एक खुली किताब थे जननायक कर्पूरी ठाकुर -रामनाथ ठाकुर

एक खुली किताब थे जननायक कर्पूरी ठाकुर
-रामनाथ ठाकुर

जे टी न्यूज
जननायक कर्पूरी ठाकुर राजनीतिक क्षितिज की एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र थे, जिन्होंने आर्थिक एवं शैक्षणिक रूप से अत्यंत ही विपन्न एवं देहाती परिवार में जन्म लेकर सभी विषमताओं से धैर्य एवं सफलतापूर्वक लड़ते हुए राजनीति और जीवन के शीर्ष मुकाम तक पहुंचे।
महात्मा गांधी की नेतृत्व में 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ हुआ एवं कर्पूरी जी तत्काल कालेज की पढ़ाई का परित्याग कर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संचालित आंदोलन में कूद पड़े। वस्तुतः कर्पूरी ठाकुर जी के राजनीतिक जीवन का शुभारंभ 1942 अगस्त क्रांति से हुआ। सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले लोगों के क्रिया-कलापों में आज अधिक से अधिक पारदर्शिता की मांग की जा रही है। खासकर राजनीति से जुड़े लोगों का जीवन पिछले कुछ वर्षों से विवाद का केंद्र बनता गया है। आम लोगों की विश्वसनीयता दावपर लग गयी है। शासन और सत्ता पाने का अर्थ लोग संपत्ति संग्रह करना समझने लगे है। ऐसे में जननायक कर्पूरी ठाकुर को याद करना जीवन के खुदरे यथार्थ से साक्षात्कार करना है। उनका जीवन एक खुली किताब की तरह था, जिसका एक-एक पन्ना उलट कर कोई भी पढ़ सकता है। उनमें कहीं कुछ दुराव-छिपाव नही था। उनके व्यक्तित्व और क्रिया-कलापों में ऐसी पारदर्शिता थी कि सब कुछ साफ-साफ झलकता था। विचार और कर्म का ऐसा मेल गांधी- लोहिया युग का राजनीतिक आदर्श था, जिसकी प्रतिमूर्ति थे-जननायक कर्पूरी ठाकुर।


जननायक कर्पूरी ठाकुर जी के राजनीतिक व्यक्तित्व का निर्माण गांधी युग के आदर्श के अनुरूप हुआ था। सादगी, संयम, सच्चाई, सच्चरित्रता और न्याय उस युग के जीवन के मूल मंत्र थे। गांधी जी की राजनीति में इन मूल्यों को उतारने का प्रयत्न किया था। उनके आदर्शों से प्रेरित होकर लाखों-करोड़ों नौजवान स्कूलों और कालेजों से निकलकर स्वतंत्रता-आंदोलन में शामिल हुए थे। कर्पूरी ठाकुर भी उन्हीं में से एक थे। इसलिए स्वतंत्रता को जीवन-मूल्य मानकर उन्होंने संघर्ष का रास्ता अपनाया और इसकी प्राप्ति के लिए सादगी, संयम, सच्चाई, सच्चरित्रता और त्याग का आदर्श सामने रखा। उनका राजनीतिक-मानस इन्हीं मूल्यों से निर्मित हुआ। इसलिए राजनीति उनके लिए समाज-सेवा की राह थी। वैसे भी स्वतंत्रता पूर्व की भारतीय राजनीति संघर्ष और सेवा की राजनीति थी। सुविधा की राजनीति ठाकुर जी को कभी रास नहीं आई, उस समय भी नहीं जब वे मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता की ऊंची कुसी पर बैठे थे।
आचार्य नरेंद्र देव, राम मनोहर लोहिया, लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी चिंतकों और नेताओं के सानिध्य में कर्पूरी जी ने सेवा और संघर्ष को अपने जीवन का व्रत बना लिया था। सादगी, सेवा और त्याग को राजनीतिक जीवन की थाती समझकर वे निरन्तर कार्यशील रहे। प्रसिद्ध पत्रकार दीनानाथ मिश्र ने उनके निधन पर लिखा था-वह भी चल बसे, मगर अपने परिवार के लिए एक मकान नहीं छोड़ गए। कोई स्थावर संपत्ति नहीं बनाई उन्होंने। जो व्यक्ति बिहार में एक बार उप मुख्यमंत्री, दो बार मुख्यमंत्री और दशकों तक विधायक और विरोधी दल का नेता रहा हो और एक मकान न बन सका हो, यह एक बहुत बड़ी बात है, उस नेता को समझने के लिए, जिसका नाम कर्पूरी ठाकुर था। उन्होंने दौलत वाली वसीयत नहीं छोड़ी। मगर दौलत के बारे में एक नजरिए की अक्षुण वसीयत उन्होंने छियालीस साल की अपनी सक्रिय राजनीतिक जीवन में एक-एक क्षण को लगाकर बिहार और देश के नाम लिखी है। गरीबी से भरे पूरे घर में पैदा हुए, गरीबों के ऊपर उठने के लिए आखिरी सांस तक लड़ते रहे और गरीबी में ही चल बसे। ऐसे में भी कर्पूरी जी ने अपने को दीप-स्तंभ बनाए रखा, ऐसा दीप-स्तंभ, जिसे नमन किया जा सकता है, अपने अंदर जलाया जा सकता है


