बाबासाहेब आंबेडकर – सिर्फ दलितों के नहीं, हर मजूर-किसान के मसीहा जे टी न्यूज़/हेमलता म्हस्के

बाबासाहेब आंबेडकर – सिर्फ दलितों के नहीं, हर मजूर-किसान के मसीहा

जे टी न्यूज़/हेमलता म्हस्के

 

1 मई दुनिया भर में कामगार का दिन। यह दिन उन हाथों का है जो कारखाने में काम करते हैं, खेत में अनाज उगाते हैं, इमारतें खड़ी करते हैं। पर आज जो मजूर 8 घंटे काम करके सम्मान से घर जाता है, उसके पीछे एक नाम है – डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर।

आज से 100 साल पहले मजूर को इंसान नहीं समझा जाता था। 12 से 14 घंटे काम, हफ्ते में कोई छुट्टी नहीं। महिला मजूर गर्भवती हो तो भी काम करना पड़ता था। बीमार पड़ो तो नौकरी से निकाल देते थे। हड़ताल करो तो जेल। मालिक की मर्जी ही कानून थी। मजूर दोहरी गुलामी में था – एक मालिक की, दूसरी जात की।

 

लोग कहते हैं बाबासाहेब सिर्फ दलितों के नेता थे। यह

अधूरा सच है। बाबासाहेब ने 1927 में *महाड़ का सत्याग्रह* किया तो पानी के लिए, 1930 में *नासिक का कालाराम मंदिर सत्याग्रह* किया तो इज्जत के लिए। पर साथ ही उन्होंने मजूर और किसान के लिए भी बड़े आंदोलन छेड़े।

1928 में उन्होंने बॉम्बे टेक्सटाइल लेबर यूनियन बनाया। कपड़ा मिल के हजारों मजूर, जिसमें हर जात-धर्म के लोग थे, उनके साथ आए। 1938 में *कोंकण में खोती प्रथा* के खिलाफ आंदोलन किया। खोती यानी जमींदारों द्वारा किसानों का शोषण। बाबासाहेब ने हजारों किसान-मजूरों को लेकर मोर्चा निकाला। पुलिस की लाठियाँ खाईं, पर खोती प्रथा खत्म करवाई।

 

1936 में उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी बनाई। नाम में ही लेबर था। इस पार्टी का मकसद था: “शेतकरी-कामकरी यांची सत्ता” यानी किसान-मजूर की हुकूमत। उस चुनाव में उनके 15 उम्मीदवार जीते। जिसमें ब्राह्मण, मराठा, दलित सब थे। क्योंकि दुख सबका एक था – गरीबी और शोषण।

1942 में जब बाबासाहेब वाइसराय की कौंसिल में लेबर मेंबर बने, तो उन्होंने 4 साल में ही मजूरों की किस्मत बदल दी।

– *8 घंटे काम का नियम*: पहले मिलों में 12-14 घंटे काम लेते थे। बाबासाहेब ने कानून बनाकर 8 घंटे तय किए।

दुनिया में पहली बार भारत में महिलाओं को वेतन सहित प्रसूति छुट्टी मिली। ई एस आई स्कीम

: बीमारी में मुफ्त इलाज की शुरुआत की। मिनिमम वेजेज एक्ट का पाया रखा और तय किया कि मजूर को इतनी मजूरी तो मिलनी ही चाहिए कि वो जी सके।

हड़ताल का अधिकार के लिए ट्रेड यूनियन एक्ट लाकर मजूर को अपनी बात रखने का हक दिया।

फैक्ट्री एक्ट में सुधार किया: कारखाने में सुरक्षा, साफ-सफाई, पानी की व्यवस्था सुनिश्चित की।

मजूर को इज्जत दिलाई।

बाबासाहेब कहते थे, “मजूर देश की रीढ़ है। उसे गुलाम बनाकर देश आगे नहीं बढ़ सकता।” 1943 में उन्होंने भारतीय मंजूर सम्मेलन शुरू किया। सरकार, मालिक और मजूर – तीनों एक मेज पर बैठकर बात करें, ये रिवाज उन्होंने डाला। जो आज तक चल रहा है। 1 मई का मतलब क्या है

 

आज जब हम रविवार की छुट्टी मनाते हैं, पीएफ कटता है, ए एस आई से इलाज होता है, 8 घंटे बाद ओवरटाइम मिलता है – तो ये बाबासाहेब की देन है। लाखों युवा आज सुरक्षित नौकरी कर पा रहे हैं, क्योंकि किसी ने उनके लिए 80 साल पहले लड़ाई लड़ी थी।

बाबासाहेब ने सिर्फ संविधान नहीं दिया। उन्होंने मजूर को संविधान में जगह दी। अनुच्छेद 23 में बेगार पर रोक, अनुच्छेद 24 में बाल मजूरी पर रोक, अनुच्छेद 39 में समान काम समान वेतन – ये सब उनके विचार थे।

 

बाबासाहेब किसी एक जात के नहीं थे। वो हर उस इंसान के थे जो मेहनत करता है, पर जिसे उसका हक नहीं मिलता। 1 मई को झंडा फहराना काफी नहीं। बाबासाहेब का सपना तब पूरा होगा जब हर मजूर शिक्षित होगा, संगठित होगा, और अपने हक के लिए खड़ा होगा।

 

उन्होंने रास्ता दिखा दिया। अब चलना हमें है। क्योंकि जैसा बाबासाहेब कहते थे: “जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती, वो अपना भविष्य नहीं बना सकती।” जय भीम, जय कामगार, जय किसान।

 

– हेमलता म्हस्के

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