सुप्रीम कोर्ट ने की खास पहल  छात्रों की आत्महत्या रोकने के लिए दिया टास्क फोर्स गठन का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने की खास पहल  छात्रों की आत्महत्या रोकने के लिए दिया टास्क फोर्स गठन का आदेश

हेमलता म्हस्के

देश के विभिन्न शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या की घटनाओं ने सुप्रीम कोर्ट को भी दखल देने के लिए विवश कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं और आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने के लिए राष्ट्रीय टास्क फोर्स बनाने का आदेश दिया है। गौरतलब है कि पिछले तीन सालों में खासकर 2019, 2020 और 2021 में ही देश भर में 35921 छात्रों ने आत्महत्या की है । ये आंकड़े गंभीर हैं, जो उन परिवारों के लिए दुखद और परेशान करने वाले हैं जिन्होंने अपने बच्चों को अपनी जिंदगी को संवारने भेजा था लेकिन बदले में उनकी लाशें घर तक आ जाती हैं।

 

विद्यार्थियों द्वारा शिक्षण संस्थानों में ही आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं देश के सामने एक गंभीर सवाल खड़े करती हैं। जिन शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थी अपनी जिंदगी संवारने जाते हैं और वहीं वे अपनी जिंदगी को ही खत्म कर लेते हैं। भले ही आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों के सामने हालात एक जैसे नहीं होते होंगे, लेकिन आखिर वे कौन सी परिस्थितियों होती हैं जिसके सामने विद्यार्थी पस्त हो जाते हैं और अपनी जीवन लीला खत्म करने पर उतारू हो जाते हैं।

अभी हाल ही में आईआईटी दिल्ली में दो छात्रों ने जब आत्महत्या कर ली तो उनके अभिवावकों ने सुप्रीम कोर्ट में शिकायत की थी। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पारदी वाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने उनकी शिकायत पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया है कि ऐसी शिकायतों का संज्ञान लेना जरूरी है। इस बारे में एफआईआर भी दर्ज किया जाना चाहिए और ऐसी गंभीर समस्या के कारणों की तलाश करना और उसका समाधान निकालने का प्रयास शिक्षण संस्थानों के साथ अभिभावक और सरकारें भी करें। साथ ही मौजूदा नियमों को सशक्त बनाकर विद्यार्थियों की मदद की जाए ताकि वे भविष्य में आत्महत्या करने के लिए मजबूर नहीं हो सके।

देखा जाए तो आत्महत्या रोकने के लिए कदम पहले ही उठाया जाना चाहिए था क्योंकि शिक्षण संस्थानों में ऐसी घटनाएं अब आम हो गई हैं और लगातार हो रही हैं। वैसे केंद्र और राज्य सरकार द्वारा ऐसी घटनाओं पर रोक लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन उसके बाद भी इस पर रोक नहीं लग पा रही है। अब सुप्रीम कोर्ट ने जोर दिया है कि आत्महत्या की घटनाओं पर रोक के लिए शिक्षण संस्थानों को भी अभिभावक की तरह ही जिम्मेदारी लेनी होगी। वैसे तो पूरे देश में आए दिन किसी ने किसी शिक्षण संस्थान में छात्रों द्वारा आत्महत्या की घटना होती रहती है लेकिन इस मामले में राजस्थान का कोटा शहर विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या की घटनाओं का एक ऐसा केंद्र बन गया है, जहां निजी कोचिंग संस्थानों में विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या करने की घटनाएं आए दिन सामने आती ही रहती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि निजी शिक्षण संस्थानों सहित कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में बार बार आत्महत्या की घटनाएं ये सवाल खड़े करती हैं कि इससे संबंधित मौजूदा कानून पर्याप्त नहीं है और संस्थागत ढांचे अपेक्षाकृत प्रभावी नहीं हैं क्योंकि शिक्षण परिसर छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को दूर करने और आत्महत्या जैसे कदम उठाने से रोकने के लिए कारगर नहीं हैं।

