*हिन्दुत्व, मनुस्मृति और भारतीय संविधान* *(आलेख : जवरीमल्ल पारख)*/जे टी न्यूज़

*हिन्दुत्व, मनुस्मृति और भारतीय संविधान*
*(आलेख : जवरीमल्ल पारख)*/जे टी न्यूज़

13 दिसम्बर, 2025 के टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार उत्तर प्रदेश के बहराइच के स्थानीय कोर्ट ने 2024 में दुर्गा पूजा के अवसर पर (13 अक्टूबर 2024) हुए सांप्रदायिक दंगे के मामले में जिसमें एक व्यक्ति रामगोपाल मिश्र की मृत्यु हो गई थी, मोहम्मद सरफराज उर्फ रिंकू नाम के एक आरोपी को फांसी की सजा सुनाई गई और अन्य 9 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। अपने फैसले में सत्र न्यायाधीश प्रेम कुमार शर्मा ने हत्या को “अत्यधिक बर्बर” और “सामाजिक ताने-बाने को ध्वस्त करने वाला” बताया और सजा के लिए मनुस्मृति के एक श्लोक को उद्धृत किया, जिसके अनुसार, “दंड सभी प्रजाओं के कर्तव्य-अकर्तव्य का उपदेश देता है, दंड ही सभी ओर से रक्षा करता है, लोगों के सोने पर भी दंड जागृत ही रहता है, समझदार लोग दंड को ही धर्म के रूप में जानते हैं” (दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दंड एवाभिरक्षति। दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दंड धर्मं विदूर्बुधा: (मनुस्मृति, सप्तम अध्याय, श्लोक 18)। यहाँ दंड का अर्थ राज्य द्वारा किया जाने वाला न्याय है। न्याय में सजा ही मुख्य है, इसलिए इसे दंड कहा गया है। इसलिए दंड देने वाला राजा ही दंड है। जिस दंड प्रदान करने वाले राजा का मनुस्मृति में इतना गुणगान किया गया है कि उसे ही सूर्य, अग्नि, वायु, आदि देवताओं से तुलना की गई है (7/5-10)। लेकिन इस दंड का विधान वर्ण-व्यवस्था के अनुसार किया गया है, जिसे ब्रह्मा के देह से उत्पन्न बताया गया है।मनुस्मृति में चारों वर्णों के लिए एक-सी दंड व्यवस्था नहीं है, जिसका हम आगे विस्तार से उल्लेख करेंगे। इसी अध्याय के श्लोक 24 में कहा गया है कि “दंड का विचलन होगा, तो सभी ब्राह्मण-क्षत्रादि वर्ण के मनुष्य विवाह-आचार-विचार भोजनादि की अव्यवस्था से विकृत हो जाएंगे, सभी मर्यादाएं टूट जाएंगी, सम्पूर्ण लोक का क्षोभ भी हो जाएगा”। इस श्लोक से स्पष्ट है कि मनुस्मृति की दंड-व्यवस्था दरअसल वर्ण-व्यवस्था को बनाए रखना है।बहराइच के इस फैसले को लिखते हुए सत्र न्यायाधीश का मनुस्मृति को उद्धृत करना संयोग नहीं है। जिसे अपराधी बताकर मृत्युदंड दिया गया है, उसके जिन बर्बर कृत्यों का फैसले में उल्लेख किया गया है, उसका न तो चार्जशीट में और न पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में कोई उल्लेख किया गया है और केवल यह कहा है कि रामगोपाल मिश्रा की मृत्यु गोली लगने से हुई। लेकिन क्या यह संयोग है कि जिस रामगोपाल मिश्रा की गोली लगने से हत्या हुई, वह अब्दुल हमीद की दुकान की छत पर चढ़कर वहाँ लगे हरे झंडे उतार रहा था। इसी दौरान ऊपर से गोली चली और रामगोपाल मिश्रा की मृत्यु हो गई। रामगोपाल मिश्रा के मामले में न्याय-व्यवस्था अत्यंत तीव्र गति से काम करती नजर आती है और फैसला अपराध होने के एक साल दो महीने बाद ही सुना दिया जाता है। लेकिन 2015 में इसी उत्तर प्रदेश में भीड़ द्वारा एक बुजुर्ग मुसलमान मोहम्मद अखलाक को उसके घर पर ही मार दिया जाता है, इस झूठ के बिना पर कि उसने अपने घर पर गोमांस रखा हुआ है, जबकि वह बकरी का मांस था। अखलाक की हत्या का आह्वान स्थानीय मंदिर से किया जाता है और एक भीड़ उसके घर पहुँच जाती है। उस पर हमला किया जाता है। उसे बुरी तरह से पीटा जाता है कि वहीं उसकी मौत हो जाती है। लेकिन इस अपराध को करने वालों पर दस साल तक मुकदमा चलता है। सभी आरोपी बहुत पहले से ही जमानत पर छूटे हुए होते हैं और आखिरकार 2025 में उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार सभी आरोपियों से मुकदमा हटा लेती है और इस तरह हत्या का यह मामला जिसमें एक मुसलमान मारा जाता है, वहाँ किसी न्यायालय को और न्यायाधीश को राजधर्म की याद नहीं आती और न दंड की। क्या अखलाक की हत्या बर्बर हत्या नहीं थी? भारतीय न्याय व्यवस्था जो भारतीय संविधान पर आधारित है और जो धर्म, जाति और वर्ण के आधार पर किसी तरह के भेदभाव या पक्षपात का पूरी तरह निषेध करती है। लेकिन व्यवहार में क्या हो रहा है, इसे इन दोनों मामलों से समझा जा सकता है। और ये दो मामले ही नहीं है, ऐसे दसियों मामले हैं, जो रोजाना घटित होते हैं।

