होली गीत को लेकर लोगों में फगुआ की बहने लगी बयार

होली गीत को लेकर लोगों में फगुआ की बहने लगी बयारजे टी न्यूज, खगड़िया: ढोलक के थाप से लेकर होली गीत को लेकर लोगों में फगुआ की बहने लगी बयार
बिहार एवं उत्तर भारत के सबसे खुशियां की भरा रंगोत्सव होली पर्व को लेकर
इन दिनों गांव में इक्का दुक्का ही सही ढोलक की थाप पर फगुआ गीतों की बयार बहनें लगीं हैं । ढोलक की थाप पर ” काहू काहू के हाथ में रंग पिचकारी ,कोई लगा के गुलाल भागे, भर फागुन, बिरज में होली खेलत हैं नंदलाल….. के साथ साथ बीच बीच में जोगिरा सारा रा रा की गुंज सुनाई देने लगी है। लोगों पर फगुआ का रंग चढ चुका है। राग, रंग एवं उत्सव का त्यौहार होली का बयार बहनें लगीं हैं। गांव की पारंपरिक गीत लोगो के ओठो पर बिखरनें लगी है। पंचतत्त्व अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रकट हैं। जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि सभी अपना मोहक रूप दिखा रहे हैं। आकाश स्वच्छ है, वायु सुहावनी लगती है, अग्नि (सूर्य) रुचिकर है तो जल पीयूष के समान सुखदाता और धरती उसका तो कहना ही क्या वह तो मानों साकार सौंदर्य का दर्शन कराने वाली प्रतीत हो रही है। ठंड से ठिठुरे विहंग अब उड़ने का बहाना ढूंढते हैं तो किसान लहलहाती फसलों को देखकर नहीं अघाता। ओर मन ही मन मन मुस्कुरा रहे हैं। पेड़ों में कोपलें निकलने के लिए उतावला हैं।, आम के पेड़ बौरों से लद गए हैं। उसकी खूशबु चाहूओर फैलीं हुई है। धनी जहाँ प्रकृति के नव-सौंदर्य को देखने की लालसा प्रकट करने लगे हैं तो निर्धन शिशिर की प्रताड़ना से मुक्त होने के सुख की अनुभूति करने लगे हैं। श्रावण की पनपी हरियाली शरद के बाद हेमन्त और शिशिर में वृद्धा के समान हो गई थी, वसंत उसका सौन्दर्य लौटा रहा है। मौसम में मादकता छा गई हैं। जी हाँ प्राकृति अपना काम ससमय कर रही हैं लेकिन लोग अपनी पुरानी परंपरा को भूल रहे हैं। वसंत पंचमी के बाद गांव में होली तक ढोलक की थाप पर कजरी, होरी, बारहमासा, दादरा आदि पारंम्परिक लोक गीत सुनाई देती थी। लेकिन अब ढोलक की थाप धीरे धीरे गुम होने लगी हैं। जब किसी के मन में जो भावना जगती है वह अपने भावों को प्रकट करने के लिए बातचीत से या संलाप से या गीत के रूप में अवश्य गायेगा। वह भी मनुष्य जिस परिवेश में या वातावरण में रहता है, उसी वातावरण से प्रभावित होकर गीत गाता है और उस गीत पर आंचलिक भावों का व्यवहारों का एवं भाषाओं का पूर्ण रूपेण प्रभावित होता है! जो आमतौर पर लोकगीत के माध्यम से ढोलक की थाप पर वसंत ऋतु में होली आगमन पर गाते हैं । ग्रामीण का मानना है कि नए पीढ़ी के लोग पुरानी परंपरा को भूल रहे हैं। आधुनिकता की इस चकाचौंध में भावपूर्ण भक्ति संगीत ही नहीं लोग होली की कई परंपरा को छोड़ दिए हैं। एक समय था जब महीनों भर गांव के लोग एकत्रित होकर फगुआ गीत गाते थे। आज इक्का दुक्का गांव में यह परंपरा देखने को मिल रहा है। ढोलक की थाप पर लोग थिरकने पर मजबूर हो जाते थे। सभी वर्गों के लोग एक साथ फगुआ बयार गीतों का आनन्द लेते हैं।

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