जब सत्ता सेवा बनी : जननायक कर्पूरी ठाकुर और दिसंबर के ऐतिहासिक फैसले
जब सत्ता सेवा बनी : जननायक कर्पूरी ठाकुर और दिसंबर के ऐतिहासिक फैसले
जे टी

हालिया बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान “जननायक” शब्द बार-बार सुनाई दिया। मंचों से लेकर नारों और भाषणों तक इस शब्द का व्यापक प्रयोग हुआ। लेकिन यदि इस शब्द के वास्तविक अर्थ और उसकी जीवंत मिसाल की बात की जाए, तो वह केवल किसी चुनावी रणनीति तक सीमित नहीं है। बिहार के सच्चे जननायक थे – भारत रत्न, जननायक कर्पूरी ठाकुर। कर्पूरी ठाकुर केवल एक मुख्यमंत्री नहीं थे, बल्कि वे राजनीति में नैतिकता, सादगी और सामाजिक न्याय की जीवित प्रतिमूर्ति थे। वे उन दुर्लभ नेताओं में से थे, जिनका जीवन और विचार सत्ता में आने के बाद भी नहीं बदला। बिहार के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास में दिसंबर का महीना एक ऐतिहासिक मोड़ लेकर आया, जब 22 दिसंबर 1970 को समाजवादी विचारधारा के प्रखर नेता कर्पूरी ठाकुर ने बिहार के 11वें मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार शपथ ली। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि शासन की दिशा और प्राथमिकताओं में आमूलचूल परिवर्तन का संकेत था। यह वह क्षण था, जब पहली बार बिहार की सत्ता में शोषित-वंचित वर्गों की वास्तविक आवाज़ पहुँचीकर्पूरी ठाकुर का जन्म एक अत्यंत साधारण नाई (नाई/हज्जाम) परिवार में हुआ था। गरीबी, अभाव और सामाजिक उपेक्षा उनके जीवन के स्थायी साथी रहे। उन्होंने अपने बचपन और युवावस्था में न केवल आर्थिक तंगी को झेला, बल्कि सामाजिक भेदभाव को भी नजदीक से देखा। यही अनुभव उनके राजनीतिक दर्शन की नींव बने।वे मानते थे कि राजनीति का उद्देश्य सत्ता नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुँचाना है।
1970 में कर्पूरी ठाकुर ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP) के नेतृत्व में एक गठबंधन सरकार बनाई। यह सरकार विचारधारा के स्तर पर समाजवादी मूल्यों—समता, सामाजिक न्याय और समान अवसर—पर आधारित थी।उनका मुख्यमंत्री बनना उस समय के सामाजिक ढांचे के लिए एक क्रांतिकारी घटना थी, क्योंकि पहली बार गैर-सवर्ण, पिछड़े वर्ग से आने वाला नेता बिहार की सत्ता की बागडोर संभाल रहा था।
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के तुरंत बाद कर्पूरी ठाकुर ने जो पहला बड़ा और ऐतिहासिक निर्णय लिया, वह था वृद्धावस्था पेंशन योजना की शुरुआत। यह निर्णय उनके राजनीतिक जीवन का ही नहीं, बल्कि बिहार के सामाजिक कल्याण इतिहास का भी एक मील का पत्थर साबित हुआ। इस योजना की प्रेरणा उन्हें अपने पिता की आर्थिक स्थिति से मिली थी। उन्होंने अपने पिता को वृद्धावस्था में असहायता और आर्थिक असुरक्षा से जूझते देखा था। वे भली-भांति जानते थे कि जब व्यक्ति की कार्य-क्षमता समाप्त हो जाती है, तब उसके पास सम्मानपूर्वक जीवन जीने का कोई सहारा नहीं बचता।कर्पूरी ठाकुर का मानना था कि राज्य का कर्तव्य है कि वह अपने बुजुर्ग नागरिकों को भी गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार दे। वृद्धावस्था पेंशन योजना केवल एक सरकारी योजना नहीं थी, बल्कि यह कर्पूरी ठाकुर की संवेदनशील, मानवीय और जनोन्मुख राजनीति का प्रतीक थी। इससे यह स्पष्ट संदेश गया कि उनकी सरकार की प्राथमिकता सत्ता के गलियारों में बैठा वर्ग नहीं, बल्कि गांव-गरीब, मजदूर, किसान और बुजुर्ग होंगे।यह योजना आगे चलकर अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की आधारशिला बनी और देश भर में कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की अवधारणा को मजबूती मिली।