भारत के गाँव में आज भी दलितों को व्यवहार में वे अधिकार हासिल नहीं हैं, जिसकी गारंटी हमारा संविधान देता है। छुआछूत को हमारे संविधान में अपराध घोषित किया गया है, लेकिन गांवों में ही नहीं, शहरों में भी दलितों के साथ छुआछूत को आये दिन देखा जा सकता है। राजस्थान के एक स्कूल में एक दलित विद्यार्थी को इसलिए मार दिया जाता है, क्योंकि उसने सवर्णों के लिए रखे गए पीने के पानी के घड़े से पानी पीने का दुस्साहस किया था। आज भी उत्तर भारत में दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़कर बारात निकालने से रोका जाता है और अगर ऐसी कोई कोशिश होती है, तो बारात पर हमला कर दिया जाता है और हत्या तक कर दी जाती है। आज भी गांवों की कुछ सड़कों से दलित नहीं निकल सकते। औरतें चप्पल पहनकर नहीं निकल सकती और अगर कोई ऐसी हिमाकत करती है, तो उसे सरेआम पीटा जाता है। दलित लड़कियों के साथ बलात्कार और उसके बाद हत्या आए दिन की घटनाएं हो चुकी हैं। दलितों को सरेआम पीटने और उसकी वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की घटनाएं बताती है कि संविधान लागू होने के 75 साल बाद भी वास्तविक ताकत संविधान में वर्णित लोकतान्त्रिक व्यवस्था में नहीं, बल्कि उस वर्णव्यवस्था पर आधारित व्यवस्था में है, जिसका उल्लेख मनुस्मृति में किया गया है।

26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ भारत ने अपने को संप्रभुतासम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणतंत्र घोषित किया था। यह भारतीय इतिहास में एक नये युग की शुरुआत थी। लेकिन इसके पीछे लगभग दो सौ साल का संघर्ष था। 1757 में प्लासी के युद्ध के साथ ही भारत पर अंग्रेजों का शासन स्थापित होने की शुरुआत हो गई थी। लेकिन इसके साथ ही इस गुलामी के विरुद्ध एक लंबे संघर्ष की शुरुआत हो गई थी। एक स्तर पर राजनीतिक दासता से मुक्ति का संघर्ष था, तो दूसरे स्तर पर सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव का संघर्ष भी था। इस दूसरे संघर्ष को पुनर्जागरण या नवजागरण नाम दिया गया। पहला संघर्ष अंग्रेजों के विरुद्ध था, तो दूसरा संघर्ष अपने-आप से था। यह दूसरा संघर्ष मध्ययुगीन पिछड़ेपन से था, जिससे मुक्ति पाकर एक आधुनिक भारत बनाना था। लेकिन यह संघर्ष आंतरिक अंतर्विरोधों से भरा था। इस दौर के नवोदित मध्य वर्ग के बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा इस औपनिवेशिक प्रचार के प्रभाव में था कि प्राचीन भारत यानी मध्य युग से पूर्व का भारत एक स्वर्णिम भारत था, जिसे दोबारा लाने की जरूरत है। यानी कि नवजागरण की बजाय वे पुनरुत्थानवाद के समर्थक थे। वे उस युग को वापस लाना चाहते थे, जिसकी बुनियाद ब्राहमणवाद पर टिकी थी, जहां पूरा समाज चार वर्णों में विभाजित था — सबसे ऊपर ब्राह्मण थे और सबसे नीचे शूद्र। शूद्रों का काम ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना था। शूद्रों और स्त्रियों को कोई अधिकार नहीं था।दोनों समुदायों के विद्याध्ययन पर प्रतिबंध था। ब्राह्मणों द्वारा बड़े-बड़े यज्ञ आयोजित किए जाते थे, जिनमें बड़ी संख्या में पशुओं कि बलि दी जाती थी। पुरुषों को एक से अधिक विवाह करने का अधिकार था। लेकिन पति के मरने पर स्त्रियों को अपने पतियों के शव के साथ जिंदा जला दिया जाता था और इसे सती प्रथा कहते थे। पति के मरने पर विधवा स्त्री दूसरी शादी नहीं कर सकती थी और न ही वह सज-सँवरकर रह सकती थी। ऐसा नहीं है कि इन ब्राह्मणवादी परंपराओं को लोगों ने सहज ही स्वीकार कर लिया था। जैन, बौद्ध, सिख आदि धर्म इन ब्राह्मणवादी परंपराओं के विरुद्ध संघर्ष से ही अस्तित्व में आए थे। लेकिन जब बौद्ध धर्म धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा और जैन धर्म वणिक वर्ग के बीच ही सीमित हो गया, तो एक बार फिर से ब्राह्मण धर्म न केवल मजबूत हुआ बल्कि उसके साथ ही वर्णव्यवस्था और मजबूत हुई और राजसत्ता के समर्थन के साथ शूद्रों पर दमन और अत्याचार भी बढ़ा। शूद्र कैसे कपड़े पहनें, किन रास्तों से जाएँ या न जाएँ, सवर्णों से स्पर्श होने पर उन्हें क्रूर सजाए देना आम बात हो गई।

