में रखते हुए हस्ताक्षर नहीं करने का आग्रह किया है।
देश के किसानों और आम जनता को बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के लिए खोलकर भारत की आत्मनिर्भरता और संप्रभुता को अमेरिका के हाथों गिरवी रखने वाले समझौता को वापस लो तथा वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल इस्तीफा दो*
भारत सरकार ने अमेरिकी साम्राज्यवादी शक्ति के दबाव के आगे झुककर देश की आत्मनिर्भरता और संप्रभुता को अमेरिका का गिरवी बनाना चाहती है।डोनाल्ड ट्रंप के घोषणा से यह स्पष्ट हो चुका है कि अंतरिम समझौते में स्वीकार की गई शर्तें भारतीय अर्थव्यवस्था और किसानों के हितों के लिए घातक हैं।
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल द्वारा की गई घोषणाएं इस आशंका की पुष्ट करती हैं कि सरकार या तो अमेरिकी दबावों का सामना करने में असमर्थ है या इच्छुक नहीं है। एक साम्राज्यवादी महाशक्ति के समक्ष इस प्रकार का समर्पण किसानों में गंभीर असंतोष पैदा कर दिया है।10 फरवरी 2026 को भारत स्थित अमेरिकी दूतावास ने कहा कि भारत 140 करोड़ की विशाल आबादी वाले अपने बाजार को अमेरिकी उत्पादों के लिए खोल देगा और अमेरिकी श्रमिकों और व्यवसायों के लाभों को सुरक्षित करेगा।अमेरिका की कृषि सचिव ब्रुक रोलिन्स ने खुले तौर पर दावा किया है

कि यह समझौता अमेरिका को भारत के विशाल बाजार में अधिक कृषि उत्पाद निर्यात करने की अनुमति देगा। जिससे ग्रामीण अमेरिका में कीमतें बढ़ेंगी और नकदी प्रवाह होगा।जबकि अब तक भारत और अमेरिका के बीच कोई औपचारिक समझौता हस्ताक्षरित नहीं हुआ है। तो यह प्रश्न उठता है कि ठोस धाराओं पर सहमति से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस समझौते की घोषणा कैसे की? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को इस समझौते का हिस्सा क्यों घोषित किया? संसद सत्र के दौरान कोई अधिकारिक बयान क्यों नहीं दिया गया? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक संतोषजनक उत्तर देने में असफल रहे हैं।
भारत ने जहां अमेरिकी कृषि उत्पादों पर 30% से 150% तक के शुल्क को शून्य करने पर सहमति दी है। वहीं अमेरिका भारतीय उत्पादों पर 18% शुल्क लगाएगा, जो पहले के औसत 2.5% से लगभग सात गुना अधिक है। इसे 50% से घटाकर राहत बताना यह दर्शाता है कि भारतीय वार्ताकार अमेरिका के दबाव में थे। यह केंद्र सरकार और संसद दोनों के लिए शर्मनाक है।
भारत सरकार अमेरिकी उत्पादित सामानो पर अपने टैरिफ को 30%-150% से घटाकर ज़ीरो करने पर राज़ी हो गया । वहीं अमेरिका अब भारतीय सामान पर 18% टैरिफ लगाएगा, जो पहले के एवरेज 2.5 % से लगभग 7 गुना ज़्यादा है। लेकिन 18 % टैरिफ की इस बढ़ोतरी को भारत सरकार के मंत्रीगण ट्रंप के भारत पर दबाव बनाने के लिए लगाए गए 50% टैरिफ से राहत के तौर पर देश की जनता को बतलाने का असफल प्रयास कर रहे हैं। यह केंद्र सरकार और संसद दोनों के लिए शर्मनाक है।

अंतरिम समझौते के ढांचे के अनुसार भारत ने तीन गंभीर रियायतें अमेरिका को दी है। अमेरिका से सभी औद्योगिक और खाद्य एवं कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क और गैर-शुल्क बाधाएं समाप्त या कम करना।
सस्ते रूसी कच्चे तेल के आयात को बंद करना तथा अमेरिका को ऐसे आयातों की निगरानी की अनुमति देना। अन्यथा 25 % दंडात्मक शुल्क देना।
अमेरिका से प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर मूल्य के ऊर्जा उत्पाद, विमान व पुर्जे, कीमती धातुएं, तकनीकी उत्पाद, ईंधन, कोकिंग कोल तथा कृषि उत्पाद अनिवार्य रूप से खरीदना।
