फारबिसगंज के केजे–65 रेलवे क्रॉसिंग पर अटका सवाल—आख़िर कब जुड़ेगा अधूरा लिंक?

फारबिसगंज के केजे–65 रेलवे क्रॉसिंग पर अटका सवाल—आख़िर कब जुड़ेगा अधूरा लिंक?

जे टी न्यूज, फारबिसगंज (अररिया):
यह तस्वीर हैरत में डालने वाली है। फारबिसगंज स्थित केजे–65 रेलवे क्रॉसिंग (सुभाष चौक) के दोनों ओर रेल पटरियां पूरी तरह बिछी हुई हैं, लेकिन बीच में महज़ 18 मीटर का हिस्सा ऐसा है, जिसे न जाने किन हालात में अधूरा छोड़ दिया गया। सवाल यह है कि जब सब कुछ तैयार है, तो यह छोटा-सा टुकड़ा सालों से रेलवे की फाइलों में क्यों उलझा हुआ है?
फारबिसगंज–सहरसा– सरायगढ़ रेलखंड पर अमान परिवर्तन का कार्य पूरा होने के बाद सीताधार पर बने नए रेल पुल से ट्रेनों का परिचालन होना था। पुल का निर्माण करीब दो वर्ष पहले पूरा हो चुका है, मुख्य सुरक्षा आयुक्त द्वारा निरीक्षण भी किया जा चुका है और परिचालन की स्वीकृति भी मिल चुकी है। इसके बावजूद फारबिसगंज से दरभंगा और सहरसा की ओर जाने वाली ट्रेनें आज भी पुराने वैकल्पिक मार्ग से ही चलाई जा रही हैं।
रेल परामर्शदात्री समिति के सदस्य बछराज राखेचा का कहना है कि केजे–65 क्रॉसिंग पर रेल लाइन लिंक नहीं होने के कारण सरायगढ़ या जोगबनी दिशा से आने वाली ट्रेनों में से किसी एक को अनावश्यक रूप से रोकना पड़ता है। इसका सीधा असर यह होता है कि ट्रेनें लेट होती हैं और सुभाष चौक रेलवे क्रॉसिंग पर लंबा जाम लग जाता है, जिससे आम लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ती है। उन्होंने इस मुद्दे को कटिहार रेल मंडल के यांत्रिक विभाग और परिचालन प्रबंधक के समक्ष भी उठाया है।


वहीं पूर्व मध्य रेलवे की रेल परामर्शदात्री समिति के सदस्य विनोद सरावगी ने हाल ही में समस्तीपुर में आयोजित बैठक में इस समस्या को प्रमुखता से उठाया। रेलवे अधिकारियों ने वहां बताया कि यह अधूरा निर्माण कार्य पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे, कटिहार मंडल के कार्यक्षेत्र में आता है और उन्हें ही इसे पूरा करना है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि 18 मीटर की पटरी जोड़ना क्या वाकई रेलवे के लिए कोई असंभव या लंबा काम है? जानकारों का मानना है कि इसके लिए केवल कुछ घंटों का मेगा ट्रैफिक ब्लॉक लेना पड़ेगा, लेकिन इसके बाद सहरसा और दरभंगा की ओर जाने वाली ट्रेनें बिना किसी रुकावट निर्बाध रूप से चल सकेंगी और फारबिसगंज की सबसे बड़ी ट्रैफिक समस्या का समाधान हो जाएगा।
अब देखना यह है कि रेलवे इस “18 मीटर की कहानी” को कब गंभीरता से लेता है, या फिर यह अधूरा ट्रैक यूं ही सिस्टम की उदासीनता का प्रतीक बना रहेगा।

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