अक्सर मित्र कहते रहते हैं डाक्टर साहब आपको राजनीति में होना चाहिये , क्यों नहीं हैं?
अक्सर मित्र कहते रहते हैं डाक्टर साहब आपको राजनीति में होना चाहिये , क्यों नहीं हैं? 
जे टी न्यूज
मै अक्सर इस सवाल का जबाब हंसकर टाल देता हूं. लेकिन कल एक बहुत पुराने मित्र ने कहा कि तुम चुनाव क्यूं नहीं लड़ते. आज तेरे जैसे लोगों की जरूरत है. मैनें कहां मै चुनाव नही लड़ सकता , तो उसने जिद करके पूछा क्यों नहीं ? बोला तुम अपने समय के तेज तर्रार ( Four first class , m.sc. , ph.d. ) छात्र के साथ छात्र नेता भी रहे . तेरे में क्या कमी है? मेरे साथ ही के कई वर्तमान सांसद – विधायकों का नाम लिया जो आज संसद – विधान सभा में हैं, उनसे तुम बहुत बेहतर हो. मैने कहा सुनो कि क्या कारण है कि मैं चुनाव नहीं लड़ सकता, क्यूंकि इसके तीन प्रमुख कारण हैं। – 1. पहला चाहे जीवन में कुछ बन जाऊँ मैं खुद को एक सामान्य समाज सेवी व सोशल मिडिया लेखक से अलग कुछ नहीं मान पाता। लेखन के मूल में मैंने सरकारी नितियों व सामाजिक-राजनीतिक आलोचना तक सीमित रखता हूं । चुनावी राजनीति का मतलब एक पार्टी की आलोचना का हक़ खो देना। वह मेरे लिए असहनीय जैसा होगा। वर्तमान में देश में कुछ वारीक अंतर को छोड़कर सभी दलों का चरित्र लगभग एक ही तरह का है। कोई पार्टी उस व्यक्ति को पसंद नहीं करती जो उसके कर्मों- कुकर्मों , नितियों की सार्वजनिक आलोचना करे। वह जमाना कभी रहा होगा जब नेहरू अपने आलोचकों को बुलाकर साथ चाय पीते थे। यहां तक अपनी आलोचना भी छद्दम नाम से लिखकर अखबारों में करते थे। आज तो थोड़़ा सा कटु आलोचना ,चाहे वह100 % सही ही क्यूं न हो, दूसरे ही दिन पुलिस देशद्रोह के आरोप में जेल में डाल देगी, फिर सड़ो। कोई साथ देने वाला नहीं । जो कल तक मेरे साथी हाफ पैंट खोल कर बोलो वंदेमातरम् बोलते रहे आज वही सब जय श्रीराम का गायन करके हर -हर मोदी का गान कर रहे हैं। कितने विधायक सांसद बनकर हिंदू राज्य बना रहे हैं। इसमे सबसे ज्यादा लोहिया, जेपी के वैचारिक वंशज हैं। यह मैं नहीं हो सकता। सोशल मिडिया मे लिखने पर ही F I R किया जा रहा है, सरेआम धमकी दिया जा रहा है। -2. दूसरा- गांधी के सिद्धांत अहिंसा और सर्वधर्म समभाव को मानता हूँ, लेकिन गांधी की तरह धार्मिक नहीं, मार्क्स की तरह नास्तिक हूँ। आजकल बिना टीका लगाए राजनीति होती नहीं, वह ढोंग होगा मेरे लिए कि बिना विश्वास के सर झुकाऊँ। नहीं कर पाऊँगा। मेरे लेखन पर ही हमें अर्बन नक्सलाईट कहा जाता है।
3 तीसरा- वोट तो जाति पर ही मिलने हैं। अभी तक जमीन पर गरीबों वंचितों मजलूमों का ही लड़ाई वि.वि. ,थानों, कचहरियों में लड़ता रहा हूँ, अस्पतालों में सेवा करता रहा हूं । चुनावी राजनीति में गया तो राजपूत नेता बना देंगे लोग। मुझे नहीं बनना। जातिवाद का आजीवन विरोध किया है, करता रहूँगा। वंचितों दलितो – पिछड़ों के लिये बचपन से लेकर आजतक आवाज उठाता रहा हूं । कल भी उठाता रहूंगा , परिणाम सवर्णों खासकर पोंगा पाखंडी ब्राह्मणों तथा लंठ सामंती राजपूतों का दुश्मन हूं तो सवर्णों के लिये विलेन हूं। दूसरी तरफ कोई सवर्ण दलितों- पिछड़ों के अधिकार के लिये कितना भी संघर्ष करे लेकिन वोट देने की बारी आयेगी तो वह अपनी जाति को ही चुनेगा। मुझे कत्तई भ्रम नहीं है। मैं अपना काम बहुत ही संजीदगी से करता हूं, विद्यार्थी जीवन में बहुत चाह थी, सदन में जाने की। 1990 मे बिहार में चैनपुर विधान सभा से जनता दल से चुनाव भी लड़़ा था। जमानत जब्त करा दिया राजपूतों ने भले ही ब्राह्मण जीत गया । बाबूसाहब की जमीन तो बच गयी, कोई प्रतिद्वंदी तो नही बना। कारण वि.वि से पढ़ा लिखा नौजवान आ जायेगा तो एक खास बाबूसाहब जिनकी बपौती रही राजपूतों के वोट पर, बपौती खतरा में पड़ जायेगी । आजभी है चैनपुर से कभी भी किसी राजपूत को बाबूसाहब किसी दल से टिकट लेने नही दिया , एक बार एक लोकल बाबूसाहब किसी तरह टिकट पा भी लिया तो लालू – नीतीश बाबू साहब के दबाब में उसे जीतने नही दिया , भले ही बीजेपी जीत जाये । अंतिम समय में साजिस के तहत टेक्निकल फाल्ट निकाल कर मेरा चुनाव चिंह कैंसिल करा दिया गया, कैंसिल कराने वाला कोई दूसरा नहीं बाबूसाहब के खास मित्र नीतीश कुमार ही रहे। कैमूर जिले में बाबूसाहब के पहले उनके बड़े भाई, फिर बाबूसाहब , फिर उनका बेटा, अब बेटा सांसद बन गया तो उप चुनाव में उनका दूसरा बेटा पैदा हो गया। जनता भी उबकर अबकि बार दूसरे बेेटे को हराकर बीजेपी को जिता दिया। मेरे पास पैसा भी नहीं, जाति भी साथ नहीं , obc , sc को साथ मिलने का सवाल ही नहीं तो किस आधार राजनिती में चुनाव लडूं? योग्यता गयी तेल लेने…
बाक़ी एक छोटे- मोटे समाजसेवी , लेखक- आलोचक के नाते हर सामाजिक – राजनीतिक मुद्दे पर बोलता, लिखता हूँ और इस तरह से खुद को राजनीति में शामिल पाता हूँ। बाकी समरथ को नहीं दोष गोंसाईं…
फोटो प्रतिकात्मक है..अन्यथा न लें…
