केंद्रीय बजट को घोर किसान विरोधी बजट बताया – किसान सभा
केंद्रीय बजट को घोर किसान विरोधी बजट बताया – किसान सभा

जे टी न्यूज, झारखंड: केंद्रीय बजट 2026–27*
केंद्रीय बजट में कृषि को कोई जगह नहीं दी गई*
किसानों की आय बढ़ाने की बात मात्र झूठा प्रचार*
कर्ज़ माफी के लिए कोई प्रस्ताव नहीं, उर्वरक सब्सिडी में 15,679 करोड़ रुपये की कटौती*

किसान सभा का आह्वान—3 फ़रवरी को देशभर में किसान-विरोधी, संघवाद-विरोधी बजट की प्रतियाँ जलाई जाए*
केंद्रीय बजट 2026–27 भारतीय जनता की आजीविका के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र—कृषि के रणनीतिक पुनरुधार के प्रति किसी भी प्रकार की प्रतिबद्धता दिखाने में एक बार फिर विफल रहा है। वित्त मंत्री के बजट भाषण में कृषि को ज्यादातर नज़र अंदाज़ किया गया; छोटे और सीमांत किसानों का केवल एक बार उल्लेख हुआ, जबकि ग्रामीण मजदूरों का उल्लेख पूरी तरह गायब रहा। बजटीय आँकड़े भी इसी उपेक्षा को दर्शाते हैं।
इस सप्ताह केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, 2025 में कृषि की औसत विकास दर में गिरावट आई है। पिछली तिमाही में दर्ज विकास दर 3.5 प्रतिशत रही, जबकि दशक का औसत 4.45 प्रतिशत था। फसल उत्पादन में सबसे तीव्र गिरावट देखी गई है। कृषि क्षेत्र में इस ठहराव की पृष्ठभूमि में यह अपेक्षित था कि केंद्रीय बजट 2026–27 कुछ राहत और गति प्रदान करेगा। परन्तु बजट ने एक बार फिर निराश किया है।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के लिए लगभग 1.40 लाख करोड़ रुपये का कुल आवंटन, संशोधित अनुमान 2025–26 की तुलना में महज़ 5.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। मुद्रास्फीति को ध्यान में रखने पर यह स्पष्ट है कि कृषि के लिए वास्तविक आवंटन में कोई ठोस वृद्धि नहीं हुई है।
आर्थिक सर्वेक्षण ने यह भी स्वीकार किया है कि अनाज, मक्का, सोयाबीन और दलहन सहित विभिन्न फसलों की उत्पादकता दरें वैश्विक औसत से पीछे रही हैं, जिससे भारतीय उत्पादन अलाभकारी बनता जा रहा है। इसके बावजूद, कृषि अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देने हेतु बजट में कोई अतिरिक्त कदम नहीं उठाया गया है। वित्त मंत्री द्वारा कृषि उत्पादकता बढ़ाने को कर्तव्य बताने के बावजूद, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग का बजटीय आवंटन 10,281 करोड़ रुपये (संशोधित अनुमान 2025–26) से घटाकर 9,967 करोड़ रुपये (बजट अनुमान 2026–27) कर दिया गया है।
नकदी फसलों में निवेश की बयानबाज़ी इस वर्ष के बजट में भी जारी रही। भाषण में नारियल, कोको, काजू, मेवे और चंदन पर ध्यान देने की बात कही गई। किंतु वास्तविकता यह है कि पहले शुरू की गई कपास प्रौद्योगिकी मिशन, दलहन मिशन, हाइब्रिड बीज और मखाना बोर्ड जैसी योजनाओं का बजटीय आँकड़ों में कोई उल्लेख नहीं मिलता।
