संबद्धता प्राप्त अनुदानित कॉलेजों की उपेक्षा और जमीन के लिए तरसते राजकीय डिग्री कॉलेज
संबद्धता प्राप्त अनुदानित कॉलेजों की उपेक्षा और जमीन के लिए तरसते राजकीय डिग्री कॉलेज
डॉ. संजय कुमार राजा

बिहार में उच्च शिक्षा के विस्तार को लेकर पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह की योजनाएं लागू की गई हैं, वे पहली नजर में अत्यंत महत्वाकांक्षी और दूरदर्शी प्रतीत होती हैं। विशेषकर ‘सात निश्चय’ जैसी योजनाओं के तहत हर प्रखंड में राजकीय डिग्री महाविद्यालय स्थापित करने का निर्णय शिक्षा के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इसका उद्देश्य स्पष्ट था—ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के छात्रों, खासकर गरीब एवं वंचित वर्गों को उनके घर के आसपास ही उच्च शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराना।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में एक गंभीर सवाल लगातार उठ रहा है — क्या नई संस्थाओं के निर्माण की होड़ में पहले से कार्यरत संबद्धता प्राप्त अनुदानित कॉलेजों की अनदेखी तो नहीं की जा रही? और क्या नए राजकीय डिग्री कॉलेज बिना बुनियादी संसाधनों के केवल कागजों पर ही ‘उच्च शिक्षा के केंद्र’ बनकर रह जाएंगे?
अनुदानित कॉलेज : उपेक्षा का शिकार
बिहार के अनेक जिलों में दशकों से संचालित संबद्धता प्राप्त अनुदानित कॉलेज उच्च शिक्षा की रीढ़ रहे हैं। इन संस्थानों ने सीमित संसाधनों के बावजूद लाखों छात्रों को शिक्षा प्रदान की है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में इन कॉलेजों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
इसके बावजूद, वर्तमान परिदृश्य में इन कॉलेजों को जिस तरह नजरअंदाज किया जा रहा है, वह चिंताजनक है। वित्तीय सहायता का अभाव, शिक्षकों और कर्मियों के वेतन में अनियमितता, बुनियादी ढांचे का जर्जर होना—ये सभी समस्याएं लंबे समय से बनी हुई हैं। सरकार की प्राथमिकता अब नए कॉलेज खोलने पर अधिक केंद्रित हो गई है, जबकि पुराने संस्थानों के सुदृढ़ीकरण पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा।
यह स्थिति किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं कही जा सकती। जिन संस्थानों ने वर्षों तक शिक्षा का भार संभाला, उन्हें आज संसाधनों के अभाव में संघर्ष करना पड़ रहा है, जबकि नई संस्थाओं को प्राथमिकता दी जा रही है।
नए राजकीय डिग्री कॉलेज : जमीन की समस्या
दूसरी ओर, नवस्थापित राजकीय डिग्री महाविद्यालयों की स्थिति भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। इन कॉलेजों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—स्थायी भूमि और बुनियादी ढांचे का अभाव। कई जगहों पर ये कॉलेज अस्थायी भवनों, स्कूल परिसरों या किराए के कमरों में संचालित हो रहे हैं। इससे न केवल शिक्षण कार्य प्रभावित होता है, बल्कि छात्रों के लिए एक सुसंगत शैक्षणिक वातावरण भी नहीं बन पाता। प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, खेल मैदान, छात्रावास जैसी आवश्यक सुविधाएं तो दूर की बात है, कई जगहों पर पर्याप्त कक्षाएं तक उपलब्ध नहीं हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केवल कॉलेज खोल देना ही शिक्षा के विस्तार का पर्याप्त उपाय है? या फिर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए ठोस आधारभूत संरचना अनिवार्य है?
योजना बनाम क्रियान्वयन की खाई
सरकारी योजनाएं अक्सर कागजों पर बहुत आकर्षक दिखती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका क्रियान्वयन कई चुनौतियों से घिरा होता है। राजकीय डिग्री कॉलेजों के मामले में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है।