अनेक प्रेस वार्ताओं में भारतीय मंत्रियों और अमेरिकी सरकार के अधिकारियों द्वारा किए गए दावों का प्रभावी ढंग से भारत सरकार ने कोई भी खंडन नहीं किया है।इस संदर्भ में, अमेरिका ने 9 फरवरी को बांग्लादेश के साथ एक व्यापार समझौते की घोषणा की। जिसमें बांग्लादेश के वस्त्र और परिधान को अमेरिका में कोई शुल्क नहीं लगेगा। वाणिज्य मंत्री जनाब गोयल ने शर्मिंदगी से घोषणा की कि भारत में अमेरिकी कपास आयात से बने परिधानों को भी समान लाभ होगा और द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करते समय भारत को यह मिलेगा। यह तर्क पहले के दावे का खंडन करता है कि खेती द्विपक्षीय व्यापार समझौते के दायरे से बाहर है और संरक्षित है।यह समझौता जनाब पियूष गोयल के दोहरेपन को उजागर करता है। यह प्रधानमंत्री के झूठ को भी रेखांकित करता है ।जब उन्होंने 15 अगस्त 2025 को लाल किले की प्राचीर से “कृषि और किसानों के हितों की रक्षा के लिए व्यक्तिगत रूप से भारी कीमत चुकाने” की बात कही थी।

अमेरिका से दोगुना कपास उत्पादन के साथ भारत कपास उत्पादन में आत्मनिर्भर है। 19 अगस्त 2025 को 11% कपास आयात शुल्क वापस लेने से घरेलू कपास की कीमतें गिर गई हैं। कपास किसान बहुत गंभीर नुकसान का सामना कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने कहा कि शुल्क वापसी का उद्देश्य उद्योग के लिए कपास की कीमतें कम करना था। लेकिन यह किसानों के लिए हानिकारक है और उनकी दुर्दशा इस तथ्य से उजागर होती है कि बाजार में कच्चा कपास लगभग 6000 रुपए प्रति क्विंटल के भाव पर बिक रहा है। यह सरकार को भी पता है कि सबसे ज्यादा आत्म हत्याएं कपास के किसान ही कर रहे हैं।अकेले महाराष्ट्र के विदर्भ में प्रतिदिन 9 किसान आत्महत्या करते हैं। जबकि पूरे भारत में यह संख्या प्रति दिन 31 है।
पीयूष गोयल का अमेरिकी ट्रेड डील वार्ता पर बेपरवाह और बेरहम रवैया माफ़ करने लायक नहीं है और मंत्री को अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार भी नहीं है।अमेरिका में 18.65 लाख किसान हैं जबकि भारत में किसान परिवारों की संख्या 11.10 करोड़ है। अमेरिका में किसानों को भारी सब्सिडी दी जाती है और तकनीक के साथ आधुनिकीकरण किया जाता है और वे बड़े पैमाने पर खेती करते हैं। अमेरिका में औसत खेत का आकार 469 एकड़ है। जबकि भारत में औसतन खेत का आकार लगभग 2.67 एकड़ है और 86 प्रतिशत किसानों के पास 5 एकड़ से कम जमीन है। अमेरिका में प्रति किसान औसत सब्सिडी लगभग 23,735 डॉलर है, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 21 लाख 56 हजार के बराबर है।भारत की तुलना में अमेरिका में कृषि में कार्यबल का एक बहुत अलग हिस्सा कार्यरत है। भारत उच्च-श्रम कृषि मॉडल पर निर्भर है ।जबकि अमेरिका अत्यधिक मशीनीकरण तथा श्रम मॉडल का उपयोग करता है। भारत का लगभग 45 %-55 % कार्यबल कृषि पर निर्भर है।

जबकि अमेरिका में आबादी का केवल 2 % सीधे तौर पर खेती में कार्यरत है।यह उत्पादन और उत्पादकता और लागत में कमी को प्रतिबिंबित करता है। अमेरिका में प्रति हेक्टेयर मक्का का उत्पादन 11 टन है ।जबकि भारत में यह मात्र 3.5 टन है। इसी तरह अमेरिका में प्रति एकड़ सोयाबीन की उत्पादन 3.4 टन है। जबकि भारत में यह 0.9 टन है। अमेरिका में प्रति हेक्टेयर सेव का उत्पादन 60 टन है। जबकि भारत में यह 10 टन से कम है। भारत के किसान अमेरिकी किसानों के साथ कैसे प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं?