दरअसल आज हम जिस सूचना-समाज में रह रहे हैं, उसमें अब किसी चीज के ओझल रहने की संभावना नहीं रह गई है। प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और सोशल मीडिया की टीम सभी में होड़ मची हुई है कि राजनेताओं और बड़े अधिकारियों के भ्रष्टाचार और वैयक्तिक जीवन के क्रिया-कलापों को कौन कितना उजागर करता है। इसलिए सामाजिक जीवन में काम करने वाले लोगों से भी आचार-व्यवहार में पारदर्शिता की अपेक्षा की जा रही है। ऐसे में जननायक कर्पूरी ठाकुर का स्मरण करना एक रोमांचक अनुभव है। अपने पूर्ण सुदीर्घ राजनीतिक जीवन में चिन्तन और कार्यक्रम की एकता तथा आचार एवं व्यवहार की पारदर्शिता के वे अप्रतिम उदाहरण थे। यही कारण था कि करोड़ों लोगों का सहज स्नेह प्राप्त था। बड़े से बड़े बुद्धिजीवी से लेकर अनपढ़ गरीब तक उनके चिन्तन के दायरे में शामिल थे। यही उनकी वास्तविक ताकत थी। देश की राजनीति में आने वाली पीढ़ियों के लिये जननायक कर्पूरी ठाकुर एक मिसाल के रूप में पेश किये जा सकते है।
स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करने वाले सपूतों को याद करना और उनके बताए रास्तों पर चलना ज्यादा जरूरी है। जननायक कर्पूरी ऐसे सपूतों में अग्रणी थे। सामाजिक न्याय की लड़ाई के साथ-साथ सामाजिक समरसता और सामाजिक सौहार्द्र कायम करने का जो ऐतिहासिक अभियान उन्होंने आरंभ किया था, उनके उस योगदान और परिणाम को पूरे राष्ट्र ने स्वीकार किया है। आज वे हमारे बीच नही है लेकिन उनका जीवन एक खुली किताब की तरह सबके सामने है।
यह संतोष का विषय है कि कर्पूरीजी ने समाज के जिस अंतिम आदमी के लिए गरिमापूर्ण जीवन का सपना देखा था, वह अब पूरा हो रहा है। वह बड़ी आबादी जो राजनीति की मुख्यधारा से दूर थी, आज निर्णायक बन गई है। इस बड़ी आबादी की उपेक्षा करना किसी राजनीतिक दल के लिए संभव नहीं है। केंद्र और राज्य सरकार की सभी कल्याणकारी योजनाएं इन वंचित वर्गों के कल्याण को ध्यान में रख कर बनाई जा रही हैं। राजनीति, प्रशासन, न्यायपालिका, शिक्षा और जीवन के विविध क्षेत्रों में उपेक्षित कहे जाने वर्ग की उपलब्धियां उत्साहजनक हैं। कर्पूरीजी जिन उपेक्षित वर्गों की खुशहाली के लिए उम्र भर चिंतित रहे, उन वर्गों के उत्थान के लिए सतत प्रयास ही जननायक के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
( लेखक जननायक कर्पूरी ठाकुर के पुत्र और केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री हैं।)

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