मध्य युग में जब मुस्लिम शासक भारत के बहुत से इलाकों पर शासन करने लगे, तब भी हिन्दू जनता के बीच वर्ण व्यवस्था वैसे ही पूर्ववत कायम रही, जबकि इस्लाम में न वर्णव्यवस्था थी और न जातिवाद था। लेकिन मुस्लिम शासकों ने काफी हद तक हिंदुओं की सामाजिक संरचना में कोई बदलाव लाने की कोशिश नहीं की। इसलिए अंग्रेजों के आने से पहले तक हिन्दू सामाजिक संरचना वैसी ही बनी रही, जैसी पिछले एक हजार साल से चली आ रही थी। भक्ति आंदोलन ने कुछ बदलाव लाने की कोशिश की, लेकिन यह बदलाव धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र तक ही सीमित रहा। सच्चाई यह है कि इस वर्ण व्यवस्था ने विभाजन की प्रक्रिया को और विकराल, तीक्ष्ण और गहरा किया। हर वर्ण जातियों और उपजातियों में विभाजित होता गया और उनमें भी कई स्तरों पर श्रेणीबद्धता बनती गई। शरतचंद्र के प्रख्यात उपन्यास ‘देवदास’ के देवदास की पार्वती उर्फ पारो के साथ शादी इसलिए नहीं हो सकी, क्योंकि देवदास का परिवार उच्चकुलीन ब्राह्मण था, जबकि पारो का परिवार था तो ब्राह्मण, लेकिन देवदास के परिवार की तुलना में निम्नकुलीन ब्राह्मण था। कन्नड लेखक यू आर आनंतमूर्ति के उपन्यास ‘संस्कार’ का कथानक ही ऐसे ब्राह्मण समुदायों से संबंधित था, जिनमें ऊंच-नीच का इतना अधिक भेदभाव था कि कुछ ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मणों का छुआ नहीं खाते थे और उनके साथ वैवाहिक संबंध भी नहीं बनाते थे। यहाँ तक कि यह श्रेणीबद्धता पिछड़ी और दलित जातियों में भी देखी जा सकती है।

हिन्दी के दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ के निम्नलिखित प्रसंग को इस दृष्टि से देखा जाना चाहिए कि किस तरह जाति का लेबल भारतीय समाज का ऐसा भयानक सच है, जो हर तरह के मानव व्यवहार के बीच चट्टान बनकर खड़ा दिखाई देता है :

“जैसे-तैसे खाना खाकर हम लोग बाहर आ गए थे। भिक्खूराम बुजुर्ग के एकदम पासवाली चारपाई पर बैठ गया था। मैं थोड़ा फासले से खड़ा था। इस बीच एक और व्यक्ति वहाँ आ गया था । बुजुर्ग ने हुक्के की नाली उसकी ओर बढ़ा दी। हुक्के की नाली से धुआँ खींचते हुए उस व्यक्ति ने हम दोनों के विषय में बुजुर्ग से पूछताछ की शुरुआत कर दी। बारला से आए हैं, सुनते ही उसने सवाल दागा था, ‘कोण जात है?’ उसके सवाल का उत्तर दिया मैंने, ‘चूहड़ा जात हैं’। उन दोनों के मुंह से एक साथ निकला ‘चूहड़ा?’ बुजुर्ग ने चारपाई के नीचे पड़ी लाठी उठाकर तड़ से मार दी थी, भिक्खूराम की पीठ पर। हाथ तगड़ा था। भिक्खूराम बिलबिला गया था। बुजुर्ग के मुंह से अश्लील गालियों की बौछार होने लगी थी। आँखें भयानक लग रही थी। दुबले-पतले शरीर में शैतान उतर आया था। उनके बर्तन में आदर के साथ बैठकर खाना खाने, चारपाई पर बैठने का दुस्साहस किया था, जो उनकी नजर में अपराध था। मैं सहमा हुआ चबूतरे के नीचे खड़ा था। बुजुर्ग चिल्ला रहा था, जिसे सुनकर भीड़ जमा हो गई थी। कई लोगों की राय थी रस्सी से बांधकर दोनों को पेड़ पर लटका दो।”

