डॉलर क्यों है दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण करेंसी ? अमेरिका पर कर्ज का बोझ, फिर भी डॉलर सबसे मजबूत कैसे?

डॉ. विजय कुमार गुप्ता, सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर, वीमेंस कॉलेज, समस्तीपुर

डॉलर क्यों है दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण करेंसी ?
अमेरिका पर कर्ज का बोझ, फिर भी डॉलर सबसे मजबूत कैसे?

डॉ. विजय कुमार गुप्ता, सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर, वीमेंस कॉलेज, समस्तीपुर

आज दुनिया में अगर किसी एक करेंसी का सबसे ज्यादा प्रभाव है, तो वह है अमेरिकी डॉलर । तेल खरीदना हो, अंतरराष्ट्रीय व्यापार करना हो, विदेशी कर्ज लेना हो या किसी देश को अपने विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखना हो—हर जगह डॉलर की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण दिखाई देती है। इसी कारण डॉलर को “ग्लोबल रिज़र्व करेंसी” कहा जाता है।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि कई बार अमेरिका की अर्थव्यवस्था खुद संकट में होती है, फिर भी दुनिया डॉलर पर भरोसा करती रहती है। 2008 की मंदी हो या 2011 में अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग घटने की घटना, इन सबके बावजूद डॉलर कमजोर होने के बजाय और मजबूत हुआ। आखिर ऐसा क्यों?
इसकी शुरुआत दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुई। युद्ध में यूरोप और जापान की अर्थव्यवस्थाएँ बुरी तरह तबाह हो चुकी थीं, जबकि अमेरिका सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बनकर उभरा। दुनिया का अधिकांश सोना अमेरिका के पास था। इसी पृष्ठभूमि में 1944 में “ब्रेटन वुड्स समझौता” हुआ, जिसमें तय किया गया कि दुनिया की कई मुद्राएँ डॉलर से जुड़ी रहेंगी और डॉलर सीधे सोने से जुड़ा होगा। अमेरिका ने वादा किया कि वह 35 डॉलर के बदले एक औंस सोना देगा।
इस व्यवस्था से दुनिया को स्थिरता मिली। देशों को भरोसा था कि डॉलर “सोने जितना सुरक्षित” है। धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय व्यापार, बैंकिंग और निवेश का पूरा ढांचा डॉलर पर आधारित हो गया। खासकर तेल का व्यापार लगभग पूरी तरह डॉलर आधारित हो गया। इसका मतलब यह हुआ कि अगर भारत, चीन या किसी भी देश को तेल खरीदना है, तो उसे डॉलर की जरूरत पड़ेगी।


लेकिन 1960 के दशक के बाद अमेरिका की अर्थव्यवस्था में एक बड़ा बदलाव शुरू हुआ। पहले अमेरिका दुनिया को सबसे ज्यादा सामान बेचता था, लेकिन धीरे-धीरे वह दुनिया का सबसे बड़ा “खरीदार” बन गया। 1960 में अमेरिका का व्यापार घाटा बहुत कम था, लेकिन 1970 के बाद आयात तेजी से बढ़ने लगा, जिससे उसके ऊपर व्यापार घाटा बढ़ता गया। जापान, जर्मनी और बाद में चीन जैसे देशों से अमेरिका बड़ी मात्रा में सामान खरीदने लगा, परिणामस्वरूप दुनिया भर में डॉलर फैलने लगे, लेकिन अमेरिका के पास उतना सोना नहीं बचा था कि हर डॉलर के बदले सोना दे सके।
आखिरकार 1971 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर को सोने से अलग कर दिया। इसे “निक्सन शॉक” कहा जाता है। इसके बाद डॉलर “फिएट करेंसी” बन गया, यानी उसकी कीमत अब सोने पर नहीं बल्कि अमेरिकी सरकार और अर्थव्यवस्था पर लोगों के भरोसे पर आधारित हो गई।

