पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण लागू किया, तो उनका अपमानजनक विरोध किया गया

पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण लागू किया, तो उनका अपमानजनक विरोध किया गया
जे टी न्यूज़
17 फरवरी जननायक कर्पूरी ठाकुर की पुण्यतिथि के पूर्व संध्या पर लेखा-जोखा करने पर हम पाते हैं कि— जब जननायक कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में और रामनरेश यादव ने उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण लागू किया, तो उनका अपमानजनक विरोध किया गया।
आरक्षण लागू करने के “गुनाह” के चलते कर्पूरी ठाकुर और रामनरेश यादव को मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा नहीं करने दिया। वहीं तरह-तरह के जातिवादी अपमान सहना पड़ा। जिसकी बानगी ऐसी कई निम्नलिखित स्लोगनों में गूंजती सुनाई दी। “दिल्ली से चमड़ा भेजा संदेश– बार बनावे कर्पूरी और भैंस चरावे रामनरेश। आरक्षण कहां से आई– कर्पूरी के मां… !!” “गौरतलब है कि सामान्य और न्याय के लिए जब भी कोशिशें हुई, वर्चस्वशाली अभिजनों ने उसका निम्न स्तर पर जाकर विरोध किया।” बहरहाल आरक्षण लागू हुआ जो राजनीतिक से ज्यादा सामाजिक हलचल तेज हो गई। अगर जातियों की तादाद और गोलबंदी से पैदा राजनीतिक दबाव न होता तो बहुसंख्यक आबादी के लिए नीतिगत फैसला लेना असंभव हो जाता। कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में वही भूमिका निभाई और बिहार में कर्पूरी फार्मूला लागू हुआ। “जुल्म करो मत जुलम सहमत जीना है तो मरना सीखो कदम कदम पर लड़ना सीखो।” अपनी हर रैली में उपरोक्त पंक्तियों को नारे की तरह ललकारने वाले जननायक कर्पूरी ठाकुर की प्रतिबद्धता गजब की थी। अति पिछड़ी जातियों के लिए किए गये उनके विशेष प्रावधान बिहार ही नहीं, भारत में अति पिछड़ी कामगार, शिल्पकार जातियों में राजनीतिक चेतना और सामाजिक आत्मविश्वास भर दिया। जो काम त्रिवेणी संघ और अर्जक संघ जैसे सामाजिक संगठनों ने शुरू किया था, उसे एक मुकाम देने की भूमिका कर्पूरी ठाकुर, छेदीलाल साथी (यूपी अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष) जैसे लोगों के यहां बलवती हुई।

