वैश्वीकरण के दौर में भारत में सामाजिक परिवर्तन के गांधीवादी दर्शन की संभावनाएं

वैश्वीकरण के दौर में भारत में सामाजिक परिवर्तन के गांधीवादी दर्शन की संभावनाएं

जे टी न्यूज, डॉ .सोनी कुमारी

गांधीजी वर्तमान परिदृश्य में विश्व गगन के अलौकिक नक्षत्र के रूप में पदस्थापित हैं।
यह संत और अहिंसा के पुजारी है । इनकी सोच सर्वदा विकास स्वरोजगार आत्मनिर्भरता की थी मौजूदा समय में उनका यह सोच सफल प्रतीत होती है । क्योंकि आत्मनिर्भरता और श्रमशील व्यक्ति ही विकास के पथ को अग्रसर कर सकता है। गांधी जी ने अपनी पुस्तक, हिन्द स्वराज जो 1909 में प्रकाशित हुआ। उसमें उन्होंने मशीनीकरण की भयावह रूप की अोर ध्यान आकृष्ट करते हुए स्वदेशी की महत्ता को बताया है । उनका मानना था एक तरफ जहां लोग बेरोजगार है वहीं दूसरी तरफ बड़े बड़े मशीनों से काम हो रहा है ।और लोग मूकदर्शक बने उसे निहार रहे है। यह अपने आप में एक बड़ी चुनौति को जन्म दे रहा है । एक ओर जहां महात्मा गांधी व्यवहारवादी आदर्शवाद पर अधिक जोर देते हैं। वहीं दूसरी तरफ इन्होंने अनटू दी लास्ट पुस्तक जो रस्किन की हैं। इसमे से उन्होंने सर्वोदय सिद्धांत को लिया है। सर्वोदय का अर्थ होता हैसा

र्वभौमिक उत्थान या सभी की प्रगति ।गांधी जी के महत्वपूर्ण दृष्टिकोण में स्वच्छता भी महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दा है जो वैश्विक स्तर पर हुए कोरोना जैसे भयंकर महामारी के बचाव में भी मिल का पत्थर साबित हुआ ।गांधी जी के शिक्षा के संदर्भ में भी देखा जाए तो वह अध्ययनों और जीविकोपार्जन पर बल देते हैं । अर्थात पढ़ाई के साथ -साथ कमाने का कार्य पर भी बल देते है । वैश्विक स्तर से लेकर गांधी जी व्यक्तिगत जीवन में भी मनसा वाचक कर्मणा और अहिंसा के सिद्धांत का पालन करने पर बल देते थे ।

गांधी जी के महत्वपूर्ण विचार दृष्टिकोण इस प्रकार से है।
प्रमुख गांधीवादी विचारधारा.
स्वदेशी ,सत्य और अहिंसा
ट्रस्टी शीप ,सत्याग्रह ,सर्वोदय आदि।


अगर देखा जाए तो वैश्वीक स्तर पर वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा खत्म होती जा रही है। जिस प्रकार चीन ,उत्तर कोरिया अमेरिका, रूस आदि देशों में परमाणु परीक्षणों की ,शास्त्रों की होड़ लगीं हुई है । यूक्रेन पर किया जा रहा विनाशकारी हमला से खुद भी सचेत रहने की भी आवश्यकता है। यह अंधी दौड़ दुनिया को विनाश की ओर ले जा रही है ।ऐसे में गांधी जी का अहिंसा जैसा दृष्टिकोण का पालन करके विश्व में शांति की स्थापना की जा सकती है यह अधिक सटीक प्रासंगिक प्रतीत हो रही है।
सत्य और अहिंसा का यह संत हमारे बीच नहीं है लेकिन उनका दर्शन और सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है।
निष्कर्ष के तौर पर हम यह कह सकते हैं कि महात्मा गांधी के विचार आज भी शाश्वत है क्योंकि जमीनी तौर पर उन्होंने अपने विचारों का परीक्षण किया और इसमें वह काफी हद तक सफल भी रहे हैं ।जो न सिर्फ स्वयं के लिए बल्कि पूरे विश्व के लिए आज भी प्रासंगिक है

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