फिर सवाल है कि जब डॉलर के पीछे सोना नहीं रहा, तो दुनिया उसे इस्तेमाल क्यों करती रही? इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका का विशाल बाजार रहा । दुनिया के देश अपना सामान अमेरिका को बेचना चाहते थे, ताकि उन्हें डॉलर मिलता रहे । डॉलर तेल खरीदने, अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने और विदेशी भुगतान करने में काम आता रहा और इस प्रकार धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय व्यापार का सबसे आसान, सुरक्षित और विश्वसनीय माध्यम डॉलर बन गया ।
आज भी जब दुनिया में आर्थिक संकट आता है, निवेशक डॉलर खरीदते हैं। इसे “सेफ हेवन” कहा जाता है। लोगों को लगता है कि बाकी देशों की तुलना में अमेरिका की वित्तीय व्यवस्था ज्यादा भरोसेमंद है। यही कारण है कि अमेरिका में मंदी आने पर भी डॉलर की मांग बनी रहती है।
यद्यापि, अमेरिका की अर्थव्यवस्था पूरी तरह स्थिर नहीं है। 1975 तक अमेरिका का व्यापार घाटा लगभग 9 अरब डॉलर तक पहुँच गया। 1990 के दशक में यह घाटा सैकड़ों अरब डॉलर में चला गया और आज अमेरिका का वार्षिक व्यापार घाटा लगभग 900 अरब से 1 ट्रिलियन डॉलर के आसपास माना जाता है। केवल चीन के साथ ही अमेरिका का व्यापार घाटा 2024 में लगभग 279 अरब डॉलर रहा। इसका मतलब साफ है कि अमेरिका दुनिया से जितना सामान खरीदता है, उतना बेच नहीं पाता।
अमेरिका पर सरकारी कर्ज भी तेजी से बढ़ा है। 1980 में अमेरिकी कर्ज लगभग 900 अरब डॉलर था, जो आज बढ़कर करीब 36 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच चुका है। कोविड महामारी, युद्धों और बढ़ते सरकारी खर्चों ने इस बोझ को और बढ़ा दिया।
महंगाई और बेरोजगारी भी समय-समय पर अमेरिका के लिए चुनौती बनी हैं। 2022 में अमेरिका में महंगाई दर लगभग 9% तक पहुँच गई थी, जो पिछले 40 वर्षों में सबसे अधिक थी। वहीं 2008 की मंदी और 2020 के कोविड काल में बेरोजगारी दर 10% से 14% तक पहुँच गई थी।
अमेरिका की एक बड़ी कमजोरी यह है कि वह दुनिया को डॉलर उपलब्ध कराने के लिए लगातार आयात करता रहता है। यानी डॉलर की वैश्विक ताकत बनाए रखने की कीमत अमेरिका को व्यापार घाटे और कर्ज के रूप में चुकानी पड़ती है ।


फिर प्रश्न हैकि भारी कर्ज, बढ़ते व्यापार घाटे और आर्थिक दबाव के बावजूद डॉलर आज भी दुनिया की सबसे मजबूत और प्रभावशाली करेंसी क्यों है? असल में डॉलर की ताकत सिर्फ अमेरिका की अर्थव्यवस्था और उसका विशाल बाजार नही है, बल्कि पूरी दुनिया की आदत, भरोसा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था है । जब दुनिया में युद्ध, मंदी या आर्थिक संकट जैसी स्थिति पैदा होती है, तब लोग अपने पैसे को सुरक्षित रखने के लिए डॉलर खरीदने लगते हैं। जैसे भारत में लोग कठिन समय में सोने को सबसे सुरक्षित मानते हैं, वैसे ही दुनिया के बड़े निवेशक और देश डॉलर को सुरक्षित मानते हैं। दुनिया के पास डॉलर का कोई मजबूत विकल्प नहीं है। चीन की युआन या यूरोपीय संघ की यूरो जैसी मुद्राएँ अभी वह भरोसा और वैश्विक स्वीकृति हासिल नहीं कर पाई हैं। यही कारण है कि भारी कर्ज, बढ़ते व्यापार घाटे और आर्थिक दबाव अर्थात अमेरिका की अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव होने के बावजूद डॉलर आज भी दुनिया की सबसे मजबूत और प्रभावशाली करेंसी बना हुआ है।

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