चोरों को सारे नजर आते हैं चोर
चोरों को सारे नजर आते हैं चोर
आलेख : प्रभुराज नारायण राव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता भारतीय जनता पार्टी के नेता देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष द्वारा दिए गए अपने नाम इंडिया पर जो प्रतिक्रियाएं दी हैं । वह देश के प्रधानमंत्री के शब्द कतई नहीं हो सकते । उनके द्वारा यह कहना कि इंडियन मुजाहिदीन या पी एफ आई जैसे देशद्रोही संगठनों की तरह ही विपक्ष का इंडिया नाम भी है । फिर यह कहना कि ब्रिटिश इंडिया कंपनी की तरह देशद्रोही विपक्ष का नाम इंडिया है । हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1913 में हिंदू महासभा के नेता सावरकर ने 6 बार माफी अंग्रेजी हुकूमत से मांगा । अपनी रिहाई के लिए और उसको नरेंद्र मोदी जैसे संघी लोग राष्ट्रवादी कहते हैं । तो सबके सामने यह सवाल खड़ा है कि देश की आजादी के लिए हंसते हंसते फांसी के तख्तों को चुमने वाले भगत सिंह, राजगुरु ,सुखदेव या अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद ,अशफाक उल्ला खान , रोशन सिंह , रामप्रसाद बिस्मिल, खुदीराम बोस जैसे हजारों लाखों लोग जो आजादी के लिए शहीद हो गए । उन्हें संघी या मोदी जी क्या कहेंगे । एक बार इनके बारे में भी तो कोई शब्द मोदी जी गढ़े जो देश सुने ।सच तो यह है कि देश की आजादी के लिए लड़ने वाले जमात से 1925 में पैदा हुआ संघ का कोई वास्ता नहीं रहा। वह अंग्रेजों की फूट डालो राज करो की नीति को देश में लागू करने के लिए हिंदू और मुसलमान के बीच तनाव बढ़ाने के काम में लगे रहे और अंग्रेजों के खासम खास मेहमान बने रहे । इनके संस्कार में इनके रगों में गुलामी समाहित है और उसे ही राष्ट्रभक्ति मानते हैं । सच तो यह कि ये लोग हिटलर के वंशज हैं । जिसके प्रचार मंत्री ने एक झूठ को एक सौ बार बोलने से सच हो जाता है जैसा उपदेश दिया है । यह उसी के पद चिन्हों पर भारत में आज भी चल रहे हैं । इन्हें देश से ज्यादा सत्ता सुख से मतलब है और इसके लिए देश की जनता कोई मायने नहीं रखती।
संघ प्रायोजित भारतीय जनता पार्टी जब सत्ता में आती है । तो अंग्रेजी बोलना शुरू कर देती है । इसके पहले अंग्रेजी को विदेशी भाषा कहती है । जब प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी बाजपेई शाइनिंग इंडिया या फील गुड करते हैं तो यह बात समझ में आ जाती है । जब दूसरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में स्किल इंडिया , खेलो इंडिया , स्टार्टअप इंडिया जब कहते हैं तो फिर यह बात और ज्यादा सुदृढ़ हो जाता है और ऐसा लगता है सत्ता जब तक बनी रहे इंडिया का इस्तेमाल इनके अलावा दूसरा कोई नहीं करें । क्योंकि सही मायने में ब्रिटिश इंडिया कंपनी के अनुआई तो यही थे । इंडियन मुजाहिदीन हो या पीएफआई हो उनके साथ सत्ता प्राप्ति के लिए आंतरिक रिश्ते तो इनके थे हीं। संघी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह भूल जाते हैं कि इनके संघ के जन्म से पहले की पार्टी इंडियन नेशनल कांग्रेस , कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया जैसी पाटिया देश के अंदर कार्यरत है। तो फिर विपक्ष के इंडिया नामकरण पर इतनी बौखलाहट और देशद्रोही की तगमा देने की जरूरत क्यों पड़ गई । क्योंकि इन्हें पता है और देश को भी पता है कि 30% के आसपास वोट लाकर सत्ता हासिल किया जाता रहा है । क्योंकि विपक्ष कई हिस्सों में बटे हुए रहते हैं । जब देश के सामने गंभीर संकट पैदा होता है । तो विपक्ष को कई बार एक होना पड़ा है । 1977 में तो सत्ता की भूख ने 1952 में बनी जनसंघ पार्टी को तिलांजलि देकर जनता पार्टी में विलीन हो गई । 80 में भारतीय जनता पार्टी गठित हुई और 84 में मात्र 2 सीट मिली । जिसमें एक अटल जी स्वयं विजयी हुए थे । क्योंकि इन्दिरा गांधी की शहादत के बाद संघ ने कांग्रेस को वोट देने को कहा था । फिर बोफोर्स काण्ड के बाद 1989 में बी पी सिंह से भाजपा का चुनावी समझौते के बाद भाजपा की लोकसभा की सीट 89 पर पहुंच गई । लेकिन वामदलों के चेतावनी के चलते इन्हें सत्ता का सुख नहीं मिल सका । अलग राष्ट्र की मांग करने वाली गोरखालैंड के साथ भी चुनावी समझौता कर जशवंत सिंह को सांसद बनाया । अफजल गुरु को शहीद कहने वाली पी डी पी के साथ भी सरकार में शामिल रही ।
मणिपुर के जातीय दंगे भी भाजपा की सोची समझी साजिश के ही हिस्से है । इसके लिए राष्ट्रीय एकता व अखण्डता कोई मायने नहीं रखता । धार्मिक विषमता ही इसकी सत्ता को कायम रख सकती है । यहीं कारण है कि देश में नफरतों की बीज बोई जा रही है।मंदिर और मस्जिद के विवाद को हवा दिया जा रहा है । लेकिन विपक्ष ने जो अपना नाम इंडिया रखा है ।सचमुच में इससे प्रधानमंत्री मोदी सहित उनका पूरा कुनबा भयभीत हो गया है । क्योंकि 2024 का चुनाव सामने है और इंडिया देश के साथ गद्दारी करने वाले तथाकथित राष्ट्र भक्तों को गद्दी से उतारने का मन बना लिया है । जो मोदी को स्वीकार नहीं है । आगे देखिए क्या क्या होने वाला है ।