आम भारतीय नागरिक विशेष रूप से हिन्दू, धर्म और जाति के चंगुल में काफी गहरे तक धंसा हुआ है। जन्म से लेकर मरण तक उसकी पारिवारिक और सामाजिक परम्पराएं और रीति-रिवाज इन्हीं दो पहचानों से निर्धारित होती हैं। जहां तक वर्ण और जाति का सवाल है, वहाँ एक स्पष्ट श्रेणीबद्धता दिखाई देती है। पहले पूरे हिन्दू समाज को वर्णों में बांटा गया है और बाद में हर वर्ण को विभिन्न जातियों में। जैसे वर्णों में श्रेणीबद्धता है, वैसी ही श्रेणीबद्धता एक ही वर्ण की विभिन्न जातियों में भी है। इस श्रेणीगत विभाजन पर धर्म की मोहर लगी है। मनुस्मृति में कहा गया है कि “लोकों की अभिवृद्धि के लिए ब्रह्मा ने अपने मुख, बाहु, ऊरु और पैर से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की सृष्टि की (अध्याय प्रथम, श्लोक 31)। फिर वर्ण के अनुसार कर्म का भी बंटवारा किया गया है। वेद-वेदांग पढ़ाना और पढ़ना, यज्ञ करना और कराना, दान देना और लेना यह ब्राह्मणों के लिए कर्म निर्धारित किए गए हैं। क्षत्रिय का काम प्रजा की रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना वेद-वेदांग और शस्त्र विद्या का अध्ययन करना है। वैश्य का काम पशुपालन करना, दान देना, यज्ञ करना, वेद-वेदांग अध्ययन करना, क्रय-विक्रय करना, ब्याज पर धन लगाना और खेती करना है। शूद्र का काम ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा करना है (प्रथम अध्याय, श्लोक 87-92)। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन्हें द्विजाति (दो बार जन्म लेने वाला) कहा गया है, क्योंकि वेदों के अध्ययन के लिए किए जाने वाले उपनयन से उनका दूसरा जन्म होता है, जबकि शूद्र एकजाति होता है, क्योंकि वेदों का अध्ययन न करने के कारण उसका उपनयन नहीं होता (10/4)।

मनुस्मृति में ब्राह्मण की श्रेष्ठता को कई तरह से स्थापित किया गया है। सबसे पहले तो उसकी उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से बताकर उसे सबसे ऊपर बताया गया है। फिर पृथ्वी पर जो भी धन है, उसका स्वामी उसे बताया गया है (1/100)। यह श्रेणीबद्धता यानी ऊंच-नीच का भाव इस हद तक है कि जो सबसे नीचे है, उसका काम केवल ऊपर के वर्णों की सेवा करना ही नहीं हैं, उसे कोई मानव अधिकार भी हासिल नहीं है। वह उच्च वर्णों के लिए अस्पृश्य है। उनके साथ किसी तरह का सामाजिक संबंध नहीं रखा जा सकता। उच्च वर्ण के लोग शूद्र का छुआ नहीं खा सकते। वह मंदिर आदि किसी धार्मिक स्थल में प्रवेश नहीं कर सकता। वह धनोपार्जन नहीं कर सकता। ब्राह्मणवादी ग्रंथों में एक ही तरह के अपराध के लिए अलग-अलग वर्णों के लिए अलग-अलग दंड की व्यवस्था की गई है। राजा को आदेश दिया गया है कि ब्राह्मण को सबसे कम दंड दे और शूद्र को सबसे कठोर दंड दे। यदि कोई शूद्र द्विजजाति के साथ अभिमान से बैठने की चेष्टा करे, तो उसकी कमर को गरम लोहे से दागकर उसे देश से निष्कासित कर दे (8/281)। आगे के कई श्लोकों में शूद्रों के द्वारा किए जाने वाले कथित अपराधों के लिए अंगों को कटवाने की ही व्यवस्था की गई है, जबकि इसी तरह के अपराध के लिए द्विजजाति के व्यक्ति को प्रायः आर्थिक दंड की ही व्यवस्था की गई है। यही नहीं, शूद्र के लिए दासकर्म को ही उपयुक्त बताया गया है। “खरीदे गए और न खरीदे गए शूद्र से दासकर्म करवाना चाहिए, क्योंकि ब्रह्माजी ने उसे ब्राह्मण की दासता करने के लिए ही उत्पन्न किया है। स्वामी से मुक्त किया गया शूद्र भी दासकर्म से मुक्त नहीं हो सकता, क्योंकि यह उसका स्वाभाविक धर्म है” (8/413-414)।

