अंगड़ाई

अंगड़ाई

जे टी न्यूज,
प्रकृति ने ली अंगड़ाई,
सुन सखी बसंत ऋतु आई।
कलियों पे मंडराये भंवरे,
करें ठिठोली, बनकर बावरे।

क्षणिक मेहमान खिज़ा,
दे, हंस विदा आकर फ़िजा।
हुए गुलज़ार बाग बगीचे,
खोलकर बैठे महकते दरीचे।

खेतो में, सरसों लहराई,
पीली चुनर ले धरा मुस्कराई।
स्वागतम करने को तैयार,
करती, बरसों-बरस इंतज़ार।

ख़ुमार-ए-बसंतोत्सव,
देता, हर्षोल्लास को उद्भव।
देखकर मनमोहक,छटा,
आती याद, सावन की घटा।

सृष्टि को, कोटिश नमन,
जो बांटे रंगीनियत-ए-चमन।
आ, लें जीभर कर निहार,
“गिल” नहीं, करना पर संहार।

नवनीत गिल
एम.ए (इतिहास,राजनीति शास्त्र), बी.एड, एम.एड, एल.एल.बी।
पूर्व प्राचार्य
सीबीएसई विद्यालय (उत्तर प्रदेश)।

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