एआई के प्रयोग बारीकी से प्रयोग करना ही सतत विकास में होगा सहायक:- प्रधानाचार्य, डॉ. शंभु कुमार यादव

एआई के प्रयोग बारीकी से प्रयोग करना ही सतत विकास में होगा सहायक:- प्रधानाचार्य, डॉ. शंभु कुमार यादव

जे टी न्यूज, ल.ना.मि.वि. दरभंगा:-* आज दिनांक 29 अप्रैल 2025 को स्थानीय महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह मेमोरियल महाविद्यालय, दरभंगा में महाविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (आइक्यूएसी) व विनायम शोध संस्थान, धनबाद, झारखंड के सहयोग से दो दिवसीय बहु-विषयक राष्ट्रीय सेमिनार:- “आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस व सतत विकास” का प्रधानाचार्य डॉ. शंभु कुमार यादव की अध्यक्षता में दीप प्रज्वलन कर शुभारंभ किया गया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में विषय प्रवेश कराते हुए प्रधानाचार्य सह सेमिनार के संरक्षक सह संयोजक डॉ. शंभु कुमार यादव ने कहा कि विज्ञान में जो भी अनुसंधान और आविष्कार हुआ, निश्चित रूप से भौतिकतावादी युग में वो मानव की जरूरतों को पूरा कर रहा है लेकिन उसी का एक दूसरा पहलू जोखिम भी है। अगर हम उसका सही इस्तेमाल करते हैं तो वो फायदा पहुंचाता है और उसका गलत इस्तेमाल जोखिम भरा होता है। इसका जीता-जागता उदाहरण है आपके पास कि जिस न्यूक्लियर को पावर सेक्टर के लिये लाया गया था, वो पावर सेक्टर से ज्यादा परमाणु बम बनाने में प्रयोग किया जाने लगा।

वहीं दूसरा उदाहरण है बायो एनमी का है, जहां प्रयोगशाला में केमिकल्स के गलत प्रयोग से कोरोना जैसा महामारी फैलने की खबर है। इसीलिए एआई के प्रयोग को बारीकी से जानकर प्रयोग करना ही सतत विकास में सहायक होगा, अन्यथा उसका दुष्प्रभाव खतरनाक हो सकता है।
बतौर बीज वक्ता प्रथम विश्वविद्यालय राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. मुनेश्वर यादव ने कहा कि आपको सबसे पहले यह जानना व समझना होगा कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ने बनाया या किसी इंटेलीजेंट वैज्ञानिकों ने? उत्तर सीधा है इंटेलीजेंट वैज्ञानिकों ने। इसीलिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस समय की मांग हो सकती है लेकिन इंटेलीजेंस का तोड़ नहीं। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का ओवरडोज आपके इंटेलीजेंसिया को प्रभावित व सीमित कर सकती है और इसके सही व सीमित प्रयोग न केवल भारत के सतत विकास में सहायक हो सकता है और बल्कि विकसित भारत @2047 की दिशा में तुरुप का पत्ता साबित हो सकता है।
बतौर बीज वक्ता द्वितीय जानकी देवी महिला महाविद्यालय, पटना की अर्थशास्त्र विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ. मंजरी नाथ ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को सतत विकास से जोड़कर इस पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि कैसे आज हम आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का प्रयोग कृषि, मिट्टी जांच, मौसम पूर्वानुमान, तापमान, प्रदूषण नियंत्रण, शोध आदि के क्षेत्रों में प्रयोग कर सटीक व आसानी से जानकारी प्राप्त करने का माध्यम बन रहा है।


महाविद्यालय के बर्सर सह इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार चौधरी ने कहा कि अगर आप गौर से देखेंगे तो एआई का प्रयोग तो रामायण से लेकर महाभारत के काल में भी था। चाहे रावण का पुष्पक विमान हो, मायावी मृग हो, उनके तरकश का तीर-धनुष हो या एक जगह से गुम होकर दूसरे जगह प्रकट हो जाना। इसीलिए एआई शोध का नवीनतम उदाहरण है, जो कि फिलहाल शैशवावस्था में है। इसका समाज के सतत विकास पर सकारात्मक व नकारात्मक क्या असर पड़ता है वो तो कुछ वर्षों के बाद इसके किशोरावस्था में जाने पर ही वैज्ञानिक व शोधार्थी से डाटा प्राप्त होगा।
विनियम शोध संस्थान, धनबाद, झारखंड की निदेशक डॉ. उमा गुप्ता ने कहा कि वर्तमान युग डाटा का युग है। इस युग में उसी का खोज होगा जिसके पास डाटा का संकलन होगा। लेकिन एआई के इस युग में जो सबसे बड़ी चुनौती है वो है डाटा की गोपनीयता को बरकरार रखना। आज दिन भर हम मोबाइल यूज करते हैं। विभिन्न एप डाउनलोड करते हैं। उसके टर्म एंड कंडीशन को एक्सेप्ट करते हैं। तब जाकर एप का फंक्शनिंग शुरू होता है और इसमें सबसे बड़ा जोखिम आपके निजी डाटा का है। इसीलिए ये चिंता के साथ-साथ विमर्श का विषय है कि आनेवाले समय में लोगों के निजी डाटा का गोपनीयता बनी रहे। एआई को इसका भी ख्याल रखना होगा। तभी लोग इससे ज्यादा से ज्यादा जुड़ पाएंगे।

तकनीकी सत्र में 50 से अधिक शिक्षक, शोधार्थी, छात्र-छात्रा ने अपना पेपर प्रस्तुत किया। मंच संचालन हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. सतीश कुमार सिंह व धन्यवाद ज्ञापन बर्सर सह इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार चौधरी ने किया। सभी आगत-अतिथियों को मिथिला के पारंपरिक परिधान पाग, चादर व अंग-वस्त्र देकर सम्मानित किया गया। स्वागत गान संगीत विभागाध्यक्ष डॉ. चंद्रनाथ मिश्र के संयोजकत्व में प्रस्तुत किया गया। इस मौके पर आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (आइक्यूएसी) के समन्वयक सह सेमिनार के सयुक्त संचालन सचिव डॉ. मनोज कुमार वर्मा व आगंतुक अतिथि डॉ. सुबोध चंद्र यादव सहित सभी विभागों के विभागाध्यक्ष व शिक्षक उपस्थित थे।

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