जंगल राज सिर्फ ‘तीन जाति’ के लिए था, जंगल राज ने बनाया अनुकंपा की सरकार।

 

जे टी न्यूज़

मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ने ‘सुशासन के मुख्‍यमंत्री’ से लेकर ‘अनुकंपा के मुख्‍यमंत्री’ तक की लंबी राजनीतिक यात्रा तय की है। उन्‍होंने सरकार के कई कार्यक्रमों में ‘सुशासन’ जोड़ रखा है। सुशासन शब्‍द के साथ ‘जंगल राज’ शब्‍द का भी मुख्‍यमंत्री ने खूब मार्केटिंग की है। ‘जंगल राज’ इतना ताकतवर शब्‍द हो गया था कि बिहार की सरकार बदल गयी। मुख्‍यमंत्री की कुर्सी यादव से सरक कर कुर्मी के हाथ में चली गयी।
जदयू के नवमनोनीत अध्‍यक्ष हैं राजीवरंजन सिंह उर्फ ललन सिंह। लोकसभा के सदस्‍य हैं और आरसीपी सिहं के उत्‍तराधिकारी। अध्‍यक्ष मनोनीत होने के बाद 5 अगस्‍त को उन्‍होंने एक ट्विट किया। अध्‍यक्ष मनोनीत होने के बाद उसी दिन वे पहली बार पटना आने वाले थे। इससे पहले उनका ट्विट जनता के बीच पहुंचा। नीतीश कुमार की राजनीतिक ‘विफलता’ का इससे बड़ा प्रमाण और कुछ नहीं हो सकता है। शायद इसी विफलता का परिणाम है कि नीतीश कुमार 115 से घटकर 43 विधायकों वाली तीसरे नंबर की पार्टी के विधायक दल के नेता की स्थिति में पहुंच गये। अपने ट्विट में ललन सिंह ने 18 से 25 वर्ष के युवाओं से अपील की है। इस ट्विट को जदयू के अधिकृत पेज से भी रिट्विट और अपलोड किया गया है। ललन सिंह ने अपने अपील में कहा है- ‘आप लोगों ने जब से होश संभाला है नीतीश कुमार का सुशासन ही देखा है। 1990 से 2005 का वह रुह कंपाने वाला जंगल राज नहीं देखा होगा। आप सभी से विनम्र निवेदन है कि अपने घर और आस-पड़ोस के बुजुर्गों के पास बैठकर उन दिनों की घटनाओं को जान लीजियेगा। यदि आपको वर्तमान और भूत में नजर अंतर आये तो जाति-धर्म और कुनबी धारा से ऊपर उठकर सामाजिक न्‍याय के साथ विकास वाली नीतियों के साथ समाज के अंतिम व्‍यक्ति तक पहुंचने वाली एकमात्र पार्टी जनता दल यूनाइटेड से जुड़ कर आने वाली पीढि़यों के भविष्‍य संवारने में अपना बहुमूल्‍य योगदान अवश्‍य दीजिये।’
अपने 15 वर्षों में नीतीश कुमार ने कौन सा काम किया, इसकी चर्चा उन्‍होंने नहीं की है। नीतीश कुमार के सुशासन का ‘जुमला’ ललन सिंह ने भी युवाओं पर मढ़ दिया। 15 वर्षों में नीतीश कुमार के नेतृत्‍व वाली सरकार ने बिहार की जनता के लिए कुछ किया है तो पार्टी अध्‍यक्ष के रूप में ललन सिंह को पहले अपनी सरकार की उपलब्धियों के बारे में जनता को बतान चाहिए था। लेकिन वे दूसरी सरकार की विफलता का पाठ पढ़ा रहे हैं। ललन सिंह खुद बुजुर्ग हो गये हैं, उन्‍हें ही युवाओं को बता देना चाहिए था कि जंगल राज में कैसे जातीय सेना चमार, दुसाध, मुसहर, भूइयां के घरों को आग के हवाले कर देती थीं? कैसी जातीय सेना गांव के गांव जला देती थीं? इन जा‍तीय सेनाओं के संरक्षक कौन थे? ललन सिंह को खुद युवाओं को बताना चाहिए था कि 2015 में कैसे जीतनराम मांझी से कुर्सी हथियाने के लिए जदयू के नेता विरोधी शिविर में जाकर ‘जीवनदान’ की याचना कर रहे थे।