किसानों को राहत देने की बात करें तो बजट में कोई उल्लेखनीय प्रस्ताव नहीं है। उर्वरक सब्सिडी को 1,86,460 करोड़ रुपये (संशोधित अनुमान 2025–26) से घटाकर 1,70,781 करोड़ रुपये (बजट अनुमान 2026–27) कर दिया गया है। खाद्य सब्सिडी में भी पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान की तुलना में कटौती की गई है।
बजट भाषण में न तो मनरेगा योजना का और न ही हाल ही में पारित वीबी-ग्राम जी योजना का कोई उल्लेख किया गया, जो ग्रामीण रोजगार के महत्व को पूरी तरह खारिज किए जाने का संकेत है।
वीबी-ग्राम जी योजना के लिए 95,692 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है, यह आवंटन केंद्र के 60 प्रतिशत अंशदान के तहत है, जिसमें 40 प्रतिशत अंशदान के रूप में राज्यों पर 63,794 करोड़ रूपये का भारी बोझ डाल दिया गया है।*
वीबी-ग्राम जी के तहत केंद्र का 60 प्रतिशत हिस्सा 57,415 करोड़ रुपये बनता है, जो संशोधित अनुमान 2025–26 के तहत मनरेगा के लिए आवंटित 88,000 करोड़ रुपये से कहीं कम है। इसका अर्थ यह है कि नई योजना को पूर्व स्तर पर संचालित करने के लिए राज्यों को 38,277 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ उठाना होगा!
आर्थिक समीक्षा 2025–26 के अनुसार, अधिशेष वाले राज्यों की संख्या 2018–19 में 19 से घटकर 2023–24 में 11 रह गई है। राज्य विभाज्य कोष में 50 प्रतिशत हिस्सेदारी की माँग कर रहे हैं, किंतु 16वें वित्त आयोग ने केवल 41 प्रतिशत का प्रस्ताव किया है। वित्तीय स्वायत्तता के अभाव में राज्य सरकारें रोजगार गारंटी योजना को समर्थन देने हेतु पर्याप्त संसाधन नहीं जुटा पाएँगी, और वीबी-ग्राम जी अधिनियम के तहत इस वर्ष ग्रामीण लोगों को मनरेगा के औसत 47 दिनों का रोजगार भी उपलब्ध नहीं हो पाएगा। यह ग्रामीण मजदूरों और किसानों पर बड़ा हमला है तथा संघीय अधिकारों का उल्लंघन भी है। किसान इसे कतई बर्दाश्त नहीं करेगे।
ग्रामीण रोजगार से संबंधित एकमात्र प्रमुख घोषणा महात्मा गांधी ग्राम स्वराज योजना की रही, जो ग्राम उद्योगों को बढ़ावा देने की बात करती है; किंतु इसके लिए कोई ठोस वित्तीय आवंटन नहीं किया गया।
कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में एकमात्र उल्लेखनीय बजटीय वृद्धि पशुपालन एवं डेयरी के अंतर्गत की गई है जहां 2025-26 के संशोधित अनुमान 5,303 करोड़ रुपये को बढ़ाकर 6,135 करोड़ रुपये (बजट अनुमान 2026–27) कर दिया गया है। परंतु इसमें भी ज़ोर निजी क्षेत्र में प्रजनन, ऋण-आधारित पशु चिकित्सालयों के विस्तार और विदेशी निवेश आकर्षित करने पर ही है।
झारखंड राज्य किसान सभा ने किसानों, ग्रामीण मजदूरों और आम जनता से आह्वान करती है कि वे 3 फ़रवरी 2026 को या उसके बाद किसी भी दिन गाँवों और तहसीलों में इस किसान-विरोधी, मजदूरों-विरोधी और संघवाद-विरोधी बजट की प्रतियाँ जलाकर झारखंड में इसका विरोध करें। किसान सभा सभी से यह भी अपील करती है कि 12 फ़रवरी को होने वाली आम हड़ताल को ऐतिहासिक रूप से सफल बनाएं, ताकि जन-विरोधी केंद्रीय बजट 2026–27 के विरुद्ध जनता का ग़ुस्सा स्पष्ट रूप से नज़र आए।

