जाति हमारा अतीत नहीं, बल्कि हमारा वर्तमान है

जाति हमारा अतीत नहीं, बल्कि हमारा वर्तमान है

जे टी न्यूज, दिल्ली: तीन घटनाएँ—हरिओम वाल्मीकि की लिंचिंग, आईपीएस अधिकारी वाई. पूरन कुमार की आत्महत्या, और मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर हमला—हमें याद दिलाती हैं कि जाति हमारा अतीत नहीं, बल्कि हमारा वर्तमान है।

आधुनिक भारत में यह नए-नए मुखौटे पहनती है, नौकरशाही प्रतिद्वंद्विता, भीड़ के संदेह या धार्मिक आक्रोश के पीछे छिपती है। लेकिन इन परतों को हटा दें, तो वही सच्चाई सामने आती है—जाति अभी भी तय करती है कि कौन पीड़ित है, किसे चुप करा दिया जाता है और कौन बच निकलता है।

शिक्षा और नौकरियाँ असमानता का मुकाबला तो कर सकती हैं, लेकिन वे पदानुक्रम को नहीं मिटा सकतीं। न्यायमूर्ति गवई भले ही सर्वोच्च न्यायिक पद पर हों, फिर भी सामाजिक व्यवस्था अडिग है।

हमारे सामने सवाल यह नहीं है कि जाति मौजूद है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हममें अभी भी इसके उन्मूलन का संकल्प—बाबासाहेब का संकल्प—है।

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