 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहा गया है कि राष्ट्रीय टास्क फोर्स के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज रविन्द्र भट्ट होंगे जबकि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अलावा राज्यों के उच्च शिक्षा विभाग, सामाजिक न्याय और अधिकारिता और विधिक मामलों के सचिव इसके पदेन सदस्य होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि

शिक्षण संस्थानों में उनके पढ़ने और रहने का क्या स्तर हैं। इसके निरीक्षण का अधिकार टास्क फोर्स के पास रहे। ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं की जांच के बाद टास्क फोर्स अपने दायरे से बाहर जाकर भी सुधार की सिफारिश करें क्योंकि देश का युवा ही देश का भविष्य है। उनके अवसाद ग्रस्त होकर निराशा की गर्त में जाते हुए आत्महत्या करने की प्रवृति को खत्म करना होगा। संस्थानों में अगर छुपाया न जाए तो पीठ का विचार है कि नौजवानों की आत्महत्या अब महामारी का रूप ले चुकी है। आत्महत्या के जो कारण नजर आते हैं उनमें शैक्षणिक दबाव, जातिगत भेदभाव, वित्तीय तनाव और यौन उत्पीड़न शामिल हैं। इतना ही नहीं, आई आईटी और एनआईटी जैसी सम्मानित शिक्षण संस्थानों में परीक्षाओं में असफलता भी आत्महत्याओं का एक बहुत बड़ा कारण है। पीठ ने बताया कि छात्रों की आत्महत्या का एक अन्य कारण उनके साथ क्रूर रैगिंग है। विश्वविद्यालय अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए ऐसे मामलों को छुपाते हैं लेकिन छात्रों को सम्मान से शिक्षा मिलनी चाहिए, क्रूरतापूर्ण रैगिंग नहीं। हम इससे आगे जाकर यह सुझाव भी देते हैं कि केवल सम्मान और शिक्षा ही नहीं बल्कि उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार यथोचित रोजगार की गारंटी भी मिलनी चाहिए। आज की शिक्षा स्कोर आधारित है और सीमित सीटों के लिए दाखिले की प्रतिस्पर्धा चलती है। इसलिए या तो सीटें बढ़ाओ या फिर उन नौजवानों के लिए अपने सपने पूरे करने के लिए अलग-अलग रास्ते खोलो। अब समय आ गया है कि टास्क फोर्स को पूरी गंभीरता से काम करने दिया जाए और विद्यार्थियों के बीच संकट पैदा करने वाले कारणों का समय पर निराकरण किया जाए। संकट पैदा होने के कई कारण हैं। अध्यापकों का बदलते समय के साथ पाठ्यक्रम से संबद्ध ना होना, शिक्षा की डिग्रियां बदलते समय के साथ महत्वहीन हो जाना, नौकरियां देने में भ्रष्टाचार और सिफारिश का बोलबाला और देश में “सब चलता है” का दृष्टिकोण का प्रचलित होना। यह कितनी तकलीफदेह बात है कि अपने देश में कोई भविष्य न समझकर देश की युवा शक्ति जो देश की जनसंख्या का लगभग आधा भाग है विदेश की ओर बड़े पैमाने पर पलायन कर रही हैं ताकि उन्हें वहां बेहतर जिंदगी और बेहतर कमाई मिल सके लेकिन अब वहां भी माहौल बदल रहा है। अब प्रवासियों को गरिमाहीन तरीके से अपने देश लौटने पर मजबूर किया जा रहा है। निराश नौजवान अगर भारी तादाद में विदेशों से लौटते हैं और वहां नौकरियां नहीं पाते हैं तो ऐसी परिस्थिति में उनके लिए आत्महत्या के सिवा और क्या रास्ता बचता है। सुप्रीम कोर्ट ने बड़े सही समय पर राष्ट्रीय टास्क फोर्स के गठन की सलाह दी है कि वह नौजवानों को आत्महत्या करने से रोके और उन्हें जिंदगी जीने का सही ढंग समझाएं ।

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