मनु कौन था ? आइए हम पड़ताल करते हैं “वेद और मौर्य काल से तो पाते हैं कि

मनु कौन था ? आइए हम पड़ताल करते हैं “वेद और मौर्य काल से तो पाते हैं कि

जे टी न्यूज
ब्राह्मणिक धर्म ग्रंथो में मनु को मानव जाति का आदि पुरुष और कानून का आदर्श विधाता बताया गया है। मनु का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद (1.36.19) और (1. 114.2) में मिलता है, परंतु मनु को ऋग्वेद में कानून का दाता नहीं बताया गया है। मनु कोई ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं है, क्योंकि उसके संबंध में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते हैं। जैसे किसी राजा के शिलालेख में उनका नाम, किसी राजा के सिक्के पर आकृति या नाम, किसी प्राचीन पांडुलिपि में उनका उल्लेख, किसी विदेशी यात्रियों के यात्रा विवरण में मनु का उल्लेख आदि।
जैन और बौद्ध ग्रंथों में भी मनु का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। मनु को सर्वप्रथम कानून का विधाता मनुस्मृति प्रथम अध्याय में ही लिखा गया है। मनु को लेकर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि मनु वास्तव में मानव समाज का आदि विधाता और सर्वमान्य कानून दाता थे, तो उनका उल्लेख केवल ब्राह्मणिक परंपरा तक सीमित क्यों है?
इतिहास में कोई भी प्रभावशाली व्यक्ति चाहे वह धार्मिक हो या राजनीतिक, यदि वास्तव में वह समाज को दिशा देता है, तो उसका प्रभाव समकालीन और पार्वती सभी परंपराओं में दिखाई देता है। लेकिन मनु के संदर्भ में ऐसा दिखाई नहीं देता, ना तो बौद्ध परंपरा में, न जैन परंपरा में और नहीं किसी श्रमण साहित्य में मनु का विधाता के रूप में स्वीकार किया गया। सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण विद्वानों की यही छुपी है इस पर वे लोग कुछ नहीं बोलते हैं।


मनुस्मृति ब्राह्मण धर्म का एक धर्मशास्त्रीय ग्रंथ है। इस ग्रंथ में वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था का उल्लेख है। मनुस्मृति महिलाओं को स्वतंत्र और शिक्षित रूप में स्वीकार नहीं करती है। यह महिलाओं को पुरुषों के अधीन रहने की बात करती है वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण सर्वोच्च, क्षत्रिय शासन और युद्ध का अधिकार लेकर लेकिन ब्राह्मण से नीचे, वैश्य व्यापार और कृषि का कार्य हेतु और शूद्र केवल सेवा हेतु मनुस्मृति में बताया गया है, शूद्रों के लिए कठोर दंड की बात कही गई है। मनुस्मृति वर्ण व्यवस्था को कर्म के आधार पर नहीं, बल्कि जन्म के आधार पर स्वीकार करती है । मनुस्मृति की रचना मनु के द्वारा नहीं की गई थी, बल्कि मनु के नाम पर ब्राह्मणिक परंपरा के विद्वानों द्वारा की गई थी। और इस तरह मनुस्मृति भारतीय समाज को बांटने वाला पहला लिखित ग्रंथ बना ।
भारतीय इतिहास में पढ़ाया जाता है कि मनुस्मृति की रचना दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर तीसरी शादी ईस्वी के मध्य की रचना माना है । लेकिन मनुस्मृति की सबसे पुरानी पांडुलिपि 8वीं- 9वीं सदी के मध्य की है । उससे उससे पहले की मनुस्मृति से संबंधित कोई पांडुलिपि मौजूद ही नहीं है । प्रसिद्ध चीनी यात्री फाहियान, ह्वेगसांग और इत्सिंग के अपने भारत यात्रा विवरणों में कहीं पर भी मनु और उसकी मनुस्मृति का कोई उल्लेख नहीं किया गया है । यदि मनुस्मृति वास्तव में ईसा पूर्व की रचना होती तो मौर्य काल जैसे ऐतिहासिक युग में उसका प्रभाव आवश्य दिखाई देता । अशोक के शिलालेख में विस्तृत नैतिक, सामाजिक और प्रशासनिक नियम मिलते हैं । लेकिन कहीं भी मनु या मनुस्मृति की नाम नहीं मिलता है । मेगास्थनीज के अनुसार मौर्य समाज में वर्ण व्यवस्था भी प्रचलित नहीं थी । 8वीं – 9वीं शताब्दी की पांडुलिपि भंडारक ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट पुणे में रखी है।


यह पांडुलिपि अलग-अलग क्षेत्रों से प्राप्त हुई थी जैसे — कश्मीर , दक्षिण भारत , बंगाल और नेपाल से । सभी क्षेत्रों से प्राप्त पांडुलिपियां अलग-अलग है। यह पांडुलिपियों तारपत्र पर शारदा लिपि (कश्मीर से प्राप्त पांडुलिपियां) , ग्रंथ लिपि (दक्षिण भारत से प्राप्त पांडुलिपियां) , बांकी पांडुलिपियां प्रारंभिक नागरी लिपि में लिखी गई है । इन सभी पांडुलिपियों की भाषा संस्कृत है ।
पांडुलिपियों में जिस संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है वह अस्थिर और पूर्ण व्याकरण से युक्त संस्कृत नहीं है ।वर्तमान समय में जो क्लासिकल संस्कृत प्रचलित है उससे पूर्व का रूप है । इस संस्कृत में मनुस्मृति की यह पांडुलिपियां लिखी है। इनका समय आठवीं – नौवीं सदी बताया जाता है ।लेकिन यह पांडुलिपि 11वीं – 12वीं सदी के मध्य की है । क्योंकि यह अपूर्ण संस्कृत भाषा है । इसके बाद क्लासिकल संस्कृत भाषा आई है ।
क्लासिकल संस्कृत स्थिर मानकीकृत पूर्ण व्याकरण वाली भाषा है जैसी आज पढ़ाई जाती है । यह टीकाओं से बंधी है और संपूर्ण भारत में लगभग एक जैसी है । इतिहास में ऐसी संस्कृत भाषा 12वीं सदी के बाद ही दिखती है । जब देश में नागरी लिपि आती है, तब क्लासिकल संस्कृत का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है । इन्हीं पांडुलिपि को मिलाकर 19वीं सदी में मनुस्मृति की रचना की गई, जो वर्तमान समय में प्रचलित है ।
इसलिए जो लोग मानते हैं की मनुस्मृति की रचना ईस्वी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर तीसरी सदी के मध्य में हुई थी, उसका दावा झूठा है । संकलन कर्ता राम सुदिष्ट यादव समाजवादी विचारक मधुबनी बिहार।

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