जिस तरह शूद्र के लिए दासत्व ही धर्म बताया गया है, स्त्री के लिए भी पराधीनता और दासत्व ही धर्म बताया गया है, चाहे वह किसी भी वर्ण की क्यों न हो। मनुस्मृति में कहा गया है कि पुरुषों को कभी अपनी स्त्रियों को स्वतंत्र नहीं होने देना चाहिए। विषयों में आसक्त स्त्रियों को सदैव अपने वश में रखना चाहिए। बचपन में स्त्री की रक्षा पिता करता है, युवावस्था में पति करता है और वृद्धावस्था में पुत्र करता है। स्त्री किसी भी अवस्था में स्वतंत्र रहने के योग्य नहीं होती (9/2-3)। किसी भी आयु की स्त्री को, चाहे वह बालिका हो या युवती या वृद्धा उसे कोई भी काम, यहाँ तक कि घर के अंदर भी अपने मन से नहीं करना चाहिए ((5/147)। स्त्री को विद्या अध्ययन और यज्ञोपवीत आदि से रोका गया है। विवाह और पति सेवा को ही पर्याप्त समझा गया है। “विवाह की विधि ही स्त्रियों का वेदाध्ययनार्थक (उपनयनस्थानापन्न) संस्कार समझा गया है, उनकी पति सेवा ही गुरुकुलवास (गुरुकुलवासस्थानापन्न) है और उनका घर का काम करना ही अग्निपरिचरण है (2/67)। मनुस्मृति स्त्री को धन रखने का अधिकार भी नहीं देता है। पत्नी, पुत्र और दास — ये तीनों ही अपने धन से रहित होते हैं, वे जो धन प्राप्त करते हैं, वह वे जिसके हैं, उसी का होता है (8/416-417)। यह भी कहा गया है कि राजा को चाहिए कि वह वैश्य और शूद्र से बलपूर्वक काम कराए, क्योंकि वे यदि अपने कार्य से विमुख हो जाते हैं, तो वे इस जगत को विक्षुब्ध कर सकते हैं (8/418) यानी वहाँ अशान्ति फैल सकती है।

शूद्र और स्त्री को पराधीन रखना इसलिए जरूरी है, ताकि उनसे शारीरिक श्रम कराया जा सके। जो श्रेष्ठ हैं, वे इसलिए श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे शारीरिक श्रम नहीं करते और जो शारीरिक श्रम करता है, वह तभी उसे करेगा, जब उसे अन्य कामों को करने से रोका जाएगा। विद्याध्ययन से रोका जाना इसीलिए जरूरी है, ताकि उनसे लगातार शारीरिक श्रम लिया जा सके। प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी सद्गति में दलित दुखी पंडित घासीराम के पास अपनी बेटी की शादी का मुहूर्त निकलवाने जाता है और पंडित उसे लकड़ी फाड़ने की बेगार में लगा देता है और उस लकड़ी को फाड़ते हुए ही उसकी मौत हो जाती है। कहानी बताती है कि ब्राह्मण को लेकर उसके मन में किस तरह का भय है। वह ब्राह्मणों द्वारा शुभ और अशुभ मुहूर्त के अंधविश्वास में फंसे होने के कारण ही पंडित के पास जाता है और पंडित के आदेश का पालन न करने पर उसकी अवहेलना के दुष्परिणाम से भयभीत होकर वह बेगार करने के लिए तैयार हो जाता है। दरअसल, मनुस्मृति जैसे ग्रंथ, जिनमें कही गयी बातों को ईश्वरीय आदेश कहा गया है, वास्तव में ब्राह्मणों द्वारा अपने ही पक्ष में रचे गए हैं, ताकि लोगों को ईश्वर और धर्म का भय दिखाकर एक ऐसी व्यवस्था कायम की जा सके, जो पूरी तरह उनके अधीन हो और प्रत्येक वर्ग उनकी इच्छा के अनुसार काम कर सके। ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था ने जिस मानसिक गुलामी को पैदा किया है, उसकी जकड़न को आज भी चारों ओर महसूस किया जाता है। और अब तो पिछले एक दशक से ज्यादा समय से एक ऐसी पार्टी सत्ता में है, जिसके लिए मनुस्मृति हमेशा से आदर्श रही है। आरएसएस-भाजपा के सत्ता में रहने का ही परिणाम है कि दलितों पर अत्याचार बढ़ा है। आरक्षण की व्यवस्था को काफी हद तक कमजोर किया जा चुका है और अब मनरेगा को समाप्त कर गरीबों (जिनमें सबसे ज्यादा दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक ही हैं) को और अधिक गरीब और लाचार बनाये रखने की और कदम बढ़ा दिए गए हैं। इस दक्षिणपंथी और सांप्रदायिक सत्ता के कारण ही ब्राह्मणवादियों के हौसले इतने बुलंद है कि वे अपने फैसले में बेझिझक मनुस्मृति को उद्धृत करते हैं।

