मोदी सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों को परास्त करो

चार श्रम संहिताओं के खिलाफ 1 अप्रैल को काला दिवस मनाओ

मोदी सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों को परास्त करो
चार श्रम संहिताओं के खिलाफ 1 अप्रैल को काला दिवस मनाओ

जे टी न्यूज़, बेतिया : बिहार राज्य रिक्शा मजदूर सभा के अध्यक्ष प्रभुराज नारायण राव ने बताया कि केंद्रीय श्रमिक संगठनों और सेवा संघों ने 1 अप्रैल को राष्ट्रव्यापी काला दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।
उन्होंने कहा कि ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी से मुक्ति तथा श्रमिक वर्ग के जीवन से जुड़ी अधिकारों के लिए मजदूर वर्ग लगातार संघर्ष करते रहे हैं।1926 में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा मजदूर वर्ग को यूनियन बनाने का अधिकार मिला।उसके पूर्व 1886 में 8 घंटे काम का अधिकार के लिए अमेरिका के शिकागो में मजदूरों ने जुलूस निकाला था।जिस पर गोलियां चली और 5 मजदूरों ने शहादत दी थी ।इस तरह लगभग 150 साल का अपने अधिकार के लिए मजदूर आंदोलन का इतिहास रहा है।
भारतीय संविधान ने 44 श्रम कानूनो को मजदूरों के हित में बनाया और राज्य अधिकृत 150 श्रम कानून बनाए गए ।लेकिन इसमें लगातार पिछली सरकारों ने कटौती करने का काम किया। 2014 के बाद नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार जो साम्राज्यवाद परस्त,कॉर्पोरेट परस्त, पूंजीपतियों की नेतृत्व करने वाली सरकार है ।44 श्रम कानून को समाप्त करके चार लेबर कोड बनाया। जिसमें मजदूरों के सारे अधिकार खासकर अपने हकों के लिए आंदोलन के अधिकार छीन लिए गए और ठेका पर काम देने का प्रचलन शुरू हुआ। जिसके आधार पर मजदूर की अस्तित्व ही समाप्त की जा रही है।अब मोदी सरकार ने सदियों पहले संघर्ष के बल पर मिले 8 घंटा काम के अधिकार को पूरी तरह समाप्त कर 12 से 14 घंटे मजदूरों से काम लेने की नीति बनाने पर अड़ी हुई है ।व्यवहार में इसका उपयोग भी किया जा रहा है। इन संहिताओं के मसौदा तैयार करने के समय ट्रेड यूनियनों के नेतृत्व से कोई परामर्श नहीं किया गया। इतने गंभीर मुद्दे पर, जो देश के उत्पादक वर्ग के जीवन से जुड़ा है उससे परामर्श भी नहीं लिया गया ।लंबे समय से भारतीय श्रम सम्मेलन भी नहीं बुलाया गया। यह अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का उल्लंघन है, जिनके प्रति भारत एक राष्ट्र के रूप में प्रतिबद्ध है।
ये श्रम संहिताएँ देश के मजदूरों को जो वास्तविक उत्पादन तंत्र हैं ,को फिर से ब्रिटिश औपनिवेशिक काल जैसी शोषणकारी परिस्थितियों में धकेलने का प्रयास किया जा रहा है। श्रमिक वर्ग ने औपनिवेशिक काल में अत्यधिक शोषण के खिलाफ और स्वतंत्र भारत में भी 8 घंटे के कार्य दिवस, कार्य स्थल सुरक्षा, यूनियन बनाने और संगठित होने के अधिकार, सामूहिक सौदेबाजी, आंदोलन करने और हड़ताल के अधिकार के लिए संघर्ष करते रहे हैं।


उन्होंने सम्मान जनक वेतन, सामाजिक सुरक्षा, ठेका श्रमिकों के नियमितीकरण, स्थायी कार्यों में ठेका प्रथा समाप्त करने, समान काम के लिए समान वेतन, बोनस, ग्रेच्युटी और पेंशन के अधिकार के लिए भी लड़ाई लड़ी है।
अभी मोदी सरकार इन 4 श्रम संहिताओं के माध्यम से हमारी उपलब्धियों को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। इन संहिताओं में ऐसे कठोर और दमनकारी प्रावधान हैं। जिनसे यूनियन बनाना कठिन, पंजीकरण मुश्किल और निरस्तीकरण आसान हो जाएगा। नियोक्ताओं के उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जा रहा है। जबकि ट्रेड यूनियन गतिविधियों को दंडनीय बनाया जा रहा है। कार्य समय की सीमा को खुला
छोड़ दिया गया है।जिससे उसे मनमाने ढंग से बढ़ाया जा सके। हड़ताल का अधिकार लगभग समाप्त कर दिया गया है।
ठेका रोजगार को सामान्य बनाया जा रहा है।मौजूदा सामाजिक सुरक्षा कानूनों को कमजोर किया जा रहा है और सार्वभौम सामाजिक सुरक्षा के झूठे दावे के बावजूद अधिक श्रमिकों को इसके दायरे से बाहर रखा जा रहा है। सुरक्षा मानकों से समझौता किया जा रहा है और 17 क्षेत्रीय श्रम कानूनों को समाप्त कर बड़ी संख्या में श्रमिकों को व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार से वंचित किया जा रहा है।न्यूनतम वेतन कानूनों को कमजोर कर गरीबी रेखा से नीचे ‘राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन’ लागू करने की कोशिश की जा रही है। ये संहिताएँ संगठित क्षेत्र को असंगठित बनाने और असंगठित श्रमिकों को अधिकारों से वंचित करने की योजना है। इनमें कई प्रावधान भारतीय संविधान की भावना, अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों और मानवाधिकारों के विरुद्ध हैं।
ऐसी स्थिति में सेवा संघों और श्रमिक संगठनों के पास इन श्रम संहिताओं के खिलाफ संघर्ष जारी रखने और उनके क्रियान्वयन के खिलाफ प्रतिरोध खड़ा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। 12 फरवरी 26 की ऐतिहासिक राष्ट्रव्यापी हड़ताल को सफल बनाने वाले श्रमिकों, किसानों और खेत मजदूरों तथा आम जनता की भारी भागीदारी को देखते हुए आने वाले दिनों में हमें लंबी लड़ाई के लिए तैयार रहना है।
1 अप्रैल 26 को पूरे देश के मजदूर,बैंक कर्मी,बीमा कर्मियों के साथ साथ असंगठित क्षेत्र के मजदूर भी इस काला दिवस कार्यक्रम में शामिल होंगे।इस दिवस को काला बैज लगाकर, हाथों या माथे पर काली पट्टी बांधकर, लंच अवकाश के दौरान विरोध प्रदर्शन, नारेबाजी, धरना-प्रदर्शन, जुलूस,पुतला दहन ,साइकिल/मोटरसाइकिल जुलूस,पद यात्राएँ या अन्य रचनात्मक तरीकों से सफल बनाएंगे।इस कार्यक्रम में संयुक्त किसान मोर्चा के संगठन भी शामिल होंगे। क्योंकि लोकतंत्र की असली कसौटी सामूहिक संगठन बनाने, यूनियन बनाने और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने के अधिकार में निहित है।निश्चित रूप से यह कार्यक्रम भी मजदूर आंदोलन का एक ऐतिहासिक हिस्सा बनेगा।

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