बिहार की राजनीति में दिसंबर का महीना कर्पूरी ठाकुर के जीवन से केवल संयोगवश नहीं, बल्कि वैचारिक और ऐतिहासिक रूप से गहराई से जुड़ा रहा है। जैसे 22 दिसंबर 1970 को उन्होंने पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर सामाजिक न्याय की राजनीति की नींव रखी थी, वैसे ही 28 दिसंबर 1977 को उनका दूसरा मुख्यमंत्री कार्यकाल शुरू हुआ, जिसने उस नींव को मजबूत और स्थायी स्वरूप दिया।यह कार्यकाल भले ही समय की दृष्टि से अपेक्षाकृत छोटा रहा—28 दिसंबर 1977 से 17 अप्रैल 1979 तक—लेकिन इसके दौरान लिए गए निर्णयों ने बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश की सामाजिक-राजनीतिक दिशा को प्रभावित किया।1977 का समय भारतीय लोकतंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। आपातकाल के बाद देश में लोकतांत्रिक चेतना पुनः जागृत हुई थी। जनता ने सत्ता के दमनकारी स्वरूप को नकारते हुए समाजवादी और जनोन्मुख राजनीति को समर्थन दिया। इसी पृष्ठभूमि में कर्पूरी ठाकुर दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। यह केवल सत्ता में वापसी नहीं थी, बल्कि जनता के भरोसे की पुनर्स्थापना थी। कर्पूरी ठाकुर के दूसरे कार्यकाल की सबसे ऐतिहासिक और क्रांतिकारी उपलब्धि थी पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू करना, वह भी मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशों के आधार पर।इस निर्णय के तहत उन्होंने अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) को अलग पहचान दी, पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण का वास्तविक लाभ दिलाने का प्रयास किया और सामाजिक न्याय को केवल नारा नहीं, बल्कि नीति और कानून का रूप दिया। यह फैसला अपने समय से बहुत आगे का था। जब देश के अधिकांश हिस्सों में आरक्षण को लेकर संकोच और भय था, उस समय कर्पूरी ठाकुर ने सामाजिक असमानता की जड़ों पर सीधा प्रहार किया।पिछड़ों के लिए आरक्षण का निर्णय आसान नहीं था। इसके विरोध में सवर्ण तबकों में असंतोष फैला, आंदोलन हुए, राजनीतिक दबाव बढ़ा।लेकिन कर्पूरी ठाकुर डगमगाए नहीं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि
“समानता का अर्थ समान व्यवहार नहीं, बल्कि समान अवसर है।”
वे जानते थे कि सामाजिक न्याय का मार्ग कठिन है, परंतु यही मार्ग समाज को संतुलन और समरसता की ओर ले जाता है।दूसरे कार्यकाल में भी कर्पूरी ठाकुर का जीवन और आचरण वैसा ही सादा रहा । न सत्ता का अहंकार,न सरकारी सुविधाओं का मोह।उनकी राजनीति सत्ता-संरक्षण की नहीं, सामाजिक परिवर्तन की राजनीति थी। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि मुख्यमंत्री का कार्यकाल वर्षों से नहीं, निर्णयों की गहराई से आँका जाता है।
मुंगेरी लाल आयोग के आधार पर लिया गया आरक्षण का निर्णय आगे चलकर मंडल राजनीति की आधार भूमि बना, पिछड़े और अत्यंत पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी, और लोकतंत्र अधिक प्रतिनिधिमूलक बना।आज जब सामाजिक न्याय की राजनीति की बात होती है, तो कर्पूरी ठाकुर का दूसरा कार्यकाल मील का पत्थर माना जाता है।
कर्पूरी ठाकुर की राजनीति को यदि एक पंक्ति में समझा जाए, तो कहा जा सकता है कि दिसंबर उनके लिए केवल कैलेंडर का महीना नहीं, बल्कि निर्णायक फैसलों की प्रयोगशाला था। जिन नीतिगत और वैचारिक निर्णयों ने उन्हें “जननायक” बनाया, उनकी आधारशिला दिसंबर में ही पड़ी। कर्पूरी ठाकुर का यह फैसला उस समय के शैक्षिक ढांचे पर सीधा प्रहार था।
उन्होंने मैट्रिक (10वीं) परीक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त कर दी, ताकि गरीब परिवारों के बच्चे, ग्रामीण और पिछड़े वर्गों के छात्र, अंग्रेजी संसाधनों से वंचित विद्यार्थी केवल भाषा के कारण शिक्षा से बाहर न हो जाएं।कर्पूरी ठाकुर मानते थे कि भाषा ज्ञान का साधन है, बाधा नहीं। उनका उद्देश्य यह था कि शिक्षा का दरवाजा उन लाखों बच्चों के लिए खुले, जिनकी प्रतिभा अंग्रेजी के डर से कुंठित हो जाती थी। यह निर्णय सामाजिक न्याय को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने का साहसिक प्रयोग था।

गैर-लाभकारी भूमि पर लगान (मालगुजारी) माफ किसान-केंद्रित सोच का दूसरा बड़ा उदाहरण था छोटी जोत और गैर-लाभकारी भूमि पर लगान की माफी। कर्पूरी ठाकुर भली-भांति जानते थे कि सीमांत किसान पहले ही उत्पादन लागत से जूझ रहा है,ऐसी जमीन, जिससे पर्याप्त आमदनी नहीं होती, उस पर कर लगाना अन्याय है। इसलिए उन्होंने मालगुजारी टैक्स समाप्त कर किसानों को सीधी राहत दी।यह निर्णय आर्थिक न्याय की दिशा में उतना ही महत्वपूर्ण था, जितना सामाजिक न्याय।इन दोनों ऐतिहासिक फैसलों के पीछे जो दृष्टि थी, वह दिसंबर में सत्ता संभालते समय ही स्पष्ट हो चुकी थी—
शासन का केंद्र गरीब, किसान और वंचित वर्ग होंगे।
इसी वैचारिक स्पष्टता ने आगे चलकर आरक्षण नीति,शिक्षा में समान अवसर, और आर्थिक राहत जैसे निर्णयों को जन्म दिया। उनकी राजनीति ने EBC को केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतना दी। यही कारण है कि कोई भी दल आज इस वर्ग की अनदेखी करने का साहस नहीं कर सकता।
विजय कुमार साहनी
परिचय – लेखक समाजवादी चिन्तक, लेखक एवं बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति , बिहार , जीविका में प्रबंधक है |
