मोदी सरकार एवं चीनी मिलों द्वारा गन्ना किसानों की लूट

मोदी सरकार एवं चीनी मिलों द्वारा गन्ना किसानों की लूट


जे टी न्यूज़, बेतिया : अखिल भारतीय गन्ना किसान महासंघ के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष तथा बिहार राज्य ईख उत्पादक संघ के महासचिव प्रभुराज नारायण राव ने बताया कि केन्द्र सरकार की गन्ना किसान विरोधी और चीनी मिल परस्त नीतियों के चलते देश के गन्ना किसान लूटमारी के शिकार होते जा रहे हैं। केंद्रीय बजट सत्र 2026– 27 के द्वारा दोनों सदनों में रखे गए प्रतिवेदन के आधार पर 16 फरवरी 2026 को देश में गन्ना का कुल बकाया राशि 16087 करोड़ रुपए थी। जबकि 2024– 25 और 2025–26 में गन्ना बकाया की राशि 497 करोड़ और 2023– 24 में 34 करोड़ बतलाया गया था। 2025– 26 में किसानों को बकाया मद में देय राशि 79 818 करोड़ है। जिसमें से 63 731 करोड़ का भुगतान किया जा चुका है। शेष राशि 16087 करोड़ का भुगतान किया जाना है। जैसा की खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग की अनुदान मांगों के प्रतिवेदन से स्पष्ट होता है।
उपभोक्ता मामलों तथा खाद्य और सार्वजनिक वितरण की संसदीय स्थायी समिति में सांसद कनिमोझी ने बताया कि गन्ना बकायों में 32 गुना वृद्धि हुई है ।जो पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में किसानों को देय है। उन्होंने कहा कि पिछले दो वित्तीय वर्षों में बकाया शून्य था और 16 फरवरी को इस साल 4956 करोड रुपए था। यह निश्चित रूप से चीनी मिलों के द्वारा गन्ना किसानों के शोषण को परिलक्षित करता है। उन्होंने बताया कि 16 फरवरी को बिहार में 212 करोड़ रुपए, हरियाणा का बकाया 373 करोड़, पंजाब का बकाया 535 करोड़, मध्य प्रदेश का बकाया 366 करोड़,उत्तराखंड का बकाया 235 करोड़, तेलंगाना का बकाया 152 करोड़ , उत्तर प्रदेश का बकाया 24 करोड़ से बढ़कर 2024– 25 में 321 करोड़ और 3287 करोड़ हो गया ।महाराष्ट्र में 2123 करोड़ 2023–24 और 4252 करोड़ 2024–25 में था। कर्नाटक में सबसे अधिक बकाया है ।पिछले दो वित्तीय वर्षों में यह अंतर देखने को मिला है। केंद्र सरकार ने अपने प्रतिवेदन में बताया कि सरकारी चीनी मिलों ने सरकार से मदद मांगी थी कि किसानों के बकायों को अविलंब दिया जाए। इसके लिए चीनी मिलों को अतिरिक्त गन्ने को इथनॉल में परिवर्तित करने के लिए केंद्र सरकार प्रोत्साहित कर रही है।


बिहार में 29 चीनी मिलें थी जिसमें से 9 चीनी मील चल रही है ।बाकी 20 चीनी मील जो बंद है ।उन पर 300 करोड़ रुपए से ज्यादा बकाया है और इस पर केंद्रीय या राज्य सरकार के तरफ से किसानों के बकाये राशि की भुगतान के लिए कोई पहल नहीं की गई है।
केंद्र सरकार की करनी और करनी में स्पष्ट अंतर दिख रहा है। एक तरफ किसानों के बकाए राशि की भुगतान के लिए चीनी मिलों को अतिरिक्त गन्ने को इथनॉल में परिवर्तित करने की बात कही जा रही है। तो दूसरी तरफ बिहार के साथ-साथ अन्य राज्यों में बड़े-बड़े इथनॉल प्लांट लगाया जा रहा है। जो मक्का और गेहूं जैसे खाद्य पदार्थ से इथनॉल पैदा करेगा। जबकि पिछले दिनों बिहार राज्य ईख उत्पादक संघ ने बिहार सरकार को सुझाव दिया था कि गन्ना के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा इथनॉल पैदा किया जाए । बन्द चीनी मिलों को चालू किया जाए और बिहार की जनता को भुखमरी से बचाने के लिए खाद्य पदार्थ से इथनॉल बनाने के सभी प्लांट को बंद किया जाए ।लेकिन केंद्र और राज्य सरकार की किसान हितैषी इस सुझाव पर कोई चिंता नहीं है।
उन्होंने मांग किया कि बिहार सरकार की प्रथम कैबिनेट बैठक में 25 नई चीनी मिलों और बन्द चीनी मिलों में से 9 चीनी मिलों को नए सिरे से चालू करने के निर्णय जो लिए गए ।वह अभी तक अधर में लटका हुआ है। जबकि बिहार राज्य ईख उत्पादक संघ ने बिहार सरकार को यह प्रस्ताव दिया था कि सहकारिता के माध्यम से प्रस्तावित सभी चीनी मिलों के चलने से बिहार सरकार और गन्ना किसानों को काफी लाभ मिलेगा। इसीलिए सहकारी चीनी मिलों को बिहार में लगाया जाए ।
उन्होंने कहा कि बंद चीनी मिलों के बकाया पैसों के लिए आंदोलन जारी रहेगा और गन्ना किसान जो घाटे की खेती कर रहे हैं। उनको गन्ना का दाम 550 रुपए प्रति क्विंटल दिलाने का संघर्ष भी जारी रहेगा।

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