बिहार की उच्च शिक्षा: ऐतिहासिक विरासत से वर्तमान संकट तक – समाधान की तलाश
यू. आर. कॉलेज, रोसड़ा: उच्च शिक्षा की जमीनी हकीकत
बिहार की उच्च शिक्षा: ऐतिहासिक विरासत से वर्तमान संकट तक – समाधान की तलाश
यू. आर. कॉलेज, रोसड़ा: उच्च शिक्षा की जमीनी हकीकत

जे टी न्यूज, रोसड़ा/समस्तीपुर: बिहार, जो कभी नालंदा और विक्रमशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों का केंद्र था, आज उच्च शिक्षा के क्षेत्र में काफी पीछे चला गया है। आर्यभट्ट और चाणक्य की यह भूमि, जो कभी ज्ञान और विद्वता का प्रतीक थी, अब शिक्षा के सबसे निचले स्तर पर पहुँच चुकी है। नीति आयोग की सतत विकास लक्ष्य (SDG) रिपोर्ट 2023 के अनुसार, बिहार शिक्षा के मामले में देश के 28 राज्यों में अंतिम स्थान पर है।
*हाईयर एजुकेशन की जमीनी आंकड़े*
ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) 2021-22 के आँकड़ों के अनुसार बिहार में उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (GER) मात्र 14.5% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 27.1% है। बिहार से हर साल 5 लाख से ज्यादा छात्र उच्च शिक्षा के लिए अन्य राज्यों में पलायन करते हैं, और राज्य में स्नातक स्तर की 25% से अधिक सीटें खाली रहती हैं। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में 50% से अधिक शिक्षक पद रिक्त हैं।
*यू. आर. कॉलेज, रोसड़ा: उच्च शिक्षा की जमीनी हकीकत*
यू. आर. कॉलेज, रोसड़ा की स्थापना 1960 में हुई थी, और इसका अंगीभूतिकरण 1977 में हुआ। इस कॉलेज में छात्र संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है, लेकिन संसाधनों और शिक्षकों की संख्या में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई है। एक उदाहरण के तौर पर, इतिहास विभाग में 1960-62 में मात्र 40 सीटें थीं, जो अब 487 हो चुकी हैं, लेकिन शिक्षक और कक्षाओं की कमी के कारण शैक्षिक गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

शिक्षकों की कमी और विषय विशेषज्ञता का संकट
बिहार के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है। बिहार लोक सेवा आयोग की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, 40% से अधिक विश्वविद्यालयों में नियमित प्रोफेसरों की संख्या 10% से भी कम है। लोक प्रशासन जैसे विषयों में शिक्षकों की भारी कमी है, और कई विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई है, जिससे कक्षाएँ नियमित रूप से नहीं हो पातीं।
आधारभूत संरचना की स्थिति
70% से अधिक कॉलेज किराए के भवनों में संचालित हो रहे हैं और 80% से अधिक महाविद्यालयों में आधुनिक सुविधाओं जैसे वाई-फाई, स्मार्ट क्लासरूम, और प्रयोगशालाओं की कमी है। विश्वविद्यालय परिसरों में पुस्तकालयों का हालत खराब है, और अधिकांश प्रयोगशाला उपकरण पुराने हो चुके हैं।
*तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा: उद्योगों से जुड़ाव का अभाव*
राज्य में आईटीआई कॉलेजों की संख्या मात्र 260 है, जबकि आवश्यक संख्या 5000 से अधिक होनी चाहिए। राज्य में हर साल 10 लाख से अधिक युवा बेरोजगार रहते हैं। “कुशल युवा कार्यक्रम” और “बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना” जैसी पहलें होने के बावजूद रोजगार के अवसरों में वृद्धि नहीं हो पाई है।

*समाधान की दिशा में ठोस कदम*
1. नए शिक्षक और कर्मचारियों की नियुक्ति की जाए ताकि विद्यार्थियों की संख्या के अनुपात में शिक्षा गुणवत्ता सुनिश्चित हो सके।
2. शिक्षण व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए अतिरिक्त कक्षाओं का निर्माण किया जाए।
3. कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को पर्याप्त वित्तीय सहायता दी जाए ताकि उनकी आधारभूत संरचना में सुधार हो सके।
4. तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा को उद्योगों से जोड़ा जाए, ताकि रोजगार के अवसर बढ़े।
5. शिक्षा बजट में कम से कम 50% की वृद्धि की जाए, ताकि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा संभव हो सके।
बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए सरकार, शैक्षणिक संस्थान और समाज के सभी हितधारकों को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे। अन्यथा, राज्य का युवा पलायन और बेरोजगारी की समस्या से जूझता रहेगा। आगामी विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा प्रमुख होगा, और यह देखने योग्य होगा कि क्या राजनीतिक दल इसे गंभीरता से लेंगे, या फिर यह सिर्फ चुनावी वादों तक सीमित रहेगा।