ललन सिंह जिसे जंगलराज कह रहे हैं, दरअसल वह ‘यादव राज’ था। गैरसवर्ण जातियों के लिए वही बिहार की राजनीति में स्‍वर्णिम काल था। उनके लिए स्वाभिमान उत्सव के समान था। इसी दौर में नीतीश कुमार, सुशील मोदी, नंद किशोर यादव से लेकर प्रेम कुमार तक जैसे नेताओं को खुली हवा में सांस लेने का मौका मिला और फिर नयी उर्वर राजनीतिक जमीन पर वे वटवृक्ष बन गये। जेपी आंदोलन में ये सभी छात्र नेता रहे होंगे, लेकिन नेता बनने का मौका इन्‍हें ‘यादव राज’ में ही मिला। यादव राज जैसे शब्‍द पर कुछ लोगों को आपत्ति भी हो सकती है। मुख्‍यमंत्री के सरकारी आवास में किसी यादव के बैठने का असर सिर्फ अण्‍णे मार्ग तक सीमित नहीं था। इसकी धमक और हनक खेत-खलिहान से लेकर खटाल तक महसूस किया जा रहा था। सत्‍ता की धमक और हनक से सभी गैरसवर्ण जातियां खुद को ताकतवर समझ रही थीं। लेकिन यह भी सच है कि डीएम आफिस से लेकर बीडीओ आफिस और थाने में अधिकार और स्‍वाभिमान की लड़ाई सबसे अधिक यादव ही लड़ रहे थे। स्‍वाभिमान की लड़ाई में सबसे अधिक मुकदमे यादवों पर दर्ज किये जा रहे थे। इस लड़ाई में कुर्मी- कोईरी- कहार- बनिया शायद ही मिल पायेंगे। सिस्‍टम से यादवों की लड़ाई का लाभ सभी गैरसवर्ण जातियों को मिल रहा था, लेकिन खामियाजा अकेले यादव भुगत रहे थे। इस लड़ाई में हर जगह यादव की नजर आ रहे थे। मुकदमा भी यादव झेल रहे थे और पैरवी का लाभ भी उन्‍हें मिल रहा था। ये बातें दिखने लगी थीं। इसी माहौल में नीतीश कुमार ने यादव जाति के खिलाफ गैरयादव पिछड़ी जातियों की गोलबंदी की। वे यादव सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि यादव समाज के खिलाफ नफरत के बीज बोने लगे। उन्‍होंने सरकार और समाज का ऐसा घालमेल किया कि बिहार की सामाजिक संरचना बिखरने लगी। इसका नकारात्‍मक असर हुआ कि जिस समाज के साथ यादव खड़ा था, नये माहौल में उसके खिलाफ भी दिखने लगा। इसका लाभ सवर्णों ने उठाया। नीतीश कुमार को आगे बढ़ा कर सवर्णों ने यादव विरोधी ताकतों को अपने साथ जोड़ा। इसके बाद ‘जंगल’ राज का राग अलापना शुरू किया। नीतीश कुमार के साथ सवर्णों के खेमे में गयीं ओबीसी जातियां सवर्णों के साथ जंगल राज का राग अलापने लगीं। उनका स्‍वर सवर्णों के ‘यशगान’ में डूबने लगा।
‘जंगल राज’ के उन्‍मूलन के 15 साल बाद भी जदयू के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष ललन सिंह को ‘सुशासन’ पर भरोसा नहीं है। इसलिए जंगल राज की ‘आरती’ उतारने लगे हैं। जिस जंगल राज की चर्चा ललन सिंह कर रहे हैं, वह सिर्फ तीन जातियों के लिए था। इनकी पुश्‍तैनी दहशत और आतंक के खिलाफ गैरसवर्णों ने आवाज उठाना शुरू किया था, हथियार भी उठाया था। इन्‍हीं तीन जातियों ने नीतीश कुमार को ‘अनुकंपा का मुख्‍यमंत्री’ बना दिया। जदयू को 115 से घटाकर 43 विधायकों वाली पार्टी बना दिया। ये जातियां नीतीश कुमार के राजनीतिक अवसान की जमीन पर भाजपा का आलीशान महल खड़ा करना चाहती हैं। उस आलीशान भवन में ‘नीतीश ब्रांड’ जातियों को कहां जगह मिलेगी, यह उन्‍हें ही तय करना है। नये माहौल में गैरसवर्णों की एकता की बात करना बेमानी होगी, लेकिन उनका सामाजिक सम्‍मान और राजनीतिक स्‍वाभिमान बना रहे है, इसकी चिंता गैरसवर्ण जातियों को अवश्‍य करनी चाहिए।

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