गोगरी के डूबते गाँव: जब हर साल बाढ़ बन जाती है किस्मत
गोगरी के डूबते गाँव: जब हर साल बाढ़ बन जाती है किस्मत
जे टी न्यूज, खगड़िया(गीता कुमार): गोगरी ब्लॉक का नाम सुनते ही इस वक्त सिर्फ़ एक तस्वीर सामने आती है — पानी में डूबे खेत, बहती सड़कें और बेबस लोग। गंगा और गंडक की लहरों ने इस बार भी गोगरी के ग्रामीण इलाक़ों को अपनी चपेट में ले लिया है। बोर्ना, रामपुर, भूरिया, हरिपुर, सोनवरसा और दर्जनों गाँव पूरी तरह जलमग्न हैं।
फसल, जिस पर किसानों ने पूरे साल का पसीना बहाया, अब पानी में सड़ रही है। मवेशियों के लिए चारा नहीं, घरों में राशन नहीं, पीने के लिए साफ़ पानी नहीं। जो सड़कें गाँवों को बाज़ार और अस्पताल से जोड़ती थीं, वे टूटी और बह चुकी हैं। रामापुर से भूरिया की सड़क का बहना बीस हज़ार लोगों के लिए जीवनरेखा टूटने जैसा है। अब लोग मिट्टी के अस्थायी रास्तों पर चलकर जान जोखिम में डालते हैं, क्योंकि सरकारी नावें और पुलिया सिर्फ़ कागज़ पर मौजूद हैं।
यह बाढ़ सिर्फ़ ज़मीन नहीं, ज़िंदगियाँ भी निगल रही है। हरिपुर के 60 वर्षीय पशुपालक खो खो यादव गंगा की सहायक धारा में बह गए। गोगरी में ही तटबंध किनारे खेल रही एक मासूम बच्ची पानी में डूब गई — उसकी हँसी अब सिर्फ़ स्मृति बनकर रह गई। हर लहर यहाँ एक जान ले सकती है, और इस बार भी वही हुआ।
गोगरी के ग्रामीणों के लिए बाढ़ अब प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि हर साल की नियति बन चुकी है। हर बार वही वादे — मजबूत तटबंध, समय पर चेतावनी, राहत शिविर और नावें। लेकिन सच्चाई यह है कि बाढ़ आने पर सबसे पहले ग्रामीण खुद अपने लिए तिरपाल और लकड़ी के सहारे घर बनाते हैं, खुद ही सुरक्षित जगह तक पहुँचने की कोशिश करते हैं, और राहत ट्रक का इंतज़ार करते-करते हिम्मत हार जाते हैं।
अगर सरकार स्मार्ट सिटी के लिए करोड़ों का बजट दे सकती है, तो गोगरी ब्लॉक के तटबंधों को पक्का करने, जल निकासी की योजना बनाने और बाढ़ के समय तेज़ी से राहत पहुँचाने के लिए क्यों नहीं? अगर शहरों में सीसीटीवी से ट्रैफ़िक मॉनिटर हो सकता है, तो गाँवों में बाढ़ का रियल टाइम अलर्ट क्यों नहीं?
कुछ हफ़्तों में पानी उतर जाएगा, लेकिन गोगरी ब्लॉक के गाँवों का दर्द फिर अगले साल लौट आएगा। शायद और ज़्यादा गहरा, और ज़्यादा खामोश।
गोगरी के ये गाँव इंतज़ार कर रहे हैं — मदद का, बदलाव का, और उस दिन का जब बाढ़ उनकी किस्मत नहीं, अतीत बनेगी