आज जब संविधान दलितों को समानता का अधिकार देता है और शिक्षा और रोजगार में आरक्षण द्वारा अपनी स्थिति में सुधार कर सके, तो सवर्ण जातियों का एक बाद हिस्सा आरक्षण का इसलिए भी विरोध करता है कि अगर दलित बराबरी पर आ गए, तो मेहनत-मजदूरी का काम कौन करेगा? 2014 में शिक्षित सवर्णों के बीच नरेंद्र मोदी के पक्ष में एक प्रचार यह भी था कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो देर-सबेर वे आरक्षण को जरूर खत्म कर देंगे, जैसा हम कि नजर भी आ रहा है। इस तरह ‘शूद्रों’ के लिए जो व्यवस्था मनुस्मृति में की गई है यानी द्विज जातियों की सेवा करने का वह व्यवस्था दुबारा कायम कर जगत में व्याप्त “विक्षुब्धता” को खत्म किया जा सकेगा। गोलवलकर का मानना था कि सामाजिक तनाव जातिवाद के कारण नहीं, बल्कि जातिवाद विरोधी अभियान ही वह जहर है, जिसने राजनीतिक व्यवस्था को जहरीला बना दिया है।

मनुस्मृति में जो लिखा गया है, वह केवल जातिवाद नहीं है, दरअसल यह ब्राह्मणवाद है। यहाँ विभिन्न वर्णों और जातियों में महज विभाजन ही नहीं है, उसमें अन्यों से अपने को श्रेष्ठ और दूसरों को निकृष्ट मानने की बहुत गहरी भावना है। द्विज वर्णों में श्रेणीबद्धता और द्विज वर्णों का शूद्रों से अलगाव गुणात्मक रूप से अलग है। शूद्र वर्ण नाम की सीढ़ी का सबसे निचला पायदान नहीं है, बल्कि उस सीढ़ी से अलग एक गहरा गड्ढा है, जिससे बाहर निकलने का न उपाय है और न विकल्प है। उससे मुक्ति केवल एक ही स्थिति में हो सकती है कि इस पूरी वर्ण व्यवस्था को ठुकराकर उससे किसी तरह का संबंध न रखा जाये। यह तभी संभव है, जब हिन्दू धर्म से ही नाता तोड़ लिया जाए, जैसा कि बाबा साहिब अंबेडकर ने किया था कि हम ऐसे किसी धर्म को अपना लें, जिसमें वर्ण व्यवस्था और जातिवाद न हो और जो धर्म अपने ही समुदाय के बीच किसी तरह का भेदभाव न करता हो या ईश्वर और धर्म को पूरी तरह त्यागकर नास्तिक बना जाए। यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि वर्णव्यवस्था में विश्वास हमें मनुष्य ही नहीं रहने देता। वह हमारे विवेक को छीन लेता है। हम इतने अंधे हो जाते हैं कि गाय की तो पूजा करते हैं, उसके मूत्र को पीना भी अपना धर्म समझते हैं और अपने ही भाईयों को शूद्र मानकर उनसे अपने को बहुत ऊंचा समझते हैं, उनसे दूर रहते हैं। उनका छुआ नहीं खाते और उनके साथ किसी भी तरह का बराबरी का व्यवहार करने में अपनी हेठी समझते हैं। ऐसे ग्रंथ को कोई भी विवेकवान व्यक्ति, जिसका मनुष्यता में थोड़ा भी यकीन हो, कैसे स्वीकार कर सकता है और उसको महान ग्रंथ कह सकता है। सिर्फ वही व्यक्ति ऐसा कह सकता है, जिसका खुद का यकीन वर्ण व्यवस्था और ब्रह्मणवाद में हो। आज से 98 साल पहले बाबा साहिब अंबेडकर ने 25 दिसम्बर 1927 के दिन महाड़ सत्याग्रह के दौरान एक ऐसे कार्यक्रम में हिस्सा लिया था, जहां मनुस्मृति की एक प्रति जलाई गई थी और ये आह्वान किया था कि हर साल इस दिन को ‘मनुस्मृति दहन’ के रूप में मनाया जाना चाहिए (शम्सुल इस्लाम की पुस्तक ‘गोलवलकर की हम या हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा : एक आलोचनात्मक समीक्षा’ से उद्धृत, पृष्ठ 92)। लेकिन हिन्दुत्व को अपनी विचारधारा मानने वाले आज भी मनुस्मृति के प्रति केवल श्रद्धा ही नहीं रखते, बल्कि संविधान को हटाकर मनुस्मृति को लागू करना चाहते हैं। वैसे भी संविधान को काफी हद तक नकारा बनाया जा चुका है।

