बसंत

बसंत

जे टी न्यूज
प्रकृति हो रही है हरित,पल्लवित,
गेंदा किंशुक,पलाश सरसों हुए पुष्पित।
अवनि ओढ़ ली धानी,पीत चुनरिया,
गुनगुनी धूप से शीत का हुआ अंत।
देखो आया है ॠतुराज बसंत।।

हरे-भरे तरु झूमें,और झूमें गेहूं की बाली,
देखो बौरों से लद गयी आमों की डाली,
चना अरहर लहलहाये फैली हरियाली.
मनमोहक और मादक हुआ दिग दिगंत,
देखो आया है ॠतुराज बसंत।।

आओ माँ शारदे का करें पूजन अर्चन,
आह्लादित उल्लासित सबका हृदयाँगन,
प्रियतम के आलिंगन को आतुर विरहन,
सुप्त जड़ अवचेतन मन हो रहा जीवंत।                                                देखो आया है मधुर मधुर बसंत।।

स्वरचित
अनुपमा सिंह

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