एक ओर सरकार हर प्रखंड में कॉलेज खोलने की घोषणा करती है, दूसरी ओर जमीन अधिग्रहण, भवन निर्माण, स्टाफ की नियुक्ति जैसे बुनियादी कार्य समय पर पूरे नहीं हो पाते। परिणामस्वरूप, कॉलेज तो खुल जाते हैं, लेकिन वे लंबे समय तक पूर्ण रूप से संचालित नहीं हो पाते।
यह स्थिति न केवल संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि छात्रों के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ है। अधूरी तैयारी के साथ शुरू किए गए संस्थान छात्रों को वह गुणवत्ता नहीं दे पाते, जिसकी उन्हें अपेक्षा होती है।
छात्र-छात्राओं पर प्रभाव
इन दोनों प्रकार की समस्याओं का सीधा असर छात्रों पर पड़ता है। अनुदानित कॉलेजों में संसाधनों की कमी के कारण शिक्षा का स्तर प्रभावित होता है, जबकि नए कॉलेजों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव में छात्रों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
हालांकि, एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में नए कॉलेज खुलने से छात्राओं की भागीदारी में वृद्धि देखी जा रही है। घर के पास कॉलेज होने से अभिभावकों का विश्वास बढ़ा है और लड़कियां उच्च शिक्षा की ओर अधिक संख्या में अग्रसर हो रही हैं। यह सामाजिक परिवर्तन का संकेत है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन यदि इन संस्थानों की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह उत्साह लंबे समय तक कायम नहीं रह पाएगा।
संतुलित नीति की आवश्यकता
वर्तमान परिस्थिति यह संकेत देती है कि सरकार को अपनी नीति में संतुलन लाने की आवश्यकता है। केवल नए कॉलेज खोलना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पहले से कार्यरत संस्थानों को सशक्त बनाना भी उतना ही
जरूरी है।
इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं—
1. अनुदानित कॉलेजों का सुदृढ़ीकरण:
इन संस्थानों को नियमित वित्तीय सहायता, पर्याप्त शिक्षक एवं बुनियादी ढांचे की सुविधा प्रदान की जाए।
2. नए कॉलेजों के लिए भूमि सुनिश्चित करना:
राजकीय डिग्री कॉलेज खोलने से पहले उनकी स्थायी जमीन और भवन निर्माण की स्पष्ट योजना बनाई जाए।
3. समयबद्ध क्रियान्वयन:
योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए तय समयसीमा का सख्ती से पालन हो, ताकि अधूरी परियोजनाओं की संख्या कम हो।
4. गुणवत्ता पर जोर:
केवल संख्या बढ़ाने के बजाय शिक्षा की गुणवत्ता को प्राथमिकता दी जाए।
5. स्थानीय सहभागिता:
स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल किया जाए, ताकि जमीन और संसाधनों से जुड़ी समस्याओं का समाधान तेजी से हो सके।
निष्कर्ष
बिहार में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विस्तार की जो पहल की गई है, वह निश्चित रूप से सराहनीय है। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि इस विस्तार को मजबूत नींव पर खड़ा किया जाए।
एक ओर जहां अनुदानित कॉलेजों की उपेक्षा उन्हें धीरे-धीरे कमजोर कर रही है, वहीं दूसरी ओर बिना पर्याप्त संसाधनों के स्थापित किए जा रहे राजकीय डिग्री कॉलेज अपने उद्देश्य को पूर्ण रूप से हासिल नहीं कर पा रहे हैं।

जरूरत इस बात की है कि सरकार एक समग्र दृष्टिकोण अपनाए—जहां पुराने संस्थानों का सशक्तीकरण और नए कॉलेजों का सुविचारित विकास, दोनों साथ-साथ चलें। तभी ‘उन्नत शिक्षा, उज्ज्वल भविष्य’ का सपना वास्तव में साकार हो सकेगा।


