राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव माने जाते भारतीय राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी और जन जन (जनता) के नेता

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव माने जाते भारतीय राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी और जन जन (जनता) के नेता


जे टी न्यूज़
पटना : भारतीय राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी माने जाने वाले लालू प्रसाद बिहार की पहचान बन चुके हैं। लालू प्रसाद यादव सन 1990 से 1997 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे जबकि यूपीए सरकार में 2004 से 2009 तक रेलमंत्री का पद संभाला था। जब लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री थे तब अपने हेलीकॉप्टर को किसी भी मैदान और खेत में उतार देते थे। महिला और बच्चें दौड़कर लिपट जाते थे। वह कभी भी असुरक्षित महसूस नहीं किये क्योंकि वह जनता के नेता थे। लालू प्रसाद यादव जब बोलते हैं तब उनके बयान पर अक्सर विवाद शुरू हो जाता है। नरेंद्र मोदी 2014 में जब प्रधानमंत्री बने थे, तब न्यूज चैनल एबीपी के एक कार्यक्रम में लालू यादव ने कहा था कि नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि दुनियाभर के हिंदू यहा आ जाएं, लेकिन यह विकास नहीं विनाश की बात होगी।

राजद नेता ने कहा कि हम जो कर रहे हैं, उससे हम अगली पीढ़ी को क्या देने जा रहे हैं। कहा कि नफरत की राजनीति करने वालों को जनता माफ नहीं करती है। कहा कि जनता से जुड़े लोग ही जनता की बात सही ढंग से समझते हैं। बोले, “हमने रिक्शा चलाया है, हमने पटना के वेटरीनरी कालेज में चाय और बिस्किट बेची है। हमने गाय चराया, भैंस चराया, बकरी-भेंड़ चराई।उन्होंने कहा कि मैं राजनीतिशास्त्री का विद्यार्थी रहा हूं, इसलिए आगे क्या होगा, वह जानता हूं। सांप्रदायिकता का हम विरोध करते रहेंगे। जो लोग एजेंडा चलाएंगे, उनका हम विरोध करते रहेंगे।बिहार लालू यादव से पहले भी देश का सबसे बीमार, गरीब और अशिक्षित राज्य था. लालू प्रसाद का शासन खत्म होने के लगभग 16 साल बाद भी बिहार सबसे बीमार, गरीब और अशिक्षित राज्य है. इसलिए यह सवाल गैरवाजिब है कि लालू प्रसाद ने बिहार को यूरोप क्यों नहीं बना दिय।

लालू यादव को लेकर ये सवाल राजनीति में हमेशा पूछा जाता है कि ये शख्स इतने लंबे समय तक राजनीति में प्रासंगिक कैसे बना हुआ है. लालू यादव ने कुछ तो ऐसा किया, जिसकी वजह से वह बिहार और भारत की राजनीति में खत्म नहीं हो रहे हैं. वैसे तो, जमाना उनके खिलाफ है. लगभग हर कोई उनका विरोधी है और उनके अंत की कामना करता है. मीडिया उनके खिलाफ है. नौकरशारी उनके खिलाफ है. जांच एजेंसियां उनके खिलाफ हैं. न्यायालय उनको लेकर रहम नहीं बरतता. कांग्रेस ने उन्हें एक समय निपटाने की खूब कोशिश की.लेकिन कोई तो बात है कि ये आदमी खत्म ही नहीं होता. उनकी राजनीतिक मौत की सारी भविष्यवाणियां गलत साबित हो चुकी है. उनकी पार्टी असंख्य बार टूट चुकी है. कभी नीतीश कुमार निकल गए तो कभी शरद यादव, तो कभी पप्पू यादव तो कभी रामकृपाल. लेकिन लालू हैं कि बने हुए हैं.आज भी लालू यादव की पार्टी बिहार विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी है. 243 में से 81 विधायक आरजेडी के जीते हैं. तो फिर वही सवाल. लालू यादव ने आखिर बिहार की जनता को ऐसा क्या दिया कि जनता बार-बार अपने वोट उनको दे आती है?लालू यादव के सत्ता में न होने से वह सामाजिक समूह खुद को अकेला और अनाथ महसूस करता है इसलिए वो हर बार लालू यादव को वोट डालता है. इसी तरह का एहसास मुसलमानों में भी है।

लालू यादव के शासन में पूरा प्रशासन बेशक बहुत असरदार न हो, लेकिन वो इतना असरदार तो था ही कि दंगाइयों को काबू में रखे.बिहार में दलितों और पिछड़ी जातियों का एक बड़ा हिस्सा और अल्पसंख्यक जब तक लालू प्रसाद के साथ हैं, तब तक लालू प्रसाद की राजनीति खत्म कैसे हो सकती है? इसलिए लालू यादव बने हुए हैं. तमाम बीमारियों और जेल में रहने के बावजूद उन्होंने बिहार के वंचितों को स्वर्ग तो नहीं दिया, लेकिन स्वर ज़रूर दिया. ये कोई मामूली बात नहीं है।

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