अमेरिकी किसान अपनी फसलों का उत्पादन और बिक्री सस्ते में कर सकते हैं। क्योंकि अमेरिकी सरकार अपने कृषि उत्पादन को सस्ते और सुनिश्चित इनपुट के साथ और कीटों के हमलों, मौसम की समस्याओं या बिक्री संकट में हुए सभी नुकसानों के लिए सीधे भुगतान के साथ भारी सब्सिडी देती है। दूसरी ओर भारत के 11.10 करोड़ किसान परिवार भारी कर वाले डीजल, पेट्रोल और बिजली और उत्तम कृषि उपकरणों के कारण नकारात्मक सब्सिडी से पीड़ित हैं । उन्हें सिर्फ खाद के लिए सब्सिडी और पीएम किसान निधि के तहत प्रति वर्ष केवल 6000 की मामूली राशि मिलती है। विदेशी कृषि उपज के शुल्क मुक्त आयात के कारण डेयरी किसानों सहित भारतीय किसान तबाह हो जाएंगे।
पहाड़ी राज्यों — जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड — के सेव उत्पादक किसान पहले से ही सस्ते आयात और बाज़ार तथा अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में सरकारी समर्थन तंत्र की विफलता के कारण गंभीर संकट झेल रहे हैं। पहले भारत अमेरिका और यूरोपीय संघ से आयातित सेव पर 50 % सीमा शुल्क तथा 80 रुपए प्रति किलोग्राम का न्यूनतम आयात मूल्य लागू करता था, जिससे सेव की कीमत लगभग 120 रुपए प्रति किलो ग्राम पड़ती थी। प्रस्तावित अमेरिका व्यापार समझौते के तहत इन दोनों सुरक्षा उपायों को हटाया जा सकता है। जिससे देश के 55 लाख से अधिक सेव उत्पादक परिवारों के सामने आजीविका का गंभीर संकट उत्पन्न हो जाएगा।
मक्का– अंतरिम समझौते के अनुसार मक्का का आयात डीडीजी के रूप में किया जाएगा। वर्तमान में भारत 5 लाख टन तक मक्का आयात पर 15 % शुल्क और उससे अधिक आयात पर 50 % शुल्क लगाता है। प्रस्तावित समझौते के तहत इसे शून्य किया जा सकता है। अमेरिका प्रतिवर्ष लगभग 377 मिलियन टन मक्का उत्पादन करता है, जिसमें से लगभग 94 % जीएम मक्का है।जो निर्यात के लिए विशाल मात्रा उपलब्ध कराता है। इसके विपरीत भारत का उत्पादन लगभग 43 मिलियन टन है। मक्का पोल्ट्री और पशुपालन उद्योग के लिए प्रमुख चारा है। डीडीजी के बड़े पैमाने पर आयात से घरेलू बाजार में कीमतें गिरेंगी और देश के लगभग 120 लाख मक्का किसानों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
एथेनॉल– भारत में ईंधन मिश्रण के लिए तैयार किए जा रहे एथेनॉल का लगभग 46 % मक्का से तथा 32 % गन्ने के रस और मोलासेस से प्राप्त होता है। यदि एथेनॉल और मक्का का आयात बढ़ता है, तो इससे चीनी उद्योग और लगभग 500 लाख गन्ना किसानों की आजीविका पर गंभीर आघात पड़ेगा।

सोयाबीन– अमेरिका, ब्राज़ील के बाद, विश्व का दूसरा सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक है और वहां लगभग 96 % सोयाबीन जीएम है। यदि सोयाबीन का तेल और पशु आहार के लिए डीडीजी का आयात बढ़ाया जाता है। तो इससे भारत के लगभग 40 लाख सोयाबीन किसानों तथा संबंधित उद्योग पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
डेयरी उत्पाद– वर्तमान में अमेरिका दूध का निर्यात लगभग 36 रुपए प्रति किलोग्राम की समतुल्य दर पर करता है। भारी सरकारी सहायता, बड़े पैमाने की डेयरी फार्मिंग और उच्च उत्पादकता के कारण अमेरिकी दुग्ध उद्योग इतनी कम कीमतों पर उत्पाद बेचने में सक्षम है। इसके विपरीत, भारत के दूध उत्पादक किसान लंबे समय से पर्याप्त समर्थन के अभाव में आंदोलनरत हैं। उन्हें विकसित देशों की तुलना में कम मूल्य मिलता है।केंद्र सरकार ने पहले यह रुख अपनाया था कि बिना इस प्रमाणन के दूध आयात की अनुमति नहीं दी जाएगी कि उसका स्रोत पशु-आधारित चारे से मुक्त है। हालांकि सरकार ने तरल दूध आयात की अनुमति से इनकार किया है। परंतु दूध पाउडर और अन्य डेयरी उत्पादों के संबंध में स्थिति स्पष्ट नहीं की है।