आरएसएस के वैचारिक पथ प्रदर्शक और हिन्दुत्व के सिद्धांतकार विनायक दामोदर सावरकर, जो स्वयं जाति से ब्राह्मण थे, मनुस्मृति को एक महान ग्रंथ मानते थे। उन्हीं के शब्दों में, “मनुस्मृति एक पवित्र पुस्तक है, जो वेदों के बाद हिन्दू राष्ट्र में सर्वाधिक पूजनीय है और जो प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति, रीति-रिवाजों, हमारे विचारों तथा कर्मों का आधार बन गयी। सदियों से इस पुस्तक ने हमारे राष्ट्र के आध्यात्मिक और दैवीय पाठ के लिए दिशा-निर्देश निर्मित किये हैं। आज भी करोड़ों हिन्दू अपने जीवन और क्रियाकलाप में जिन नियमों का पालन करते हैं, वे मनुस्मृति पर ही आधारित हैं। आज मनुस्मृति ही हिन्दू कानून है। यह बुनियादी बात है (सावरकर समग्र खंड 4, पृष्ठ 416 पर संकलित लेख ‘मनुस्मृति में महिलायें’, शम्सुल इस्लाम की पुस्तक ‘गोलवलकर की हम या हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा : एक आलोचनात्मक समीक्षा’ से उद्धृत, पृष्ठ 92)।

26 नवंबर 1949 के दिन भारतीय संविधान को स्वीकृति दी गयी थी, उसके चार दिन बाद 30 नवंबर को आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र ऑर्गेनाइजर के संपादकीय में लिखा गया था कि “लेकिन हमारे संविधान में प्राचीन भारत के अनूठे संवैधानिक विकास का कोई जिक्र नहीं है। मनु के कानून सपरता के लिकारगस या पर्सिया के सोलन से पहले लिखे गए हैं। मनुस्मृति में कहे गए कानून आज तक दुनिया भर में प्रशंसा का भाव जगाते हैं, स्वीकार करने हेतु विवश करते हैं और लोग उस पर मोहर लगाते हैं। लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए उसका कोई अर्थ नहीं है” (शम्सुल इस्लाम की पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 91)। आरएसएस ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की कि मनुस्मृति में न्याय और दंड संबंधी व्यवस्थाओं को स्वीकार कर लिया जाए। जब 26 जनवरी 1950 को भारत लोकतान्त्रिक गणतंत्र घोषित किया गया, तब एक बार फिर उसी ऑर्गेनाइजर में शंकर सुब्बा अय्यर, जो हाई कोर्ट के सेवनिवृत न्यायाधीश थे, का एक लेख प्रकाशित किया गया। न्यायाधीश महोदय ने इस आलेख में लिखा था : “इसके बावजूद कि पिछले दिनों डॉ अंबेडकर के मुंबई में यह कहने की खबर है कि मनु के दिन लद गए, यह एक तथ्य है कि आज भी हिंदुओं का दैनिक जीवन मनुस्मृति तथा अन्य स्मृतियों के सिद्धांतों और आदेशों से प्रभावित होता है। यहाँ तक कि एक उदार हिन्दू भी कुछ मामलों में खुद को स्मृतियों में अंतर्निहित नियमों से बंधा हुआ पाता है और उनसे अपने जुड़ाव को पूरी तरह त्याग देने पर शक्तिहीन महसूस करता है” (6 फरवरी 1950 के ऑर्गनाइजेर में प्रकाशित आलेख ‘मनु रुल्स अवर हार्ट्स’, (शम्सुल इस्लाम की पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 91)। न्यायाधीश अय्यर के कथन में इतनी सच्चाई जरूर है कि “आज के हिंदुओं का दैनिक जीवन मनुस्मृति तथा अन्य स्मृतियों में अंतर्निहित नियमों से बंधा” हुआ है, लेकिन सवर्ण जो इन नियमों से बांधकर अपने को शक्तिवान समझता है और दलितों और स्त्रियों का उत्पीड़न करने की ताकत हासिल करता है, लेकिन मनुस्मृति के नियम-कायदों को त्याग देने पर वह अपने को “शक्तिहीन महसूस करता है”। स्पष्ट है कि न्यायाधीश की कलम से जो सच्चाई निकली है, वह यह है कि मनुस्मृति की जगह संविधान के लागू होने से सवर्ण और अवर्ण में कोई फरक नहीं होगा। मनुस्मृति ने जो अत्याचार करने के विशेषाधिकार दिए हैं, वे खत्म हो जाएंगे और वे संविधान के अन्य प्रावधानों के समक्ष बराबर होंगे, यही उनका दुख है और इसीलिए वे मनुस्मृति को भूल नहीं पाते और बार-बार उसकी कथित महानता को याद करते रहते हैं। मनुस्मृति बुनियादी तौर पर समानता विरोधी ग्रंथ है। यह महज शब्दों का खेल नहीं है कि आरएसएस हमेशा समानता की नहीं, बल्कि समरसता की बात करता है यानी समानता की जगह समरसता का अर्थ है, जो इस वर्णव्यवस्था में जिस पायदान पर है और जिसे जो काम सौंपा गया है, उसे करते हुए प्रसन्न रहे और समाज में शांति बनाए रखे, क्योंकि यह व्यवस्था मनुष्य द्वारा निर्मित नहीं है, बल्कि दैवीय है और हम इस दैवीय विधान से बंधे हुए हैं। ईश्वर का डर दिखाकर एक बर्बर, क्रूर और हिंसक व्यवस्था को कैसे स्वीकार किया जा सकता है और ऐसी व्यवस्था के समर्थक ग्रंथ और उसका समर्थन करने वाले संगठन और लोग एक लोकतान्त्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समतावादी देश में कैसे स्वीकार्य हो सकते हैं।

