हर साल प्राचीन कला केन्द्र के प्रमाण पत्रों को अवैध कहने का चल रहा फैशन – राजा, कहा सस्ती लोकप्रियता पाने वाले फैला रहे भ्रम,

हर साल प्राचीन कला केन्द्र के प्रमाण पत्रों को अवैध कहने का चल रहा फैशन – राजा, कहा सस्ती लोकप्रियता पाने वाले फैला रहे भ्रम,

जेटी न्यूज।
समस्तीपुर। करीब करीब हर वर्ष जनवरी फरवरी महीने में प्राचीन कला केंद्र द्वारा प्रदत्त प्रमाण पत्र की वैधता पर सवाल उठाने की परंपरा बन गयी है। करीब हर वर्ष साल में एक बार इस तरह का भ्रामक बयान दे कर शिक्षा विभाग या किसी नियोजन इकाई के पदाधिकारी या फिर कोई व्यक्ति क्या साबित करना चाहता है यह समझ से परे है। इन दिनो एक बार फिर विभिन्न मीडिया चैनलों पर इस आशय की खबर का वीडियो क्लिप खूब वायरल हो रहा है जो बिल्कुल तथ्य से परे है। उक्त बातें प्राचीन कला केन्द्र से संबद्ध पूसा प्रखंड के वैनी स्थित जगमोहन विद्यापति कॉलेज ऑफ आर्ट एंड टेक्नोलॉजी के संस्थापक सचिव डाॅ संजय कुमार ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कही है। उन्होंने बताया कि आर्ट काॅलेज पटना के छात्रों व कुछ तथ्यहीन व अनर्गल प्रलाप से सस्ती लोकप्रियता के शौकीन लोग हर वर्ष इस तरह का कचरा फैलाते हैं। लोग भी अब इसे समझने लगे हैं। श्री राजा ने कहा कि उक्त क्लिप में सीट बेचने और नियुक्ति में घोटाले के जो दावे किये जा रहे हैं उनमें आंशिक सत्यता हो सकती है इसलिए उसे सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। किन्तु प्राचीन कला केंद्र चंडीगढ़ आदि प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा जारी प्रमाणपत्र को अमान्य व अवैध बताया जाना घोर आपत्तिजनक है। न्यूज क्लिप में दिख रहे लड़कों को आर्ट काॅलेज के पदाधिकारियों को कठघरे में लेना चाहिए जो उनकी प्रतिभा का उचित मुल्यांकन नहीं करती। मगर वे दूसरे प्रमाण पत्रों को खुल कर मीडिया के कैमरे के सामने अवैध कह रहे हैं, यह कानूनन अपराध है। विभिन्न न्यूज चैनल पर प्रसारित खबरों से एक बार फिर छात्रो अभिभावकों में भ्रम और असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इसलिए वायरल खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए श्री राजा ने कहा कि हर वर्ष किसी न किसी दैनिक समाचार पत्र में एक बार इस तरह की भ्रामक खबर फैलाने का रिवाज और फैशन सा बन गया है। बीपीएससी के अध्यक्ष द्वारा शपथ पत्र दिया जाना या विभिन्न हाई कोर्ट एवं विभिन्न नियामक इकाई द्वारा प्राचीन कला केंद्र के प्रमाण पत्र को अमान्य करार वाला बयान देने वाले लोग कुपढों की जमात के प्रतीत होते है। जिन्होने महज सस्ती लोकप्रियता हासिल करने केलिए सिर्फ अपनी भडास निकाली है। उसने न तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय की 2006 जारी अंजू कुमारी बनाम बिहार सरकार मामले में जारी रिपोर्ट पढी है, और न ही यूजीसी का प्राचीन कला केन्द्र के प्रमाण पत्रों के संदर्भ में जारि पत्र पढ़ा है। अगर पढा भी है तो आधा अधूरा समझ कर ही विद्वान बन रहे है। उन लडकों को यह तो बिल्कुल भी नहीं पता है कि देश में कितने प्रकार के शिक्षण संस्थान सक्रिय है। यदि पता होता ये अपराध नहीं करते। उन्हें यह जान लेना चाहिए कि प्राचीन कला केंद्र सहित इस तरह की सभी संस्थायें मानक संस्थान है जो भारतीय कला संस्.ति के संरक्षण व संवर्धन केलिए प्रतिबद्ध और एसआरए (1860 20/1) के तहत संचालित है। यह एवार्ड के साथ-साथ प्रमाण पत्र भी जारी कर सकती है। यूजीसी ने कभी अपने किसी पत्र में प्राचीन कला केंद्र के प्रमाण पत्र को अमान्य और अवैध करार नही दिया है। न ही किसी अदालत ने या अन्य संस्थानों ऐसी घोषणा की है। इतना ही नहीं बकायदा मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत सरकार ने भी विभिन्न दैनिक पत्रों में इस आशय की विज्ञप्ति प्रकाशित करवाई है। देश के लानामिविवि, मगध विवि, बी आर ए बिहार विवि, टी एमयू भागलपुर, पटना विश्वविद्यालय सहित दर्जनाधिक विश्व विद्यालयों व बिहार सरकार सहित कई राज्य सरकारों ने प्राचीन कला केंद्र के प्रमाणपत्र को मान्यता दे रखी है। जिसके आधार पर हजारों लोग संगीत शिक्षक और प्राध्यापक के रूप के आज भी योगदान कर रहे है। डाॅ राजा ने छात्रों व अभिभावकों से अपील करते हुए कहा है कि किसी भ्रामक पत्र या खबर पर न ध्यान देने की जरूरत है, न ही किसी स्तर पर परेशान होने की आवश्यकता ही है। श्री राजा ने कहा कि वे वकीलों से बात कर रहे हैं, उन लडकों का पता कर उनसे बात करेंगे। आवश्यकता पड़ी तो एक सम्मानित संस्थान के प्रमाण को सरेआम अवैध कहने तथा अफवाह और भ्रम फैलाने करने केलिए विधि सम्मत कार्रवाई की जायेगी।

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