गोड़ ( पैर ) दबाने से भारत रत्न तक: जननायक कर्पूरी ठाकुर की विरासत

गोड़ ( पैर ) दबाने से भारत रत्न तक: जननायक कर्पूरी ठाकुर की विरासत

जे टी न्यूज, समस्तीपुर: बिहार के समस्तीपुर जिले का एक बेहद पिछड़ा गांव पितौंझिया (अब कर्पूरी ग्राम)। सामाजिक गैर-बराबरी, जातिगत वर्चस्व और गरीबी से घिरा हुआ इलाका। इसी गांव में नाई का काम करने वाले गोकुल नाई अपने बेटे को मेहनत , मजदूरी कर मैट्रिक की परीक्षा पास करवा पाते हैं। यह घटना केवल एक परिवार की सफलता नहीं थी, बल्कि उस पूरे क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक थी, जहां शिक्षा को अधिकार नहीं, बल्कि ऊँची जातियों की बपौती समझा जाता था।
आगे की पढ़ाई की उम्मीद लेकर गोकुल नाई अपने बेटे को गांव के एक सामंत के पास ले जाते हैं। सामंत चारपाई पर लेटा हुआ है। जब लड़का बताता है कि उसने मैट्रिक पास कर ली है, तो जवाब मिलता है—“अच्छा, तो आओ गोड़ दबाओ।” यह दृश्य उस सामाजिक व्यवस्था का निचोड़ है, जिसमें शिक्षा भी सम्मान नहीं दिला पाती, अगर जाति “नीची” हो।
वही लड़का आगे चलकर बिहार का मुख्यमंत्री बना। उसका नाम था—कर्पूरी ठाकुर।
कर्पूरी ठाकुर ने शिक्षा, अपमान और संघर्ष के बीच हासिल की थी। शायद यही कारण था कि मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने फैसला लिया कि बिहार में प्राथमिक शिक्षा पूरी तरह निःशुल्क होगी। पढ़ने के लिए अब किसी बच्चे को एक भी रुपया खर्च नहीं करना पड़ेगा। यह निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं था, बल्कि सदियों की सामाजिक अन्यायपूर्ण संरचना पर सीधा प्रहार था।
कर्पूरी ठाकुर दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन उनके जीवन में सत्ता कभी वैभव नहीं बनी। वे मुख्यमंत्री रहते हुए भी फटा कुर्ता और साधारण चप्पल पहनते रहे। उनके पास न अपना घर था, न संपत्ति, न बैंक बैलेंस। राजनीति उनके लिए सत्ता नहीं, सेवा थी।


कर्पूरी ठाकुर जब सामाजिक न्याय की नीतियाँ लागू कर रहे थे, तब उन्हें अभूतपूर्व विरोध और अपमान झेलना पड़ा। पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने के लिए उन्होंने मुंगेरीलाल आयोग का गठन किया। इसी से आगे चलकर चर्चित ‘कर्पूरी फ़ॉर्मूला’ सामने आया, जिसमें पिछड़ों के भीतर भी अत्यंत पिछड़ों और गरीब सवर्णों के लिए व्यवस्था की गई।
लेकिन इसके बदले उन्हें गालियाँ मिलीं—
“आरक्षण कहां से आई?”
“कपूरिया की मां बियाई?”
यह अपमान केवल व्यक्ति का नहीं था, बल्कि उस सामाजिक वर्ग का था, जिसकी आवाज़ कर्पूरी ठाकुर बने थे। उन्होंने कभी इन गालियों का जवाब शब्दों से नहीं दिया, बल्कि नीतियों और निर्णयों से दिया।
कर्पूरी ठाकुर की सादगी के अनेक किस्से हैं। जब उनके समर्थकों ने उनके लिए घर बनवाने के लिए पैसे इकट्ठा किए, तो वे उन पैसों से घर नहीं, एक स्कूल बनवा देते हैं। उनका मानना था कि पीढ़ियों का भविष्य घर से नहीं, स्कूल और किताब से बदलेगा।
1977 में जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन समारोह में कर्पूरी ठाकुर फटा कुर्ता और टूटी चप्पल पहनकर पहुंचे। कुछ नेताओं ने उनका मज़ाक उड़ाया।
तब चंद्रशेखर जी ने मज़ाक को गंभीरता में बदलते हुए “कुर्ता फंड” शुरू कर दिया।
जब पैसे कर्पूरी ठाकुर को दिए गए, तो उन्होंने मुस्कराकर कहा—


