12 जनवरी: स्वामी विवेकानंद जयंती विशेष
12 जनवरी: स्वामी विवेकानंद जयंती विशेष

जे टी न्यूज
आरोप, परंपरा और सत्य: क्या विवेकानंद सचमुच सनातन विरोधी थे?
स्वामी विवेकानंद (1863–1902) आधुनिक भारत के महान विचारक, संन्यासी और आध्यात्मिक गुरु थे, जिन्होंने वेदांत दर्शन को न केवल भारत में बल्कि विश्व मंच पर प्रतिष्ठित किया। वे रामकृष्ण परमहंस के प्रमुख शिष्य थे और उन्होंने शिकागो के 1893 के विश्व धर्म सम्मेलन में अपने ऐतिहासिक भाषण के माध्यम से भारत की सहिष्णु, उदार और आध्यात्मिक परंपरा से पूरी दुनिया को परिचित कराया। विवेकानंद ने अद्वैत वेदांत को कर्म, भक्ति और सेवा से जोड़ते हुए उसे जीवनोपयोगी दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया तथा “उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको” जैसे प्रेरक विचारों से युवाओं में आत्मविश्वास और राष्ट्रबोध का संचार किया। वे केवल संत ही नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना से लैस ऐसे चिंतक थे जिन्होंने मानवसेवा को ही ईश्वर-सेवा का मार्ग बताया और भारतीय पुनर्जागरण को नई दिशा दी।
शिकागो (1893) के सर्वधर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद द्वारा प्रस्तुत वेदांत की व्याख्या को लेकर सनातन परंपरा के भीतर एक गहरा वैचारिक विवाद उभरता है, जिसकी जड़ में शास्त्रीय अद्वैत वेदांत और आधुनिक व्यावहारिक व्याख्या के बीच का टकराव है। सनातन आलोचकों का तर्क है कि विवेकानंद ने “सभी धर्म सत्य की ओर जाने के मार्ग हैं” जैसा कथन देकर वेद-प्रमाण्य की उस केंद्रीय अवधारणा को शिथिल किया, जिसमें श्रुति को सर्वोच्च और अंतिम सत्य का एकमात्र साधन माना गया है; उनके अनुसार, अन्य मतों को समान स्तर पर रखना अद्वैत की शास्त्रीय सीमा का अतिक्रमण है। इसी तरह, विवेकानंद द्वारा अद्वैत को सार्वभौमिक मानववाद के रूप में प्रस्तुत करना—जहाँ सेवा, करुणा और सामाजिक कर्म को आध्यात्मिक साधना के केंद्र में रखा गया—आलोचकों को यह कहने का अवसर देता है कि उन्होंने मोक्ष-केंद्रित दर्शन को लोकसेवा-केंद्रित नैतिकता में बदल दिया। शंकराचार्य परंपरा में जहाँ सेवा को चित्तशुद्धि का साधन माना गया है, वहीं विवेकानंद के यहाँ वह लगभग मोक्ष का प्रत्यक्ष मार्ग बन जाती है, जिसे सनातन आलोचक दार्शनिक सरलीकरण मानते हैं। इसके अतिरिक्त, पश्चिमी मंच पर हिंदू दर्शन को प्रस्तुत करते समय प्रतीकों, भाषा और भावबोध को “पश्चिमी स्वाद” के अनुरूप ढालने का आरोप भी लगाया जाता है, जिससे उन्हें ‘नव-वेदांती’ या ‘सांस्कृतिक हिंदू’ कहा गया। इस आलोचना का मूल भाव यह है कि विवेकानंद ने परंपरा का खंडन नहीं किया, किंतु उसकी शास्त्रीय कठोरता को समयानुकूल बनाते हुए जो विस्तार किया, वह परंपरावादियों को सनातन धर्म की मूल दार्शनिक संरचना से विचलन प्रतीत होता है।

जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत वेदांत भारतीय दर्शन की सबसे सुदृढ़ और शास्त्रसम्मत परंपराओं में से एक है, जिसका आधार उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता जैसे प्रस्थानत्रयी ग्रंथों पर टिका हुआ है। शंकराचार्य के अनुसार परम सत्य केवल ब्रह्म है, जो निराकार, निर्विकार और एकमेव अद्वितीय है, जबकि यह दृश्य जगत मिथ्या है—अर्थात् पूर्णतः असत्य नहीं, बल्कि अज्ञान के कारण सत्य प्रतीत होने वाला अस्थायी रूप। उनका मूल सिद्धांत है कि आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है, किंतु अविद्या के कारण जीव स्वयं को देह, मन और संसार से अभिन्न मान बैठता है और इसी भ्रांति से बंधन उत्पन्न होता है। इस बंधन से मुक्ति केवल ज्ञानमार्ग से संभव है, जहाँ शास्त्राध्ययन, गुरु-उपदेश और आत्मचिंतन के माध्यम से ब्रह्मबोध प्राप्त होता है; कर्म और भक्ति को वे मोक्ष के प्रत्यक्ष साधन नहीं, बल्कि चित्तशुद्धि और ज्ञानप्राप्ति के सहायक उपाय मानते हैं। इसी कारण शंकराचार्य का वेदांत संन्यास, वैराग्य, इंद्रियनिग्रह और कठोर शास्त्रनिष्ठा पर आधारित है, जिसमें संसार से अनासक्ति रखते हुए आत्मसाक्षात्कार को जीवन का परम लक्ष्य माना गया है।
स्वामी विवेकानंद का वेदांत शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन पर ही आधारित है, किंतु वह उसका व्यावहारिक और नव-अद्वैतात्मक विस्तार प्रस्तुत करता है, जिसे उन्होंने बदलते समय और सामाजिक यथार्थ के अनुरूप व्याख्यायित किया। स्वयं विवेकानंद ने स्पष्ट कहा कि वे शंकराचार्य के अनुयायी हैं, पर उनका प्रयास अद्वैत को केवल संन्यासियों या एकांत साधना तक सीमित रखने के बजाय सामाजिक जीवन से जोड़ने का था। उनके अनुसार “जगत मिथ्या” को केवल निषेधात्मक अर्थ में नहीं समझा जाना चाहिए, बल्कि यह संसार भी उसी ब्रह्म की अभिव्यक्ति है, इसलिए इससे पलायन नहीं बल्कि इसके माध्यम से सेवा और साधना का मार्ग प्रशस्त होता है। इसी दृष्टि से उन्होंने मानवसेवा को ईश्वर-सेवा के समकक्ष रखा और “दरिद्र नारायण” की अवधारणा के माध्यम से बताया कि भूखे, पीड़ित और वंचित मानव में ही ईश्वर का साक्षात् रूप विद्यमान है। विवेकानंद के वेदांत में कर्म, भक्ति और ज्ञान तीनों को समान महत्व प्राप्त है, क्योंकि उनके अनुसार बिना कर्म के करुणा अधूरी है, बिना भक्ति के अहंकार समाप्त नहीं होता और बिना ज्ञान के मुक्ति संभव नहीं। उन्होंने सन्यास को संसार से पलायन नहीं, बल्कि लोककल्याण और राष्ट्रनिर्माण का साधन माना, जिससे उनका वेदांत जीवनोन्मुख, राष्ट्रोन्मुख और व्यापक मानवहित की भावना से ओत-प्रोत दर्शन के रूप में उभरता है।
विवेकानंद का वेदांत सनातन धर्म से अलग नहीं है, बल्कि वह उसी परंपरा की समयानुकूल और व्यावहारिक व्याख्या है—यह बात संतुलित दृष्टि से समझना आवश्यक है। वेदांत का मूल स्रोत उपनिषद ही हैं और विवेकानंद ने न तो उनके प्रामाण्य को नकारा और न ही आत्मा–ब्रह्म की अद्वैत एकता के सिद्धांत से विचलन किया; उनका लक्ष्य भी वही आत्मबोध और मुक्ति है, जो सनातन दर्शन का केंद्रीय उद्देश्य रहा है। अंतर केवल इतना है कि जहाँ शंकराचार्य ने वेदांत को मुख्यतः संन्यासियों और साधकों के लिए एक कठोर, वैराग्यप्रधान मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया, वहीं विवेकानंद ने उसी दर्शन को गृहस्थों, युवाओं और राष्ट्रनिर्माण की चुनौतियों से जूझते समाज के लिए सुलभ और जीवनोपयोगी बनाया। उन्होंने आत्मबोध को सामाजिक उत्तरदायित्व, सेवा और कर्म से जोड़कर यह स्पष्ट किया कि सनातन धर्म केवल निवृत्ति का नहीं, बल्कि प्रवृत्ति और लोककल्याण का भी मार्ग है। इस प्रकार विवेकानंद का वेदांत सनातन से विच्छिन्न नहीं, बल्कि उसकी जीवंत परंपरा का विस्तार है, जो शास्त्रीय मूल को सुरक्षित रखते हुए उसे समय, समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं से जोड़ता है

यह स्पष्ट होता है कि शंकराचार्य और स्वामी विवेकानंद को परस्पर विरोधी मानना एक सरलीकृत और अधूरा दृष्टिकोण है। शंकराचार्य ने ऐसे समय में वेदांत की शास्त्रीय संरचना, अद्वैत सिद्धांत और श्रुति-प्रमाण्य को सुदृढ़ कर उसे दार्शनिक विकृतियों से बचाया, जब भारतीय चिंतन पर बाह्य और आंतरिक चुनौतियाँ गहराती जा रही थीं। वहीं स्वामी विवेकानंद ने उसी वेदांत को आधुनिक विश्व की भाषा में रूपांतरित कर उसे वैश्विक मंच तक पहुँचाया और यह सिद्ध किया कि यह दर्शन केवल संन्यासियों की साधना तक सीमित नहीं, बल्कि मानवता, राष्ट्र और समाज के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। इस प्रकार शंकराचार्य वेदांत के मूल आधार हैं और विवेकानंद उसका स्वाभाविक विस्तार; उनके बीच का विवाद दर्शन के मूल तत्वों का नहीं, बल्कि प्रस्तुति, प्राथमिकता और युगबोध का है, न कि सनातन धर्म से किसी प्रकार का विरोध।
