जलेस ने बेतिया में प्रेमचन्द जी का १४३वा जयंती मनाया आलेख- प्रभुराज नारायण राव
जलेस ने बेतिया में प्रेमचन्द जी का १४३वा जयंती मनाया
आलेख- प्रभुराज नारायण राव

कथा सम्राट जनवादी साहित्य के स्तंभ प्रेमचंद जी का 143 वा जयंती जनवादी लेखक संघ द्वारा बेतिया में मनाया गया । समारोह की अध्यक्षता गोरख प्रसाद मस्ताना ने किया । इस समारोह के मुख्य अतिथि पटना से आए राजभाषा अधिकारी मोहम्मद दानिश थे । समारोह का संचालन जनवादी लेखक संघ के पश्चिम चंपारण के जिला अध्यक्ष डा . जाकिर हुसैन जाकिर तथा सचिव अनिल अनल ने किया । इस समारोह में कई विद्वान व्याख्याताओं ने आलेख प्रस्तुत किए और कई शायर तथा कवियों ने प्रेमचंद जी के कृतियों के ऊपर कविता पाठ भी की । निश्चित रूप से यह समारोह एक ऐतिहासिक स्थान छोड़ गया । प्रेमचंद जी जो ब्रिटिश काल में देश की आजादी के लिए अपने साहित्य के माध्यम से संघर्ष का बिगुल बजा रहे थे। ठीक उसी दौर में समाज के अंदर राजा महाराजाओं द्वारा ढाहे जा रहे शोषण , सामंती जुल्म तथा महाजनी लूट के खिलाफ अपनी लेखनी के माध्यम से लोगों को जागरूक भी कर रहे थे । प्रेमचंद जी का पहला उपन्यास 1908 में सोज ए वतन के नाम से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक बगावती तेवर के साथ प्रकाशित हुआ। जिस पर अंग्रेजों की निगाह पड़ते हीं पाबंदियां लगा दी गई और किताब छीन लिए गए । इस तरीके से प्रेमचंद जी की लेखनी की धार किसी बम और तलवार से ज्यादा आजादी के दौर में कारगर नजर आया।

1917 की सोवियत क्रांति से प्रभावित हो वह देश के अंदर ब्रिटिश हुकूमत को भागने के बाद एक समाजवादी व्यवस्था यानी कि एक शोषण मुक्त व्यवस्था देश में लाने के पक्षधर थे। वे अपने रचनाओं में समाज के अंतिम पायदान पर खड़े शोषित समुदाय तथा किसान को नायक के रूप में प्रस्तुत करने का अद्भुत काम किए । उनके कालजई रचनाओं से यह परिलक्षित हो जाता है कि वे सर्वहारा वर्ग के रचनाकार थे । उनके जीवन स्तर और अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ उन पर हो रहे जुल्मों सितम को उजागर करना उनका मुख्य उद्देश्य था ।
वे 15 उपन्यास , 300 कहानियां , 7 बाल साहित्य , 3 नाटक , हजारों लेख तथा पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशनों में उसी को जीने का आधार बनाए । मुंशी प्रेमचंद जी की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि ब्रिटिश शासकों के दौर में और मुगलिया सल्तनत के अवशेषों से साहित्य जो कुंठित थी , जो भ्रमित थी। उसको समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया। नाना प्रकार के तिलिस्मी कहानियों , रचनाओं , अध्यात्मिक कथाओं से साहित्य भरा हुआ था । जो समाज को दिशा विहीन कर रहा था । उस संघर्ष को जीने का काम प्रेमचंद जी की अदम्य संघर्ष का ही प्रतिफल था । जो समाज और देश की साहित्य को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कर आजादी हासिल करने की ललक और शोषण विहीन समाज बनाने की जिज्ञासा आम लोगों के अंदर भरने में कामयाब रहे । यह कार्य आसान नहीं था । लेकिन प्रेमचंद जी ने उसे मुमकिन बना दिया । प्रेमचंद जी 1930 में बनारस से हंस पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया । वह पत्रिका भी समाज तथा सर्वहारा का प्रतिबिंब नजर आया। उस हंस पत्रिका का सहायक संपादक कन्हैयालाल मुंशी बनाए गए थे । जब भी कोई रचना साहित्यकारों द्वारा हंस को भेजी जाती थी । तो उसमें मुंशी कोमा प्रेमचंद के नाम से ही भेजी जाती थी और वह धीरे-धीरे मुंशी प्रेमचंद कहलाने लगे । प्रेमचंद जी अपने पूरे जीवन में अपने नाम के साथ मुंशी का संबोधन नही किए ।
वे 1934 में मजदूर फिल्म की कहानी लिखने के लिए बंबई चले गए। जहां फिल्म की कहानी तैयार किए । फिल्म भी बनाई गई जिसका नाम मजदूर रखा गया । मुंबई उनको बहुत दिनों तक पसंद नहीं आया और वापस बनारस आ गए । इसी बीच देश के अंदर उर्दू और हिंदी साहित्य में प्रगतिशील विचारों पर लिखने वाले साहित्यकारों की संख्या काफी बढ़ गई और ब्रिटिश हुकूमत को समाप्त कर देश के अंदर एक समाजवादी व्यवस्था की परिकल्पना के साथ साहित्यकारों , कवि तथा शायरों का संगठन बनाने की मुहिम तेज हुई । जो छोटे-छोटे स्थानीय स्तर पर संगठन बनाकर प्रगतिशील साहित्य को बढ़ावा दे रहे थे। 1936 में लखनऊ में राष्ट्रीय स्तर पर देश को गुलामी से मुक्ति के लिए साहित्यिक संघर्ष करने वाले साहित्यकारों का राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया गया । जिसके संस्थापक अध्यक्ष प्रेमचंद जी बनाए गए । जिसका नाम प्रगतिशील लेखक संघ रखा गया । प्रगतिशील साहित्यकारों के संगठन को समृद्धि और सुदृढ़ बनाने की दिशा में काम कर रहे प्रेमचंद जी ज्यादा दिनों तक सहयोग नहीं कर पाए । बीमारी के दौर से गुजरने के बाद 56 वर्ष की उम्र में ही 8 अक्टूबर 1936 को उनकी मृत्यु हो गई ।
समारोह को संबोधित करने वालों में डा. जफर इमाम जफर , डा. फारूक आलम , मुजिबुल हक, सुरेश गुप्त, डा. शफी अहमद , प्रो. कमरूजमा कमर , डा .प्रो. फखरे आलम , डा. नसीम अहमद नसीम, डा. ज्ञानेश्वर गुंजन, चंदन झा , प्रभुराज नारायण राव आदि ने अपने महत्वपूर्ण विचारों से समारोह को नवाजा । समारोह में विजयनाथ तिवारी , शंकर कुमार राव, म. हनीफ , नीरज बरनवाल, सुशील श्रीवास्तव, अवधविहारी प्रसाद आदि लोगों की उपस्थिति रही ।