“जननायक कर्पूरी ठाकुर ने स्पष्ट और दृढ़ शब्दों में कहा कि उन्होंने आरक्षण के नाम पर कोई नया प्रयोग नहीं किया, बल्कि केवल संविधान में निहित प्रावधानों और निर्देशों का ईमानदारी से पालन किया।” “समाजवादी दलों और तत्कालीन जनता पार्टी की यह घोषित नीति थी कि हरिजन, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग, महिलाएं और सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े मुसलमान सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व के स्वाभाविक हकदार है, और संविधान के अनुच्छेद 15 (4) व 16(4) इसी सामाजिक न्याय की संवैधानिक गारंटी देते हैं।” अपने चुनावी घोषणा पत्र और संवैधानिक दायित्व को लागू करना वे किसी भूल या दुस्साहस के रूप में नहीं, बल्कि उदार, साहसिक और न्यायपूर्ण नीति के रूप में देखे थे। उनके लिए यह पिछड़ापन को बढ़ावा देने का नहीं, बल्कि सदियों के सामाजिक अन्याय को संतुलित करने का प्रयास था। इसलिए वह इसे पिछड़ा बाद नहीं, बल्कि “न्यायबाद” कहते थे। वर्तमान दौर में पिछड़े- अतिपिछड़े- दलित वर्ग के नेताओं जो अपने आपको डॉ लोहिया, अंबेडकर को आदर्श मानने वाले, जननायक कर्पूरी ठाकुर के साथ काम करने, उनके अनुयाई कहलाने फिरते थकते नहीं है। इन लोगों की भूमिकाएं पर गौर कीजिए। नीतीश कुमार, मदन सहनी, आर सी पी सिंह, अशोक चौधरी, चिराग पासवान, जीतनराम मांझी, हुकुमदेव ना. यादव, अशोक यादव, बिजेंद्र नारायण यादव, नरेन्द्र ना. यादव, नित्यानंद राय, उपेन्द्र कुशवाहा, प्रेम कुमार, सम्राट चौधरी आदि दर्जनों बिहारी नेताओं यूपी के राम स्वरूप वर्मा, शिवदयाल चौरसिया, चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु को अपना आदर्श मानने वाले अनुप्रिया पटेल, संजय निषाद, ओपी राजभर, मायावती आदि सभी के सभी आरएसएस की विचारधारा वाली पार्टी भाजपा को दो दशकों से सबल बनाने में सहयोगी बने हुए हैं। भाजपा सरकार ने इन पिछड़े दलित नेताओं से शक्तिशाली हो कर लोकतंत्र को खत्म कर रहे हैं, आम जनता के संवैधानिक अधिकारों को छिन रही है। देश के जेएनयू, डीयू, बीएचयू, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी सहित 45 यूनिवर्सिटियों, आईआईटी कॉलेजों, मेडिकल कॉलेजों, आईआईएम कॉलेजों आदि में आरक्षण के तहत नियुक्ति पूर्णतः अघोषित रूप से बंद कर दिया है। वीसी, विभिन्न विभागों में विभागाध्यक्षों, समता समितियों हेड के पदों से ओबीसी एससी एसटी मैनरीटी वर्ग के लोगों को बाहर कर दिया है। उपरोक्त नेताओं ने भाजपा के इस अत्याचार पर सरकार को कोई चेतावनी नहीं दे रहा। देश भर के आरक्षित वर्ग ओबीसी एससी एसटी मैनरीटी के छात्र-छात्राएं अपनी आरक्षित अधिकारों की हिफाजत एवं सम्मान के लिए सड़क पर आंदोलन कर रहे हैं। वहीं इसी वर्ग के नेताओं भाजपा/आरएसएस की दलाली करने वाले चुप्पी साधे हुए हैं। इस प्रकार वर्तमान दौर में देखा जाता है कि सामान्य वर्ग के अतिवादी लोग मनुस्मृति विधान को मानने वाले हैं। इसलिए ये लोग समता समानता बंधुत्व के सिद्धांत को कभी स्वीकार नहीं किया है और न करेंगे। इसका उदाहरण इतिहास में दर्ज है कि “जब आजाद भारत के संविधान को अंतिम रूप से 26 नवंबर 1950 को संविधान सभा ने स्वीकृति दी, तो अतिवाद संगठन आरएसएस/हिन्दू महासभा/जनसंघ आदि ने संविधान के प्रति को जलाकर अपनी प्रतिक्रिया का इजहार किया था।

 

वहीं ओबीसी, एससी, एसटी, मैनरीटी वर्ग के लोग संवैधानिक कानून के अनुरूप चलकर, समता समानता बंधुत्व इमानदारी कर्तव्यनिष्ठ हो कर बढ़ते हुए शून्य से यहां तक पहूंचे है। कमजोर शोषित पीड़ित वंचित समाज को समता समानता बंधुत्व शिक्षा नौकरी रोजगार प्रतिनिधित्व केलिए, आर्थिक सामाजिक बराबरी केलिए दुनिया के सर्वोच्च संवैधानिक नीति मानी जाती है। ऐसे सर्वोच्च विचारधारा को समाप्त करने में सामाजिक न्याय वर्ग से आने वाले लोग खाद्य बनकर काम कर रहे हैं। जरा गम्भीरता से सोचो आप अपने वाले नस्ल पीढ़ियों के लिए कौन से रास्ते पर ले जा रहे हो ? मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप लोग का समाज, राज्य, देश के प्रति कर्तव्य और भूमिका जननायक कर्पूरी ठाकुर की आत्मा को संतुष्ट नहीं कर पायेंगे। गुदरी के लाल शोषित पीड़ित वंचित समाज की आश राम सुदिष्ट यादव समाजवादी विचारक मधुबनी बिहार की ओर से जननायक कर्पूरी ठाकुर जी को पुण्यतिथि के पूर्व संध्या पर समर्पित एवं कोटि-कोटि हार्दिक नमन।

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