यूनाइटेड किंगडम और न्यूज़ीलैंड के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों के तहत डेयरी उत्पादों को अनुमति दी गई है। भारत पहले पनीर पर 30 %, मक्खन पर 40 % और दूध पाउडर पर 60 % आयात शुल्क लगाता था। आशंका है कि अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते के तहत इन शुल्कों को शून्य किया जा सकता है और पशु-आधारित चारे से मुक्त जैसे गैर-शुल्क अवरोध भी हटाए जा सकते हैं। इससे भारत के 800 लाख से अधिक छोटे दुग्ध उत्पादकों के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न होगा। भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है।
गेहूं– अमेरिका अपने कुल गेहूं उत्पादन का लगभग 40 % निर्यात करता है। जिसकी समतुल्य दर लगभग 18.5 रुपए प्रति किलोग्राम है। यदि शून्य टैरिफ पर गेहूं का आयात किया गया।तो इसका सीधा और गंभीर प्रभाव भारत के गेहूं उत्पादक किसानों पर पड़ेगा। गेहूं भारत के दो प्रमुख मुख्य खाद्यान्नों में से एक है और इसके उत्पादन में किसी भी प्रकार की गिरावट या मूल्य अस्थिरता से देश की खाद्य सुरक्षा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
अमेरिका ने भारत की कृषि और खाद्य सुरक्षा प्रणाली को प्रत्यक्ष रूप से निशाना बनाने की खुली नीति अपनाई है। वह भारत के कृषि बाज़ारों, विशेषकर बीज बाज़ार को अमेरिकी कृषि व्यवसाय के लिए खोलने की मांग कर रहा है। विशेष रूप से, अमेरिका सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी उपायों में रियायत चाहता है। ताकि अमेरिकी निर्यातकों द्वारा किया गया स्व-प्रमाणीकरण बिना किसी स्वतंत्र जांच के स्वीकार कर लिया जाए। यह भारत की समृद्ध अनुवांशिक जैव-विविधता और पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करता है।
अमेरिका ने इनपुट सब्सिडी, उत्पादन बोनस, फसल खरीद तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली को कम करने या समाप्त करने और पेटेंट अधिनियम में संशोधन की मांग भी की है। जो बाजार को विकृत करने वाली नीतियां है। उसने विशेष रूप से यह भी मांग की है कि किसानों के लिए किसी प्रकार की ऋण माफी न दी जाए। इन महत्वपूर्ण नीतिगत उपायों की सुरक्षा के संबंध में भारत सरकार की ओर से अब तक कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है।दूसरी ओर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के विभाग ने 9 जनवरी 2026 को केरल सरकार को एक अर्द्ध-सरकारी पत्र भेजकर धान किसानों को दिए जा रहे 630 रुपए प्रति क्विंटल बोनस को समाप्त करने का आग्रह किया है। तमिलनाडु, ओडिशा, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश भी धान किसानों को बोनस प्रदान करते हैं।
कृषि उत्पादों के आयात पर गैर-शुल्क बाधाओं को समाप्त कर छोटे उत्पादकों को कमजोर करना और भारत की खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करना अमेरिकी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। ऐसे तथाकथित सुधारों का भार न तो किसान और न ही भारत की जनता वहन कर सकती है।इसीलिए संयुक्त किसान मोर्चा ने माननीय राष्ट्रपति महोदया से विनम्र निवेदन किया है कि इस अत्यंत गंभीर विषय पर संज्ञान लें और निम्नलिखित बिंदुओं पर शीघ्र कार्रवाई सुनिश्चित करें।

साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हिदायत दे कि किसी भी अमेरिकी हानिकारक शर्तों को किसी भी स्थिति में द्वीपक्षीय वार्ता पर हस्ताक्षर नहीं किया जाय।
देश से विश्वासघात करने के लिए केंद्रीय वाणिज्य मंत्री श्री पीयूष गोयल को पद से बर्खास्त किया जाए।
वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण को निर्देश दें कि वे धान या गेहूं पर किसानों को दिए जा रहे बोनस को समाप्त करने संबंधी पत्र पर हस्ताक्षर नहीं करें।