भारत का संविधान जिन मूल्यों पर आधारित है, वह हर दृष्टि से मनुस्मृति के नकार पर आधारित है। भारतीय संविधान अपने नागरिकों को अपने-अपने धर्म मानने की स्वतंत्रता तो देता है, लेकिन धर्म के नाम पर मनुस्मृति में कही गई बातों को पालन करने की स्वतंत्रता नहीं देता, क्योंकि संविधान की बुनियाद जिन मानव मूल्यों पर टिकी है, उसका सीधा टकराव मनुस्मृति से है। मनुस्मृति को ठुकराकर ही संविधान में आस्था रखी जा सकती है। हमारा संविधान मनुस्मृति के कथित राजधर्म और दंड व्यवस्था के विपरीत मूल्यों पर आधारित है, उस मनुस्मृति को अदालतें समय-समय पर उद्धृत करती रहती है। जब संविधान को लागू किया जा रहा था, तब भारत में ऐसी राजनीतिक ताकतें थीं, जो मनुस्मृति को लागू करने की हिमायत कर रहे थे। यही नहीं, जयपुर के उच्च न्यायालय के प्रांगण में मनु की मूर्ति स्थापित की हुई है, जिसको हटाने की कई बार मांग की जा चुकी है, लेकिन किसी सरकार में यह साहस नहीं है कि मनु की मूर्ति को वहाँ से हटा सके।

जिस संविधान के अंतर्गत भारत धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणतंत्र बना, उसमें सर्वोच्च सत्ता स्वयं भारत की जनता थी, जिसने अपने को यह संविधान प्रदान किया था। संविधान की नज़र में प्रत्येक भारतीय नागरिक चाहे उसका धर्म, उसकी जाति, उसकी नस्ल, उसकी भाषा कुछ भी क्यों न हो, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष या वह हिंदुस्तान के किसी भी इलाके का रहने वाला क्यों न हो, सब बराबर हैं और सबको समान अधिकार हासिल हैं। स्वतंत्रता, समानता और पारस्परिक भाईचारे के सिद्धांत पर इस लोकतांत्रिक गणतंत्र की नींव रखी गयी थी, जिसकी सबसे बड़ी पहचान धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावादी संस्कृति थी। स्पष्ट है कि भारतीय संविधान उन आधुनिक मानव-मूल्यों पर आधारित है, जिसकी शुरुआत फ्रांसीसी क्रांति (1789-1799) से हुई थी। इस क्रांति ने राजतन्त्र को खत्म कर गणतंत्र की स्थापना की और स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों को जन्म दिया। संविधान पर फ्रांसीसी क्रांति से लेकर सोवियत संघ की बोलशेविक क्रांति के असर को देखा जा सकता है। एक मध्ययुगीन ग्रंथ, जो संविधान के मूल्यों के विपरीत हैं, वह हमारा आदर्श नहीं हो सकता। लेकिन आरएसएस-भाजपा के लिए वह आदर्श है, जो इस संप्रभुता सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणतंत्र को हिन्दू राष्ट्र में बदलना चाहता है और यह तभी संभव है, जब हमारे संविधान को हटाकर मनुस्मृति को लागू करे। बाबा साहब अंबेडकर ने भविष्य के इस खतरे को भांप लिया था, जो आज हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। इसीलिए उन्होंने लिखा था, “यदि हिन्दू राज एक दिन वास्तविकता बनता है तो निस्संदेह वह इस देश के लिए बहुत बड़ी आपदा होगी। किसी भी कीमत पर हिन्दू राज को बनने से रोका जाना चाहिए” (पाकिस्तान या भारत का विभाजन, 1946, 354-55)।

*(लेखक इंदिरा गांधी खुला विश्वविद्यालय, दिल्ली के सेवानिवृत्त प्राध्यापक हैं। जनवादी लेखक संघ के तय

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