“यह पैसा मुख्यमंत्री राहत कोष में जाएगा, ताकि किसी गरीब के बदन पर कपड़ा आ सके।”
एक प्रसंग में जब उनके बेटे के इलाज के लिए सरकारी खर्च पर विदेश भेजने का प्रस्ताव आया, तो उन्होंने साफ मना कर दिया—“मर जाएंगे, लेकिन बेटे का इलाज सरकारी पैसे से नहीं कराएंगे।” बाद में व्यक्तिगत प्रयासों से इलाज संभव हुआ।
उनकी राजनीति में नैतिकता दिखावा नहीं, जीवन का स्वभाव थी।
जब प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह उनके घर पहुंचे और नीचा दरवाज़ा देखकर सिर टकरा बैठें। उन्होंने हँसते हुए कहा—
“कपूरी, दरवाज़ा ऊँचा करवा लो।”
कर्पूरी ठाकुर का उत्तर था—
“जब तक बिहार के गरीबों का घर नहीं बन जाता, मेरा घर ऊँचा हो जाए तो उसका क्या मतलब?”
कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद जब वरिष्ठ समाजवादी नेता हेमवती नंदन बहुगुणा उनके गांव पहुंचे, तो यह देखकर फूट-फूट कर रो पड़े कि बिहार का दो बार मुख्यमंत्री रहने वाला व्यक्ति एक पक्का मकान तक नहीं छोड़ गया।


आज के दौर में, जब राजनीति संपत्ति, प्रचार और व्यक्तिगत वैभव का माध्यम बनती जा रही है, कर्पूरी ठाकुर का जीवन एक तीखा प्रश्न खड़ा करता है—क्या सत्ता का उद्देश्य खुद को बड़ा बनाना है या समाज को?
जनवरी 2024 में कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस विचारधारा का था, जिसने सामाजिक न्याय, समानता और शिक्षा को लोकतंत्र की आत्मा माना।
जिन लोगों ने उन्हें गालियाँ दीं, उनके नाम इतिहास में दर्ज नहीं हैं। लेकिन एक नाई का बेटा, जिसने अपमान को संकल्प में बदला, आज भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।
कर्पूरी ठाकुर केवल व्यक्ति नहीं थे—वे एक विचार, एक मानसिकता और एक संवेदनशील राजनीति का नाम थे।
कर्पूरी ठाकुर ने डॉ. राम मनोहर लोहिया को अपना वैचारिक गुरु माना। उन्होंने समाजवाद को पढ़ा ही नहीं—जिया।उनकी विरासत निजी नहीं थी, सामाजिक थी |आत्मसम्मान की, बराबरी की, आवाज़हीनों को आवाज़ देने की
आज के चमक-दमक, ब्रांडेड राजनीति के दौर में कर्पूरी ठाकुर एक नैतिक प्रश्न बनकर खड़े होते हैं—
क्या राजनीति सेवा है या प्रदर्शन?


क्या सत्ता साधन है या साध्य?
जननायक कर्पूरी ठाकुर बताते हैं कि—
सत्ता में रहकर भी बेदाग रहा जा सकता है।
गालियाँ खाकर भी इतिहास लिखा जा सकता है।
और बिना कुछ पाए भी बहुत कुछ छोड़ा जा सकता है।
इसीलिए जननायक कर्पूरी ठाकुर एक व्यक्ति नहीं, एक विचार हैं—
जो जब तक इस देश में गैर-बराबरी रहेगी,
सितारे की तरह चमकते रहेंगे।

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